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Monday 2 January 2012

प्रथम दिलीप अश्क स्मृति सम्मान २०११”


 लेखकों द्वारा लेखकों के लिए शुरु किया गया पहला पुरस्कार है प्रथम दिलीप अश्क स्मृति  सम्मान २०११

प्रथम दिलीप अश्क स्मृति  सम्मान समारोह के विशिष्ट अतिथी और नेशनल कान्फेडेरेशन आफ दलित आरगेनाईज़ेशन्स के चेयरमैन  अशोक भारती ने कहा कि लेखकों द्वारा लेखकों के लिए शुरु किया गया पहला पुरस्कार है प्रथम दिलीप अश्क स्मृति  सम्मान। साहित्य , समाज तथा  जनांदोलन के सम्बन्ध में कुछ बहुत जरूरी और ज्वलंत सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिन समुदायों(दलित, आदिवासी , पिछड़े) ने हमारे  समाज की रचना की, इतिहास गढ़ा जब इतिहास लिखा जाता है तो वो कहाँ गायब हो जाते हैं ? उनकी पहचान का सवाल हमारे  साहित्य में नही है. एक 'साहित्यकार' के नाते हमारी भावनाएं निक्कमी , निगोड़ी और बनावटी क्यों हो जाती हैं? उन्होंने  कहा कि आज साहित्य  का और  साहित्यकारों का जनांदोलनों से कोई रिश्ता नही है. कालजयी कृतियाँ केवल आन्दोलन से पैदा होती हैं, खयाली दिमाग से नहीं। उन्होंने आगे कहा कि हमारे सामने सवाल है कि कैसे व्यापक जनसमुदाय की पीड़ा हमारे साहित्य में आये? हमारा साहित्य और साहित्यकार जनांदोलन में कैसे सहायक हो?

