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Saturday, 6 June, 2009

पहली बार जब देखा तुम्हें

कैसे भूल सकता हूँ वो शाम
बढ़ा चला जा रहा था तिमिर
रौशनी पड़ रही थी मद्धम
और घिरता जा रहा था मैं
एक अतल निराशा में

पहली बार जब देखा तुम्हें
एक लहर सी उठी
मन के ठहरे हुए समंदर में
हवा में लहराकर बिखरने लगे
चंपा के मदमदाते फूल
और यूं लगा मुझे
कि बहने लगी हँसी तुम्हारी
निश्छल निर्मल जल सी
मेरे भीतर

मचलने को मन हुआ आतुर
जाने कितनी इच्छाएं
जाने कितनी अभिलाषाएं
जाने कितने देखे-अदेखे स्वप्न
साकार होने को
बेताब से होने लगे

लगा कि जैसे हटने लगा
बोझ कोई मन से
लगा की छँटने लगी
धुँध कोई नज़र से
लगा कि जैसे बसंती फूल सा
खिलने लगा मैं
लगा कि जैसे जाग गया हूँ
अतल, अगम किसी गहरी नींद से

पहली बार जब देखा तुम्हें
2006

मुकेश मानस
कापीराईट सुरक्षित

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