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Sunday 4 April 2010

पंडिज्जी का मंदिर
मुकेश मानस



एक थे पंडिज्जी। पंडिज्जी जन्मजात पंडिज्जी थे क्योंकि पंडितों के कुल में पैदा हुए थे। उनके पिता आस-पास के गांवों में पुरोहिताई का कारोबार करते थे। खाना-खर्चा ठीक-ठाक चल जाता था।घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती थी। कहने का मतलब ये कि पंडिज्जी सोने के पालने में तो नहीं, कम से कम चांदी के पालने में जरूर पैदा हुए थे।

अपने पूर्वजों की तरह पंडिज्जी को पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। मगर फिर भी वह जैसे-तैसे कक्षा आठ तक पढ़ गए। कक्षा नौ में नकल मारते हुए पकड़े गए और उन्हें परीक्षा से बेदख़ल कर दिया गया। यह जानकर उनके पिता मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए। एक तो इसलिए कि उनको अपनी पुरोहिताई की जमींदारी संभालने के लिए कोई तो वारिस चाहिए था और यह वारिस अपना ही खून हो तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है। दूसरे उन्हें डर था कि ज्यादा पढ़ाई-लिखाई उनके बेटे का दिमाग ना खराब कर दे और वह कहीं अपने पूर्वजों की परम्परा को बट्टा ना लगा दे। कुछ दिन तो उन्होंने पंडिज्जी को सांड की तरह छुट्टा घूमने दिया। फिर एक दिन बड़े प्यार से बुलाया और कहा-
“देखिए, अब आप बड़े हो गए हैं। अब आप इधर-उधर घूमना बद कीजिए और कुछ काम-काज देखना-समझना शुरू कीजिए।”

पंडिज्जी को पुरोहिताई का थोड़ा-बहुत चस्का तो पहले से ही लग चुका था। फिलहाल उन्हें भी कोई दूसरा काम दिखाई नहीं दे रहा था। सो उन्होंने भी ज्यादा ना नुकर नहीं की। एक-आध साल में पंडिज्जी ने कुछ काम चलाऊ पुरोहिताई का काम सीख-साख भी लिया। जिन-जिन गांवों उनकी पुरोहिताई थी उन-उन गांवों में छोटे में पंडिज्जी को छोटे पंडित के रूप में काम और सम्मान मिलने लगा। पिता को यह देखकर संतोष हुआ कि चलो पंडिज्जी अब हिल्ले से लग जाएंगे।

निश्चितता के इसी दौर में पंडिज्जी ने कुछ पंडितों वाले शौक भी पाल लिए। मसलन भांग का शौक। भांग को हमारे धर्म ग्रथों में आदि देव महादेव भगवान शंकर का प्रसाद बताया गया है। इसलिए उसे पीने या खाने में कोई हरज नहीं। दरअसल पंडिज्जी के पिताजी को भांग का बहुत शौक था। उनके लिये पहले उनकी पत्नी भांग का लौटा तैयार करती थीं। बाद में वह इस काम में लापरवाही दिखाने लगीं तो यह काम पंडिज्जी के जिम्मे आ पड़ा। शुरू में वह यह काम अपनी पितृ भक्ति दिखाने के लिए करते थे। बाद में उन्हें देर तक भांग घोटते रहने के काम से बोरियत होने लगी। पिता तो भांग पीकर मस्त हो जाते मगर भांग घोटते-घोटते उनके हाथ दुख जाते। एक दिन उन्होंने भांग घोटते-घोटते एक गिलास भांग खुद भी पी ली। उसके बाद भांग घोटने में आनन्द मालूम होने लगा। धीरे-धीरे बात यहां तक आ पहुँची कि पिता के साथ-साथ वह अपने लिए भी भांग घोटने लगे।

उनकी इस हरकत को पिता ने बुरा नहीं माना बल्कि वह समझ गए कि अब उनका बेटा जवान हो चुका है और उसे अब संसर्ग और कुल बढ़ाने के लिए एक औरत की दरकार है। वह इस जुगत मे लग गए। मगर पंडिज्जी तो काफी पहले से ही इस जुगत में लगे हुए थे। रोज सुबह और शाम वह कुंए पर नहाने के बहाने जाते और घंटों वहीं बैठे रहते ताकि वहाँ पानी भरने आने वाली बहू-बेटियों के शरीरों की उठानों, उनके स्तनों की गोलाईयों, उनके नितंम्बों की कटानों को देखकर अपना जी बहला सकें। दो-चार से उनका नैंन-मटक्का भी शुरू हो चुका था। खासतौर से दो-तीन चमारों की लड़कियों के बारे में तो उनका ख्याल था कि जल्द ही उनमें से किसी ना किसी के साथ उनका टांका फिट होने वाला है।

