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Thursday 1 April 2010

सत्यवती का चित्र कार्ड
मुकेश मानस

कल शशि ने बच्चों से जो-जो खेल वे अपने घरों, गलियों में खेलते हैं या खेलना चाहते हैं, उन खेलों के चित्र बनवाए थे। यह चित्र बच्चों ने छोटे-छोटे कार्डों पर बनाए थे। कल की गतिविधि आगे बढ़ाने के लिए शशि आज घर से कुछ शब्द कार्ड बनाकर लाई थी। इन कार्डों में उन खेलों के नाम लिखे थे जिनके चित्र बच्चों ने कल बनाए थे। शब्द कार्डों को उसने बच्चों में बांट दिया और उन कार्डों को भी बच्चों के बीच में रख दिया जिनमें चित्र बने थे।

शशि के निर्देश के अनुसार एक-एक बच्चे को अपने-अपने शब्द कार्ड पर लिखे शब्द को बोलकर बोर्ड पर लिखना था और चित्र कार्डों की ढेरी से उसी खेल का चित्र ढूंढना था जिसका नाम उसके शब्द कार्ड पर लिखा था। सब एक-एक करके आने लगे और अपने शब्द कार्ड पर लिखे खेल के नाम को बोलकर उसके हिसाब से वहाँ पड़े चित्र कार्डों की ढेरी में से अपना चित्र कार्ड ढूँढ कर अपनी जगह जाकर बैठलगे। मैं भी एक कोने मे बैठा यह सब देख रहा था।

मेरे पास एक लड़की बैठी हुई थी। वह हल्के रंग की फ्रॉक और उस पर गुलाबी रंग का मैला सा स्वेटर पहने हुई थी। बाल उलझे-उलझे और बेतरतीब थे। वह बार-बार तरह-तरह की आवाजें बड़े तेज स्वर में निकाल रही थीं। जब उसने पहली बार ऐसी आवाजें निकाली तो मैंने समझा वह शैतानी कर रही है और उसे ऐसी आवाज निकालने में मजा आ रहा है। लेकिन वह बार-बार ऐसा करने लगी तो मेरा उस पर ध्यान गया।

मैं और भी हैरान हुआ जब मैंने देखा कि कोई भी उस पर ध्यान नहीं दे रहा था। मुझे लगा कि वह कुछ ज्यादा ही शरारत कर रही है। अब वह बुरी तरह तेजी से चिल्लाने लगी थी। इसलिए मैंने उसे चुप रहने के लिए पुचकारा मगर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा।शशि भी उसकी तरफ से लापरवाह सी दिख रही थी। क्योंकि कक्षा चल रही थी इसलिए मैं उससे बोला नहीं मगर मैंने उसका ध्यान लगाने के लिए उसको अपना शब्द कार्ड मुझे दिखाने के लिए इशारा किया। वह मेरा इशारा समझ गई। उसने मुझे अपना शब्द कार्ड दिखाया। उस पर फुटबाल लिखा हुआ था।

वह अपने शब्द कार्ड पर लिखे शब्द को बोर्ड पर लिखने के लिए काफी उत्साहित हो रही थी। उसमें ऐसा उत्साह स्वाभाविक था क्योंकि बाकी बच्चे भी बोर्ड पर लिख रहे थे। आखिरकार इस बच्ची से रहा नहीं गया। वह जोर-जोर से आवाज निकालने लगी और हाथों से इशारा करने लगी, मानो कह रही हो कि दीदी मुझे भी लिखने दो।

शशि ने उसे बोर्ड पर लिखने का इशारा किया। मैं समझ नहीं पाया कि शशि ने उसे सिर्फ इशारा क्यों किया। उसका नाम क्यों नहीं पुकारा, जबकि वह बाकी बच्चों के नाम पुकार नहीं थी। वह तेजी से खड़ी हुई। उसके बाद बोर्ड के पास जाकर वह घूमी और बड़े ही सुनियोजित ढंग से मुड़कर बाकी बच्चों की तरफ मुखातिब होकर कार्ड पर लिखे शब्द को पढ़ने का अभिनय करते हुए मुँह से उसने कुछ अलग-अलग आवाजें निकालीं। उसने अपनी तरफ से शायद पूरी कोशिश की थी, अपनी बात बताने की। शशि से चॉक लेकर बोर्ड के एक कोने में लिखने लगी। शशि ने दूसरे बच्चे लिखने को कहा और क्लास चलती रही।

