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Monday, 26 December, 2011

साहित्य की पत्रकारिता और प्रकाशन व्यवसाय की दुनिया


साहित्य की पत्रकारिता और प्रकाशन व्यवसाय की दुनिया
मुकेश मानस

 वैश्विक स्तर पर हम तीसरी दुनिया कहे जाने देशों में से एक में रहते हैं । तीसरी दुनिया के इस देश के भीतर भी एक तीसरी दुनिया है जो दलितों, आदिवासियों और  सर्वहारा की दुनिया है। आज़ादी के बाद इन तबकों में मुक्ति और एक बेहतर समाज की छटपटाहट बढ़ती चली आई है। मुक्ति की यह चाहत और बेहतर समाज की यह छ्टपटाहट लगातार उनके संघर्षों, प्रतिरोधों और आंदोलनों के ज़रिए अभिव्यक्त होती रही है। साहित्य भी ऐसी मुक्तिकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक माध्यम रहा है जिसमें वंचित तबकों का यथार्थ, उनका सघर्ष और बेहतर समाज का उनका सपना प्रतिबिम्बित होता आया है। मगर साहित्य आंदोलनों के अभाव में या उनके कमज़ोर पड़ जाने पर इस मुक्ति साहित्य की व्यवसायिकता बहुत बढ़ जाती है। लेखकों की बढ़ती लेखकीय महत्वकांक्षाएं भी साहित्य की व्यवसायिकता को बढ़ावा देती हैं। मगर यहां महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इस व्यवयिकता में लेखकों की भी कोई हिस्सेदारी होती है या नहीं? यह बात कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि नहीं होती। अगर होती भी है तो केवल नाम मात्र के लिए ।  और यह बात साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्यिक प्रकाशन दोनों पर लागू होती है।
 हिन्दी पत्रकारिता को ज़माने से एक चैरिटी का कार्य माना जाता रहा है बल्कि वो रही है ऐतिहासिक करणो के चलते। स्वातंत्र्योत्तर भारत में  हिन्दी पत्रकारिता पूरी तरह से संगठित व्यवसायिक पत्रकारिता में तब्दील होकर एक पूर्णत: व्यवसायिक गतिविधी बन जाती है। हालांकि चेरिटी पत्रकारिता भी साथ-साथ चलती रहती है।   मगर साहित्यिक पत्रकारिता एक दो उदाहरणो को छोड़कर व्यवसायिक रूख नहीं अपना पाती और न ही एक स्वतंत्र व्यवसायिक गतिविधी बन पाती है। साहित्य को दोयम दर्ज़े की चीज़ मानने का नज़रिया भी उसे पूर्णत: व्यवसायिक गतिविधी नहीं बनने देता। व्यवसायिक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य को जो थोड़ी बहुत जगह मिलती है सजावटी वस्तु से ज्यादा उसकी कोई औकात नहीं होती। ।  इन व्यवसायिक और सरकारी पत्र-पत्रिकाओं में आज भी जो कुछ साहित्यकारों को मानदेय मिलता है वह बहुत ही कम होता है । यह मानदेय एक अहसान की तरह दिया जाता है जिसमें लेखक के प्रति कोई कृतज्ञता अभिव्यक्त नहीं होती।
अब मैं गैर-सरकारी और तथाकथित गैर-व्यवसायिक हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की बात पर आता हूँ। शुरू से ही साहित्यिक पत्रकारिता के ज़्यादातर उदाहरण एक या दो व्यक्तियों के निजी मेहनत का नतीजा रहे है। लेकिन गैर-व्यवसायिक कहने भर से यह पत्रकारिता गैर व्यवसायिक नहीं हो जाती। यह सिर्फ़ कहने के लिए गैर व्यवसायिक है। पर यह ऐसी कभी भी नही रही और आज तो यहकतई नहीं है कुछ अपवादों को छोड़कर्। आज अगर हम हंस, कथादेश,कथन जैसी उच्च जातीय सम्पादकों की पत्रिकायें देखें या फिर बयान और अपेक्षा जैसी दलित संपादकों  की  सफल पत्रिकाओं को देखेंगे तो पायेंगे कि वो अपनी खराब वित्तीय व्यवस्था का कितना भी