एक दो साल बाद पंडिज्जी के पिता का देहावसान हो गया। पिता के पुश्तैनी कारोबार और घर के सदस्यों की देख-रेख की जिम्मेदारी अब उनके सिर पर आ पड़ी। उन्होंने पिता के काम को जैसे-तैसे संभाल तो लिया मगर वह न तो पिता की तरह अनुभवी थे और न ही कार्यकुशल। ऊपर से उन पर जवानी की भी असीम कृपा थी। एक बार किसी जजमान के यहां उनका ठहरना हुआ। दूसरे ही दिन जजमान की कन्या के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाते हुए पकड़ लिया गया। कुटाई तो उनकी नहीं हुई मगर उन्हें बिना दान-दक्षिणा के भगा दिया गया। इस घटनाके बाद पंडिज्जी का काम जमने से पहले ही उखड़ गया।

अब पंडिज्जी दिन रात इस चिंता में दुबलाने लगे कि क्या किया जाए? घर-बार को कैसे चलाया जाए? एक दिन उन्हें बातों ही बातों में अपने चाचा के उस लड़के का ख्याल आया जो पिछले कई सालों से दिल्ली में रह रहा था और अच्छा कमा खा रहा था। चुनांचे उन्होंने उसका पता लिया और जा पहुँचे दिल्ली। उनके चचाज़ाद भाई ने दिल खोल अकर उनका स्वागत किया।उसने रोहिणी जैसे मध्यवर्गीय इलाके में पान-बीड़ी की एक पक्की दुकान कर रखी थी। दुकान थी तो बहुत छोटी मगार कमाई बहुत थी। उसने सड़क के किनारे महज एक छोटा सा खोखा लगाकर शुरुआत की थी और चार-पांच सालों में तरक्की करते हुए यहां तक आ पहुँचा था। कहानी घिसी पिटी जरूर थी मगर उसे दुहरा कर देखने में कोई बुराई नहीं थी। लिहाजा पंडिज्जी को भी एक खोखा लगाकर शुरूआत करने की सलाह दी गई। पहले पंडिज्जी को ये सलाह कुछ अच्छी नहीं लगी। मगार कुछ दिन खाली बैठने के बाद जब उनके चचाज़ाद भाई की बीबी ने बुड़बुड़ाना शुरू किया तो पंडिज्जी टैं बोल गये।

जल्द ही पंडिज्जी के लिए एक खोखा बनवा दिया गया और वहां के बीट कांस्टेबल को चाय पानी देकर खोखे को सड़क के किनारे टिका दिया गया। पंडिज्जी खोखे में बैठ्कर पान-बीड़ी बेचने लगे। जल्द ही उनकी ठीक-ठाक कमाई भी होने लगी। मगर पंडिज्जी जल्दी ही इस काम से बोर होने लगे।दिन भर खोखे में बैठे-बैठे और सड़क पर आती-जातियों को देखते-देखते वह उकताने लगे। एक दिन पड़ौस में बने मूत्रालय में मूत्र त्याग करने क्या गए कि पीछे से नगर पालिका की गाड़ी उनका खोखा उठाकर ले गई। दुखी होने की बजाय उन्होंने भगवान का धन्यवाद किया कि चलो पिंड छूटा और वह अधर्म के रास्ते जाने से बचे। जब बार-बार कहे जाने पर भी वह खोखा लगाने को तैयार नहीं हुए तो उनके लिए सुरक्षा गार्ड की नौकरी ढ़ूँढ दी गई। मगर यह काम भी उन्हें भाया नहीं। एक तो यह उनके स्टेंडर्ड का काम नहीं था। दूसरे इस काम में मेहनत बहुत ज्यादा थी। सो पंडिज्जी ने जल्दी ही इस काम से भी तौबा कर ली। मगर बिना कोई काम किए दिल्ली में कैसे रहा जाए? गांव लौट जाने का तो सवाल ही नहीं था। उनके पास न तो गांठ में कोई पैसा-धेला था और न ही किसी काम को करने का तजुर्बा……!!!