मेरा ध्यान उसी बच्ची पर टिका रहा। उसने लिखना खत्म किया और चित्र कार्डों में से फुटबाल का चित्र ढूंढने लगी। उसने बारी-बारी से कार्ड लाकर मुझे दिखाए। वह मुझसे इशारे में पूछती कि उसने सही कार्ड उठाया है या गलत। मैं उसे बताना नहीं चाहता था मगर मैं बार-बार ‘ना’ में गरदन हिलाता रहा। मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। पाँचवी या छठी बार वह आँखें चमकाती मेरे पास आई। इस बार उसे ‘फुटबाल’ वाला चित्र कार्ड मिल गया। उसने मुझे कार्ड लाकर दिखाया। इस बार उसने पूछा नहीं उसके चेहरे पर मुस्कान देखकर मैंने अंदाज लगाया कि इस बार उसे सही कार्ड मिल गया है। मेरे चेहरे पर अनायास आ गई चमक से उसको भी पता चल गया कि उसने सही कार्ड ढूंढा है। उसके मुँह से खुशी के स्वर निकलने लगे। उधर पूरी क्लास उसी रफ्तार से चल रही थी बच्चे बोर्ड के पास जा रहे थे और बोर्ड पर अपने शब्द कार्ड का शब्द लिख रहे थे।

वह खुश हो रही थी। इसी बीच पड़ोस में बैठी लड़की ने उसका चित्र कार्ड छीन लिया और साथ वाली लड़की को दे दिया। साथ वाली लड़की ने उस कार्ड को अपने कुर्ते की जेब में छिपा लिया।

सत्यवती’ हाँ यही नाम था उसका, मुझे तभी पता चला। वह उसे देख नहीं पाई थी। कार्ड छिन जाने की वजह से वह चिल्लाने लगी। उसके तेज-तेज चिल्लाने की वजह से सब बच्चों का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुआ। वे उसके बारे में बातें करने लगे तब मुझे सत्यवती के बारे में कुछ और जानकारी मिली।

"दीदी, सत्यवती चिल्ला रही है !"
"पागल है, परेशान करती रहती है।"
"दीदी, गूंगी शोर मचा रही है।"
शशि ने क्लास रोक दी और बच्चों से बात करने लगी कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।
"दीदी, इसकी मां कह रही थी, इसे दूसरे स्कूल में भेजेंगे।
"ये दीदी, इसकी मां कर रही थी, इसे दूसरे स्कूल में भेजेंगे।"
"ये बहुत शोर मचाती है दीदी।"
शशि बच्चों को समझाने लगी। यह सब क्लास में चल रहा था।

मैं सत्यवती को देख रहा था। वह चित्रकार्डों की ढेरी में अपना कार्ड ढूंढ रही थी, और तरह-तरह की आवाजें निकाल रही थी। जब ढेरी में उसे कार्ड नहीं मिला तो वह बच्चों के कार्ड देखने लगी। मगर उसका कार्ड वहाँ भी नहीं था। किसी ने उसे कोई दूसरा कार्ड दिया। वह उसे लेकर जब खामोश हो गई तो मुझे लगा उसे उसका कार्ड मिल गया है। थोड़ी देर में वह चिल्लाने लगी उसे अब मालूम पड़ गया था कि यह उसका कार्ड नहीं था।

सत्यवती जोर-जोर से रोने लगी थी। उसकी निराशा उसके आंसुओं के रूप में बाहर निकल रही थी। मुझसे रहा न गया। जिस लड़की ने सत्यवती का कार्ड छिपाया था, मैंने सत्यवती को दिखाकर उसकी ओर इशारा किया। उसको अपने कुर्ते की ऊपर की जेब की तरफ इशारा करके बताया कि कार्ड उसकी जेब में है। मेरे इशारे को सत्यवती ने समझ लिया। फिर तो सत्यवती उस लड़की से चिपट गई और उसकी जेब से कार्ड निकाल लिया।

सत्यवती मेरे पास आकर चित्र कार्ड को शब्द कार्ड से मिलाने लगी। वह दोनों कार्डों को ले जाकर शशि को दिखाने लगी। शशि ने अपने चेहरे पर बधाई भरी मुस्कराहट लाकर सत्यवती को यह बता दिया कि उसने अबकी बार सही कार्ड तलाश लिया है। यह उसकी का कार्ड था। सत्यवती खूब खुश हुई।

शशि ‘अंकुर’ नाम की एक गैर सरकारी संस्था में शिक्षिका है जो दिल्ली की विभिन्न झुग्गी बस्तियों में अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र चलाती है।
जनसंल्लव, अप्रैल १९९७ में प्रकाशित।

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