रोना रोते रहें( वैसे यह हिन्दी साहित्य संपादकों का स्वाभाविक गुण है) लेकिन उनकी वित्तीय स्थिति कोई खराब है ऐसा नहीं है। हंस से लेकर बयान तक जो कहने के लिए गैर-व्यवसायिक हैं मगर असल में पूर्णत: व्यवसायिक हैं बाकायदा सरकारी विज्ञापन के अलावा कई अन्य गैर-सरकारी विज्ञापन जुटाती हैं । आलम ये है कि हिन्दी की किसी भी ऐसी पत्रिका ने आज तक पाठकों के सामने अपना कोई अकाऊंट पेश नहीं किया, न प्रोफिट एन्ड लौस अकाउंट  और न बैलेंस शीट  ही जगज़ाहिर की। कोई पूछे क्यों नहीं? मुझे तो लगता है इनमें कोई अपना जनरल लेजर तक नहीं बनातीं होंगी। वहां सब खर्चों के लिए पैसा है मगर जिस साहित्यकार की रचनाएं छप-छापकर जिसकी बौद्धिक सपदा का दोहन करके वो आगे बढ़ रहीं उसके लिए वहां पैसा नहीं है।उसके लिए ये पत्रिकाएं साहित्यिक चेरिटी हैं।
ठीक यही स्थिति हिन्दी  के प्रकाशन संस्थानों पर लागू होती है। यह एक बड़ी ही दिलचस्प बात है कि हिन्दी के ज़्यादातर प्रकाशक ब्राह्मण है। अगर नहीं हैं तो ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। वे लेखक की रचनाशीलता पर जीवित हैं, फल फूल रहे हैं, मोटर बंगले और आफिस बना रहे हैं और लेखक को एक अजीब से और लगभग अछूत से प्राणी की तरह ट्रीट करते हैं। जिस लेखक की किताब पर उनकी सारी दुकान खड़ी होती है वे महज़ १०% रायल्टी का तुर्रा देकर उसकी पूरी रचनात्मक प्रतिभा, उसकी बौद्धिक संपदा, उसके समय , परिश्रम और इतिहासिक क्रम में, उसके विकास की प्रक्रिया में उसके संघर्ष को खरीद लेते हैं। और यह खरीदना भी केवल नाम के लिए होता है ज्यादातर मामलों में। ज्यादतर मामलों में वे लेखक की किताबों की बिक्री का कोई ब्यौरा न्ही भेजते । माहौल इस तरह का बन चुका है कि लेखक भी किताब छापे जाने पर ही कृतार्थ हो जाता है वह भी इस बारे में कोई खोज खबर नहीं लेता। और जो लेता है उसका क्या हश्र होता है वह किसी से छुपा नहीं है। कुछ हिम्मतदार लेखक कई सालों तक केस ही लड़ते रह जाते हैं और जो रायल्टी मिलती है उससे कई गुना केस लड़ने में ही खर्च कर डालते हैं। जहां तक लेखक  संगठनों की बात है तो वे बड़ी बड़ी हांकेंगे, बिना साम्राज्यवाद विरोध के तो कोई बात ही शुरू नहीं करेंगे लेकिन लेखक के शोषण की कोई बात कभी नहीं उठाएंगे। भारतीय साहित्य के इतिहास में बहुत कम उदाहरण ऐसे मिलेंगे जहां किसी लेखक संगठन ने किसी प्रकाशक के खिलाफ़ कोई धरना किया हो(दक्षिण पंथी प्रकाशकों को छोड़कर)। ये शायद हिन्दी प्रकाशन क्षेत्र में ही ऐसा है कि हिन्दी के ज़्यादातर प्रकाशक लेखक को हिकारत की नज़र से देखते है। नये लेखक को छापने की कोई परम्परा इनके यहां नहीं है। अगर नया लेखक साहित्य की दादागीरी करने वालों में से किसी की अप्रोच ले आये या  वह खुद अपनी किताब को छपवाने का जरुरत से ज्यादा पैसा दे तो बात अलग है।
