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Monday 10 October 2011

कुबेरदत्त और जगजीत सिंह के लिए




हम चले जाते हैं उसकी आगोश में
छूटता जाता है हमसे हमारा भी अहसास
विस्मृत होती जाती है याददाश्त
पसरता जाता है एक मौन अकंप
वहां न कोई आवाज़ होती है न क्रिया और न गति कोई
नींद की जगह में होते हैं जब हम तब ऐसा ही होता है

कुछ दृश्य उभरते हैं पटल पर अनंत रंगाभ बिखराते हुए
एक कहानी सी सजीव होने लगती है
कोई संगीत बजने लगने लगता है अनजाना अनसुना सा
एक अलग ही तरह की दुनिया होती है
जहां न देश होता है न काल और न वातावरण
ख्वाब ऐसे ही आते हैं नींद की दुनिया में

नींद के बाद जागना ही होता है
ख्वाब से सच की दुनिया में आना ही होता है
कभी दुख होता है तो कभी अफसोस
कभी आंसू निकल पड़ते हैं आंख से
तो कभी खुशी होती है
खुद को वास्तविक दुनिया में
ख्वाब की दुनिया से अलग पाकर

क्या होता होगा कैसा लगता होगा
जब कोई नींद से जागे ही नहीं
जब कोई नींद में ही रह जाये
जब कोई ख्वाब में ही रह जाये
और अगर वो हमारा बहुत प्यारा सा कवि हो
या हो बहुत मनभावन सा गायक

अगर मैं कभी रह गया नींद में या के किसी ख्वाब में
तो मुझे पता चल जायेगा
कि कया होता है नींद में ही रह जाना
ख्वाब में ही बस जाना
कैसा होता है
कभी नहीं जागना
ख्वाब से कभी हकीकत में नहीं आना
10-10-2010

4 comments:

  1. कविता अच्छी है. होने न होने के बीच ठिठकी हुई, कुछ सोचती हुई.
    .......प्रूफ एक बार और देख लें.

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  2. कई बार वे गए शब्दों के पार और लौटते रहे उस अनुभव को शब्दों से ही चित्रित करने को
    हमें भी उस नींद में रह जाना होगा जानने को अंतिम शब्द
    जिसके पार अनंत जागृति है

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  3. जगजीत सिंह की याद में गजब की दिल छूने वाली कविता, जो सभी के लिए सत्य है.

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  4. सुन्दर, सामयिक प्रस्तुति,आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

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