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Saturday 6 June 2009

बेटी का आगमन

(1)
जैसे अनन्त पतझड़ के बाद
पहला-पहला फूल खिला हो

और किसी निर्जन पहाड़ से
फूट पड़ा हो कोई झरना

जैसे वसुंधरा आलोकित करता
सूरज उदित हुआ हो

ताम्र वनों में गूँज उठा हो
चिड़ियों का कलरव

जैसे चमक उठा हो इन्द्रधनुष
अम्बर को सतरंगी करता

जैसे किसी अजान गंध से महक उठी हो
कोई धूसर सांझ

ऐसे आई हो तुम
मेरे जीवन में

(2)
मैं आ गया था किसी बीहड़ वन में
किसी निर्जन घाटी में चल रहा था
अनन्त मरूस्थल में तप रहा था
और बरसों से परिचित शहर की
सड़कों पर खो रहा था
अपने ही आपको ढुँढ़ने की कोशिश में

ऐसी गहन निराशा में
ऐसी अतल उदासी में
दिखा मुझको
ये तुम्हारा जगमगाता हुआ चेहरा
जिसे देखने के बाद
सब कुछ कितना बेमानी हो गया।

सदियों से मेरे साथ
चलती आईं मेरी असफलताएं
अंधकार के वर्तुल सी मेरी गहन उदासी
बार-बार जुड़ते और टूटकर बिखरते मेरे स्वप्न
साहस की सारी आभा लीलतीं
मेरी सुबहें, मेरी शामें

अब क्या मतलब है इन सबका……

ऐसे आई हो तुम
जैसे सागर की अनन्त लहरों पर सवार
तटों तक पहुँचती है हवा
जैसे गहन वन में चलते-चलते
दिख जाए कोई ताल
सदियों से सूखे दरख्त पर
आ जायें फिर से पत्ते
पतझर से ऊबे पलाश में
जैसे आता है वसंत
फूल बनकर


ऐसे आई हो तुम
मेरे जीवन में
बेटी बनकर

आओ तुम्हारा स्वागत है।
2009, खुशी के पहले जन्मदिन पर

मुकेश मानस
कापीराईट सुरक्षित

2 comments:

  1. बहुत संदर । बेटियाँ सच मे ही जीवन को रंगों से भर देती हैं और घर को संगीत से ।

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  2. Mukesh ji,

    Your this poem " Arrival of Daughter" is execllent! I found a new feeling in this poem which convey a freshness and shower of happiness. Thanks for such a nice poem.
    Raj Valmiki

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