एक दिन पंडिज्जी कहीं जा रहे थे। अचानक उनकी नज़र दिल्ली विद्युत बोर्ड की इमारत के पास खड़े पीपल के पेड़ पर पड़ी।सरकारी इमारतों के पास पीपल के पेड़ कुछ ज्यादा ही होते हैं। दिल्ली विद्युत बोर्ड और जल बोर्ड की इमारतों के पास तो और ही ज्यादा। उन्होंने देखा कि एक कुत्ता टांग उठाए पीपल के तने पर मूत रहा है। पंडिज्जी को बहुत गुस्सा आया की ससुरा हिन्दुस्तान के धार्मिक वृक्ष की पवित्रता को नष्ट कर रहा है। उन्होंने ढेला मार कर कुत्ते को भगा दिया। लेकिन इसके साथ ही उन्हें ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो गई।


उसी दिन शाम को उन्होंने कुम्हार के यहां से हनुमान जी की एक सुंदर सी मूर्ति खरीदी। अगले दिन सुबह पांच बजे वहां पहुँचकर उन्होंने पीपल के नीचे मूर्ति की स्थापना कर दी और धूप और अगरबत्ती जला दी। अगले कुछ दिनों तक उन्होंने इसी क्रिया को दुहराया। अगली बार जब वह वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कोई उनसे पहले ही वहां धूप और अगरबत्ती जला गया है। उनका माथा ठनक गया। उन्हें लगा कि यह कहीं उनके ही जैसे किसी और बंदे का काम तो नहीं। वह एकदम घबरा गये। जो वह सोच रहे थे अगर वह सच निकला तो यह ठीया तो उनके हाथ से गया। अब उन्हें कोई नई जगह खोजनी पड़ेगी। फिर भी उन्होंने सोचा कि एक बार देखकर तसल्ली तो कर ही लेनी चाहिए।

अगले दिन वह अपने ठीये पर जरा जल्दी पहुँचे और वहीं मंडराने लगे। थोड़ी ही देर में वहाँ पर दो बूढ़ी औरतें आईं। उन्होंने वहाँ पर झाड़ू-बुहारी की और धूप, अगरबत्ती जला कर चली गईं। पंडिज्जी की सांस में सांस आई। उन्होंने मन ही मन मातृ शक्ति को प्रणाम किया और ईश्वर को धन्यवाद किया। अब पंडिज्जी और आगे बढ़े। उन्होंने एक चिरागी और आरती वंदना के साथ बजाई जाने वाली छोटी घंटी खरीदी। अगले दिन मंगलवार था। उन्होंने सुबह वहां ‘हनुमान लला’ की जोर-जोर से आरती गाई। उस दिन शाम को भी पंडिज्जी डरते-डरते वहां पहुँचे और जोर-जोर से आरती गाने लगे। आरती खत्म होते-होते कुछ लोग वहां इकट्ठा हो गए। यह देखकर उनकी हिम्मत बढ़ी। आरती खत्म करके उन्होंने प्रसाद बांटा।

अगले मंगलवार की शाम को जब उन्होंने हनुमान लला की आरती समाप्त की और वहां उपस्थित भक्तों को प्रसाद बांटा तो एक बुज़ुर्ग आदमी उनसे बोले-“आप यहाँ रोज सुबह-शाम आया करो और आरती किया करो। कोई कुछ नहीं कहेगा। अगर कहेगा तो मैं देख लूँगा।”
“जी आप”
मैं यहाँ की पाकेट का परधान हूँ”
“जी आप कहेंगे तो……” पंडिज्जी बहुत ही भोले और मासूम बन गए।
“हमारे इलाके में मंदिर की कमी थी जो आपने पूरी कर दी।”
“जी मंदिर कहाँ अभी तो……”
“चिंता मत करो। सब हो जायेगा”
“ जी बहुत अच्छा। आप जैसे धार्मिकों का साथ मिले तो……”

परधानजी का आशीर्वाद लेकार पंडिज्जी वहाँ से अपने घर की ओर चल पड़े। आज वह बहुत प्रसन्न थे। उनकी योजना पूरी तरह सफल हो गई थी। अब यह ठीया उनका था और उसकी तरफ कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता था। रास्ते में उन्हें एक जलेबी वाला दिखा तो उन्होंने जी भार कर जलेबी खाई। घर पहूँच कर उन्होंने आनी पोट्ली में से भांग निकाला और देर तक घोटने के बाद पीया। तब जाकर उन्हें लगा कि उन्होंने अपनी खुशी को अच्छी तरह से सेलिब्रेट कर लिया है।