अब इस पूरे माहौल में बात का सिरा वहां मिलाएं जहां से हमने बात शुरू की थी। आज साहित्य का बाज़ार  गरम है और यह गर्माहट दलित साहित्य के उभार की वजह से आई है। इस समय दलित साहित्य सबसे ज्यादा छापा, पढ़ा और खरीदा जा रहा है। दलित साहित्य का एक ज्वार सा उठ रहा है। दलित साहित्य के पटल पर लगातार नए दलित लेखकों और नई दलित रचनाओं का आगमन हो रहा है। इन सभी में मनुष्य की नई तरह से मुक्ति की छटपटाहट पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त हो रही है। यहां समाज बदलाव की एक बिल्कुल ही अलग दृष्टि है जो अब तक जान ली गई सभी दृष्टियों से ज्यादा गहरी और व्यापक है अपने तमाम अन्तरविरोधों और संकीर्णताओं के बावजूद दलित साहित्य एक आंदोलन है जो अपनी समग्रता में व्यापक मानवतावादी–मुक्तिकामी संघर्ष और स्वप्न का साहित्यिक रूप है जिसका उद्देश्य जातिविहीन, वर्ग विहीन और लेंगिक भेदभाव रहित प्रबुद्ध समाज का निर्माण है और जिसके मूल में ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी और साम्राज्यवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक सरोकारों और रूझानों के प्रति एक स्पष्ट और प्रखर प्रतिरोध है। इस मायने में यह व्यापक वैश्विक मानवीय और साहित्यिक सरोकारों का  आंदोलन है। और जो साहित्य आंदोलन बन जाता है वह समाज बदलाव की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाता है और ऐसा साहित्य समाज को आगे ले जाने वाली चेतना, दृष्टि और रचनात्मक ऊर्जा को उत्पन्न करता है। अपने अपने समयों में निर्गुण भक्ति आंदोलन, प्रगतिवादी साहित्य आंदोलन और क्रांतिकारी-जनवादी साहित्य आंदोलन ऐसी भूमिका निभा चुके हैं। अब समाज बदलाव की एक ऐसी ही भूमिका के प्रस्थान बिंदु पर आज दलित साहित्य खड़ा है। लेकिन आज खुद दलित साहित्य आंदोलन अपनी तमाम क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी ऊर्जा के बावजूद एक ज़बरदस्त चुनौती से बावस्ता है। और यह चुनौती है दलित लेखकों के लेखक के रूप में लेखकीय अधिकारों को स्थापित करने और उनके सम्मान के दोहण से मुक्ति। आज दलित लेखक दोहरे शोषण के शिकार हैं। एक तो अपने जीवन में जातिगत प्रवंचना और शोषण झेलते हैं। दूसरे उसी दुख-दर्द को श्रम करके लिखते हैं तो प्रकाशक उस पर उन्हें रायल्टी न देकर उनका दोहरा शोषण करता है । हालांकि स्थिति अभी भयावह है और दलित साहित्यकारों की तरफ़ से इसके प्रतिरोध की कोई सुगबुगाहट भी नहीं सुनाई पड़ती। लेकिन मुझे लगता है कि यथास्थिति में बदलाव इधर से ही आयेगा। मैं समझता हूं कि एक दो बातों पर अमल करके इस स्थिति का विरोध की शुरूआत की जा सकती है। मसलन तमाम दलित लेखक सभी उन प्रकाशकों का बायकाट कर सकते हैं जो लेखकों को पूरी रायल्टी नहीं दे रहे हैं, बिक्री का सही हिसाब –किताब नहीं रख रहे हैं, जो लेखकों के साथ किए गए अनुबंध का उल्लघन करते हैं। चूंकि गेंद अभी दलित लेखकों के पाले में है वो प्रकाशक पर दवाव डालने के लिए वो उसे अपनी रचनाएं देने से मना कर सकते हैं और अगर देते हैं तो अपनी शर्तों पर दें। एक और काम है जो किया जा सकता है  और वो काम है  लेखकों का एक प्रकाशन को-आपरेटिव बनाना। इसकी शुरूआत दलित लेखक कर सकते हैं। यह दलित लेखकों को प्रकाशकों के शोषण से मुक्ति दिला सकता है और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य भी कर सकता है।

2 comments:

  1. बहुत बेबाक लेख है..आमतौर पर कोई भी लेखक ऐसी बातें प्रकाशक और ब्राह्मणवादी संपादकों के खिलाफ नहीं कहता है..आपने बहुत विचारोत्तेजक सवाल उठाए हैं और सिर्फ सावला ही नही लेखकों के शोषण की पहचान कराइ है और ससे मुक्ति का रास्ता भी बताया है.. आसहा है आप इस शोषण से मुक्ति की दिशा में पहल भी करेंगे..

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