युवा कवयित्री रजनी अनुरागी को उनके प्रथम काव्य संग्रह ' बिना किसी भूमिका के' के लिए और युवा कवि मुकुल सरल को उनके प्रथम काव्य संग्रह 'उजाले का अँधेरा' के लिए ‘प्रथम दिलीप अश्क स्मृति  सम्मान २०११' की औपचारिक घोषणा करते हुए संज्ञान-सेंटर फार यंग राईटर्स के अध्यक्ष डॉ मुकेश मानस ने कहा कि दिलीप अश्क स्मृति सम्मान 2011’ इस बार सम्मिलित रूप से युवा रचनाकार रजनी अनुरागी और मुकुल सरल को दिया जा रहा है। हमारे लिये इस बात का निर्णय लेना बहुत ही मुश्किल था कि प्रस्तावित नामों में से ये पुरस्कार किसे दिया जाये। जिन युवा कवियों के नाम प्रस्तावित हुए हमारी नज़र में वे सभी बहुत ही प्रतिभावान कवि हैं। यह माना गया कि एक दलित कवि के नाम पर शुरू हुए इस पुरस्कार के लिये श्रेष्ठता का कोई पैमाना बनाना पूरे दलित समाज के ख़िलाफ़ जाना है। इस पुरस्कार का पैमाना स्वीकृति और प्रोत्साहन का पैमाना है। कविता के क्षेत्र में नई-नई युवा प्रतिभाओं को पहचानना और उनके रचनातमक कार्यों को स्वीकृत करना ही दिलीप अश्क स्मृति सम्मान का मुख्य मकसद है। यह पुरस्कार किसी एक ही कवि को देने की घोषणा हुई थी लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमने यह समझा कि यह पुरस्कार परंपरागत ढ़ंग से दिये जाने वाला पुरस्कार नहीं है। यह एक भिन्न किस्म का पुरस्कार है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हमें यह जरूरी लगा कि यह पुरस्कार एक पुरुष कवि और एक स्त्री कवि को दिया जाना चाहिए। इसी समझ के तहत  इस वर्ष का पुरस्कार रजनी अनुरागी और मुकुल सरल को दिया जा रहा हैं।  आशा है कि साहित्यिक और बौद्धिक जगत में हमारे निर्णय का स्वागत होगा। 
इस घोषणा के पश्चात् डॉ मुकेश मानस ने अपने समय के चर्चित कवि दिलीप अश्क के बारे में बोलते हुए बताया  कि दिलीप अश्क के साथ उन्होंने और उनके मित्र राज वाल्मीकि ने लम्बा समय बिताया. जिससे उन्हें उनकी कविता और  जीवन के बारे में नजदीकी से जानने का मौका मिला. हिन्दी के अनेक मूर्धन्य समकालीन कवियों के साथ कविता पाठ कर चुके, उनके साथ साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे और कवि दिलीप अश्क हिन्दी की मुख्य धारा में तो उपेक्षित ही रहे ही साथ ही दलित साहित्य आंदोलन भी उन्हें लगभग भुलाये हुए ही है। उनकी स्मृति को बनाए रखना भी इस पुरस्कार एक मकसद है। दिलीप अश्क ने उस समय हिन्दी में कविता लिखना शुरु किया जब हिन्दी में दलित साहित्य की कोई धमक नहीं थी। लेकिन उनकी कविताओं की विषयवस्तु आरम्भ से ही दलित समाज उसका यथार्थ है। एक जगह वे लिखते हैं-मुझसे जो चाहते हैं दुनिया वाले / उनकी चाहत से बहुत दूर हूं मैं/गा नहीं सकता इश्को-मुहब्बत के तराने,/कड़वे सच कहने को मजबूर हूं मैं
एक तरफ़ उनकी कविता दलित समाज की कटुतम सच्चाईयों से रुबरु कराती है तो दूसरी तरफ शोषणकारी सत्ता, भ्रष्ट राजनीति, धर्म के मनुष्यविरोधी सवरूप और साम्प्रदायिकता की खुलकर कर आलोचना करती है।दलित समाज केंद्रित होने के बावजूद उनकी कविताओं में विषय की विविधता है उसी तरह से उनकी कविताओं के फ़ार्म में भी बहुत विविधता है। उन्होंने गीत लिखे हैं, ग़ज़लें लिखी हैं, दोहे लिखें हैं , चौपदियां लिखीं हैं। दिलीप अश्क सिर्फ़ कवि ही नहीं थे। वह एक अच्छे गायक और चित्रकार भी थे लेकिन उनकी जीवन परिस्थितियों ने उनके पांवों में हमेशा जंजीरें डालीं और हमेशा उन्हें आगे बढ़ने से रोकती रहीं। शुक्र है कि उनकी काव्य लेखन बाधित नहीं हुआ। उनकी कविताओं का एक संग्रह सच खड़ा है सामने 2000 में प्रकाशित हो चुका है। उनके एक और  संग्रह मैंने झूठ नहीं बोला को आरोही द्वारा प्रकाशित किए जाने की योजना है।

मुकेश मानस  ने कहा कि दिलीप अश्क की स्मृति को बनाये रखने और उनकी कविता के सम्मान के लिए दिलीप जी की स्मृति  में 'दिलीप अश्क स्मृति सम्मान' सृजित किया गया है. किसी भी दलित कवि की याद में दिया जाने वाला यह पहला  सम्मान है जो लेखकों के द्वारा लेखकों को दिया जा रहा है। इसके बाद डॉ मुकेश मानस  ने उनकी कविताओं का पाठ भी किया.