कुछ दिनों के भीतर-भीतर ही पीपल के चारों तरफ़ एक चौकोर चबूतरा बना दिया। यह शायद परधानजी की भक्ति का ही प्रसाद था। जल्दी ही चबूतरे के तीन तरफ़ दीवारें खड़ी करके उन पर टीन की चादरें डाल दी गईं। परधानजी और अन्य लोगों की धार्मिकता पर पंडिज्जी का दिल बाग-बाग होने लगा। मगर यह बागबागपन ज्यादा देर तक नहीं चला। सड़कों से अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान नगर पालिका ने ‘हनुमान लला’ के अस्थान को मटियामेट कर दिया। शाम को पंडिज्जी जब वहाँ पहुँचे तो उनके होश उड़ गए।

संयोग से उस दिन मंगलवार था। धीरे-धीरे भक्तजन वहाँ जमा हो गए।उन्होंने पंडिज्जी को सांत्वना दी। भक्तों ने हनुमान लला की पुनर्स्थापना कराई। आरती वंदना की गई और प्रसाद वितरित किया गया। उस दिन की भीड़ में एक युवा भी शामिल था। उसके भीतर हिंदुत्व का जोश छलांगें मार रहा था।वह जोशीला नौजवान पंडिज्जी के पास आया और बोला-“पंडिज्ज्जी। आप घबराएं नहीं। अब हम आ गए हैं। यह हमारी श्रीराम भक्त हनुमाअन सेवा समिति का इलाका है। अब हम सब संभाल लेंगे। हमारे रहते अब इस मंदिर की कोई ईंट भी नहीं हिला सकता है।

पंडिज्जी को युवा शक्ति की परख थी। उन्होंने बड़े एहसानमंदी वाले लहजे में कहा-“अब आप लोगों का ही सहारा है भैया।” मानो कहना चाह रहे हों कि भैया तुम तो भगवान का अवतार धर कर मुझे तारने आए हो।

और वाकई, कुछ दिनों के भीतर सब ठीक कर दिया गया। चबूतरे को दुबारा बनवा दिया गया। इस बार उसकी लम्बाई भी बढ़ा दी गई। कुछ दिनों बाद वहां दीवारें खड़ी कर दी गईं और दीवारों पर टीन की चादरों की छ्त डाल दी गई। पंडिज्जी ने चबूतरे पर एक तरफ़ राम-सीता-लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां स्थापित करवाईं। इस बार उन्होंने चबूतरे के दूसरी तरफ़ सांईं बाबा की भी एक बड़ी सी मूर्ति स्थापित कर दी। कुछ दिनों बाद उन्होंने मंदिर के बाहर एक और अस्थान बनवाया। वहाँ एक मूर्ति लगवाई और उसके ऊपर एक छ्तरी टांग दी-‘सूर्य पुत्र श्री शनि महाराज का आसन।’ इस बार उन्होंने दान पात्र की कमी को भी पूरा कर दिया। दान पात्र को चबूतरे के बीचों-बीच इस तरह से रखा गया कि वो सबको दिखाई पड़े। लोगों को किसी प्रकार की कोई गलतफ़हमी ना हो इसके लिए उन्होंने दान पात्र पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा दिया-‘दान पात्र’

अब मंगलवार के अलावा वीरवार और शनिवार को भी भक्तजन आने लगे और चढ़ावा चढ़ने लगा। एक दिन किसी मंदिर संरक्षण समिति वाले कुछ लोग आकर उन्हें अपनी समिति का सदस्य बना गए और उन्हें यह आश्वासन दे गए कि जरूरत पड़ने पर पूरी समिति उनकी मदद को आ खड़ी होगी। अब पंडिज्जी दिन भर वहीं बैठने लगे। उनका हौसला और आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ था क्योंकि अब उनके पास दो-दो समितियों के अध्यक्षों और स्वयंसेवकों के फोन नम्बर मौजूद थे। मंदिर में दिन भर मौजूद रहने के कारण उन्हें आस-पास के घरों से हवन-पूजा आदि के निमंत्रण भी आने लगे। लेकिन उन्हें पुरोहिताई के काम में अपने अधकचरे होने का डर भी सताने लगा।

मगर जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि बनारस से छपने वाले तीन-चार गुटकों और पत्रिकाओं के बल पर ही सारा पुरोहिताई का काम चलाया जा सकता है। इन पोथियों और पत्रिकाओं की मदद से शुभ लग्न, दिवस, पर्व और तारीखें देखने का काम आसानी से किया जा सकता था। इनमें सब कुछ दिया हुआ है। सीधा सा गणित है। हर राशि के आगे साल भर में पड़ने वाले शुभ लग्न, शादी, विवाह की तारीखें और हवन-पूजा के दिन दिए हुए हैं। बस राशि के हिसाब से उन्हें देखना आना चाहिए। जल्दी ही पंडिज्जी इस काम में पारंगत हो गए और उनकी धाक जम गई। ज्ञान का विस्तार तो हो गया मगर मंदिर का विस्तार अभी बाकी था।

