Total Pageviews

Thursday, 18 June, 2009

सुबह


भूल जाओ बाहर का शोर
कहीं तुम्हारे मन के भीतर
देखो नाच रहा है मोर

महक रहे हैं सुंदर-सुंदर
रंग-बिरंगे फूल मनोहर
विस्तृत नभ के हर कोने से
उतर रही है सुबह की लाली
भर लो इसको आँचल में

स्वागत करो सुबह का
सुबह आई है
द्वार तुम्हारे
2005

2 comments:

  1. बहुत सुंदर आस किरणों सी उज्वल कविता ।
    मुकेश जी तीसरा बेटा बनने का शुक्रिया । पला पलाया बेटा किसे अच्छा न लगेगा पर अंत में नकली क्यूं बन गये । नोवेंबर के बाद में हम दिल्ली जायेंगे तब आप से मुलाकत होगी ।

    ReplyDelete
  2. Anonymous21 June, 2009

    आदरणीय आशा जी
    प्रणाम। कविता आपको अच्छी लगी इसके लिये बहुत-बहुत शुक्रिया। आपकी सारी कवितायें मैंने पढ़ली हैं। कवितायें आपकी भावनाओं के साथ-साथ आपकी रचनात्मकता को दर्शाती हैं। दोनों बहुत निर्दोष और जीवंत हैं।
    नवम्बर में मैं आपसे मिलकर बहुत खुशी होगी। कालेज में आपका एक कविता पाठ रख लेंगे।कविता पाठ के लिये पहले से ही समय तय कर लीजिये। अपना शेडयूल मुझे भेज दीजियेगा ताकि मैं उसी हिसाब से कार्यक्रम तय कर सकूँ।
    आपका
    मुकेश मानस

    ReplyDelete