           
तत्पश्चात वरिष्ठ  कवि नीलाभ ने रजनी अनुरागी की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि रजनी अनुरागी राजनीतिक रूप से सचेत कवयित्री हैं. वो अपने आस पास के जीवन को बहुत सचेत होकर देखती हैं और उसे अपनी कविता का विषय  बनाती  हैं. इसी क्रम में मुकुल सरल कि कविताओं के बारे में बोलते हुए नीलाभ ने कहा कि 'उजाले का अँधेरा' कविता में मुकुल  सवाल  उठाते हैं कि जो आज के समय का उजाला है उसमे कितना अँधेरा है? नीलाभ जी ने कहा कि समय और जिंदगी तेजी से बदल रही है, मुकुल जी ने इस बदली हुई जिन्दगी को चित्रित करने का काम किया है. नीलाभ ने कविता पर टिप्पड़ी करते हुए कहा कि कविता जब संस्थानों से निकल कर बाहर जाये सड़क पर,चौराहों पर संवाद करे तभी वो कविता है.
       

नीलाभ जी के वक्तव्य के बाद कार्यक्रम  के विशिष्ट अतिथि  अशोक भरती ने रजनी अनुरागी और मुकुल सरल को प्रशस्ति पत्र देकर तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ हिंदी कवि शिवमंगल सिद्धान्तकर ने  प्रतीक स्वरुप बुद्ध की प्रतिमा देकर दोनों कवियों को सम्मानित किया. 'दिलीप अश्क स्मृति सम्मान समिति' के सदस्य डॉ गोबिंद प्रसाद ने  दोनों कवियों को सम्मान राशि देकर सम्मानित किया.

 सम्मान ग्रहण  करने के बाद दोनों कवियों ने संज्ञान और 'दिलीप अश्क स्मृति सम्मान समिति' का आभार प्रकट किया और अपनी  कविताओं का वाचन किया. युवा कवि मुकुल सरल ने अपनी पुरस्कार राशि दिलीप अश्क की नई किताब छापने के लिए संज्ञान को वापिस दे दी । उनके इस कदम की सराहना की गई।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथी और नेशनल कान्फेडेरेशन आफ दलित आरगेनाईज़ेशन्स के चेयरमैन  अशोक भारती ने बोलते हुए साहित्य , समाज तथा  जनांदोलन के सम्बन्ध में कुछ बहुत जरूरी और ज्वलंत सवाल उठाए.उन्होंने कहा कि जिन समुदायों(दलित, आदिवासी , पिछड़े)ने हमारे  समाज की रचना की, इतिहास गढ़ा- जब इतिहास लिखा जाता है तो वो कहाँ गायब हो जाते हैं ? उनकी पहचान का सवाल हमारे  साहित्य में नही है. एक 'साहित्यकार' के नाते हमारी भावनाएं निक्कमी , निगोड़ी और बनावटी क्यों हो जाती हैं? उन्होंने  कहा कि आज साहित्य  का और  साहित्यकारों का जनांदोलनों से कोई रिश्ता नही है. कालजयी कृतियाँ केवल आन्दोलन से पैदा होती हैं, खयाली दिमाग से नहीं. उन्होंने आगे कहा कि हमारे सामने सवाल है कि कैसे व्यापक जनसमुदाय की पीड़ा हमारे साहित्य में आये? हमारा साहित्य और साहित्यकार जनांदोलन में कैसे सहायक हो? अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ  हिंदी कवि शिवमंगल सिद्धान्तकर  ने बोलते हुए कहा कि अशोक भारती ने जो सवाल उठाए हैं वो बड़े सवाल हैं. इन सवालों पर विचार होना चाहिए. उन्होंने कहा कि इतिहास हमेशा विजयी के कब्जे  में रहा है. हम लड़ेंगे और दृश्यों को मेहनतकश के पक्ष में बदलेंगे. उन्होंने कहा कि हिंदी भवन सभागार में कवि दिलीप अश्क का छवि चित्र लगाये जाने का मै प्रस्ताव  करता हूँ और इसके लिए हम लड़ाई लड़ेंगे. धन्यवाद् ज्ञापन डॉ गोबिंद प्रसाद ने तथा कार्यक्रम  का संचालन संज्ञान की सदस्य रेणु हुसैन ने किया. 
                                                                                                                                      
प्रस्तुति: अरुण कुमार प्रियम           
 
Arun Kumar Priyam

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