दिल्ली विद्युत बोर्ड की ईमारत के बांईं तरफ़ सौभाग्य से किसी सरकारी विभाग का एक बड़ा सा प्लाट खाली पड़ा था जिसे वहां के बच्चे खेलने-कूदने के लिए इस्तेमाल किया करते थे। पंडिज्जी ने मंदिर को उधर ही खिसकाना शुरू कर दिया। उन्होंने प्लाट के मंदिर से सटे किनारे पर एक चबूतरा बनवाकर मंदिर संरक्षण समिति के अध्यक्ष के हाथों शिवलिंग और नन्दी की स्थापना करवा दी। अध्यक्ष भी खुश और पंडिज्जी भी खुश। कुछ दिनों बाद पंडिज्जी ने वहाँ एक बड़ा सा कमरा खड़ा करवा दिया। फिर मूल मंदिर को उस कमरे में स्थानांतरित कर दिया ताकि उसके तोड़े जाने का भय ना रहे। मंदिर की इस ईमारत का उदघाटन ‘विश्व हिन्दुत्व समिति’ के दिल्ली अध्यक्ष के हाथों बड़ी धूमधाम से करवाया गया। मूल मंदिर के खाली कक्ष को पंडिज्जी ने अपने निजी कक्ष के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।इस प्रकार उनकी आवास समस्या भी हल हो गई।

सरकारी विभाग को जब अपने खाली प्लाट पर मदिर बन जाने की खबर मिली तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पंडिज्जी के मंदिर की विजय पताका वहाँ फहरा चुकी थी। सरकारी विभाग ने एक दो बार कार्यवाही करने की कोशिश की मगर हर बार उसे भारी जनसमूह का सामना करना पड़ा जो मंदिर के लिए मरने-मारने पर उतारू होता। हैरानी की बात थी कि जैसे ही सरकारी जत्था वहाँ पहुँचता वैसे ही सैकड़ों का हुजूम वहाँ एकत्रित हो जाता। पंडिज्जी मन ही मन समितियों वालों को दुआएं देते। थक हार कर सरकारी विभाग ने बाकी बची अपनी जमीन पर चारदीवारी खड़ी करके और उस पर अपना बोर्ड टांगकर इस अध्याय की इतिश्री कर दी। पंडिज्जी भी बहुत से धार्मिकों के साथ हरिद्वार जाकर गंगा नहा आये।

जहाँ कभी कुत्ते मूतते थे वहाँ अब दो कमरों वाला हिन्दू मंदिर खड़ा है। अब कुत्तों की क्या मजाल कि इधर देख भी सकें। मंदिर में सुबह-शाम आरती-वंदना होती है। शनिवार, वीरवार और मंगलवार को यहाँ भारी भीड़ जुटती है जिसे संभालने के लिए पुलिस के दो ठुल्ले तैनात किए जाते हैं। मंदिर के दरवाजे पर टँगे बोर्ड पर लिखा है-‘प्राचीन श्रीराम मंदिर’। बोर्ड पर दूसरी पंक्ति में मुख्य संरक्षक समिति का नाम लिखा है-‘हिन्दू मंदिर संरक्षक समिति-दिल्ली।’ और तीसरी पंक्ति में लिखा है-‘श्रीराम भक्त हनुमान सेवा समिति-रोहिणी शाखा।’ बगल के कमरे में पंडिज्जी अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आराम से रहते हैं। उनके कमरे पर भी एक बोर्ड टँगा है जिस पर लिखा है-पंडित श्रीराम सहाय पांडेय-प्रसिद्ध आचार्य और ज्योतिषाचार्य।

दोस्तो, आप समझ रहे होंगे कि कहानी अब खत्म हो गई। मगर मदिर की ये कहानी कहीं खत्म नहीं होती। पंडिज्जी के मंदिर की यह कहानी एक अभूतपूर्व कहानी है। इस कहानी ने भारतीय अनुसंधान मेधा के इतिहास में उन बेमिसाल सिद्धांतों की खोज की है जिनका इस्तेमाल पूरे भारत में कभी भी, कहीं भी और किसी भी सड़क पर हिन्दू मदिर स्थापित करने के लिए अचूक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। और सच तो ये है कि इन सिद्धांतों का इस्तेमाल बखूबी किया जा सकता है। इसलिए पंडिज्जी के मंदिर की यह कहानी दरअसल एक अंतहीन कहानी है और यही इसका अंत है।
2008

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