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Saturday 14 January 2012

झारखंडी आदिवासी जनता का सांस्कृतिक नायक : जीतन मरांडी


झारखंडी आदिवासी जनता का सांस्कृतिक नायक  : जीतन मरांडी
मुकेश मानस

झारखंड के संस्कृतिककर्मी जीतन मरांडी को कोर्ट ने बरी कर दिया। यह वही जीतन मरांडी हैं जिनको 2008 में झूठे केस में फंसा कर फाँसी की सजा दे दी गई। 1947 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी सांस्कृतिककर्मी को फांसी की सजा दी गई है। असल में जीतन मरांडी पिछले 15 सालों से झारखंड में जल जंगल जमीन की खुली लूट के बारे में पूरे झारखंड में घूम घूमकर अपने गानों के ज़रिए सच्चाई उजागर करते आदिवासियों को जाग्रत कर रहे थे और इसीलिए लूट्खोरों और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की आंख की किरकिरी बने हुए थे।
स्वतंत्र और प्रगतिशील विचारक, कलाकार और लेखक जब सत्ता की लूट और शोषण की पोल खोलने लगते हैं तो सत्ता उनके साथ किस तरह से पेश आती है इसका जीता-जागता और हालिया उदाहरण है जीतन मरांडी जिसकी आवाज़ को चुप कराने के लिए झारखंड के गिरडीह जिले की अदालत ने बिना गवाहों की जांच किए, आरोपी पक्ष के तमाम सबूतों को देखे-सुने बिना अफरा-तफ़री में मौत की सजा सुना दी। लेकिन अगली अदालत में जिस आरोप के बूते जीतन मरांडी को फांसी सजा सुनाई गई वह एकदम बेबुनियाद और निराधार साबित हुआ। इससे यह साबित नहीं होता कि अदालतें अपना काम ठीक से करने लगी हैं उपर की अदालत में ठीक से सुन्वाई हुई, त्माम तथ्यों  को जाँच-परखा गया और उन्हें बरी कर दिया गया इसकी एक बड़ी वजह है अदालत और प्रशासन पर जनता और उसके जनांदोलन का दवाब्। गिरडीह कोर्ट के निर्णय का विरोध झारखंड में नहीं पूरे भारत में और दुनिया के कई देशों में हुआ जिसने भारत और रांची कि सत्ता को यह निर्णय बदलने पर मजबूर किया।
जीतन मरांडी आज झारखंड में ही नहीं पूरे भारत में एक जनप्रिय लोक कलाकार के रूप में जाने जाते हैं। 15 वर्षों के अपने सांस्कृतिक जीवन में उन्होंने झारखंड के आदिवासी समाज में चेतना की वो आग वो उर्जा पैदा कि वो अपने आप में एक जन आंदोलन बन गए। बहुत कम मामलों में ऐसा देखने में  आता है कि जब कोई कलाकार खुद एक ताकतवर कद बन जाए कि सत्ता उसके विचारों और रचनात्मक कामों से भय खाने लगे। आज झारखंड के लिए जीतन मारांडी एक ऐसा ही शख्स है। उनकी पत्नी अपर्णा लिखतीं हैं- “मेरे पति की गिरफ़्तारी का मूल कारण है कि इनके गीतों और लेखों में आदिवासियों और मूल निवासियों की करूण कहानी का दर्द भरा है…… इन्होंने जल, जंगल, जमीन के प्रति गलत नीतियों के खिलाफ़ और इससे आदिवसियों पर पड़ने वाले कुप्रभावों के बारे में लिखा और गाया है।”
झारखंड और उसमें रहने वाली आदिवासी आबादी की बदहाली अब किसी से छुपी नहीं है। जल, जंगल, जमीन की लूट अंग्रेज़ों के जमाने से चली आ रही है, आजादी के बाद यह और बढ़ी और स्वतंत्र झारखंड के अस्तित्व में आने के बाद तो इस लूट से झारखंड त्राहि-त्राहि कर उठा है। लेकिन जिस तरह से आदिवासियों और उनके जल, जंगल, जमीन की लूट का क्रम है उसी तरह से शोषक के खिलाफ बिरसा मुंडा से लेकर  उनके स्वत: स्फूर्त और संगठित रूप से उठ खड़े होने का भी क्रम है और सांस्कृतिक कर्म उनके इस संघर्ष का सबसे बड़ा हथियार है जिससे सत्ता सबसे ज्यादा भय खाती है।
जीतन मरांडी की कहानी थोड़े हेर-फेर के साथ एक आम जागरूक झारखंडी आदिवासी की कहानी है। एक संथाल परिवार में पैदा हुए जीतन मरांडी पढ़ने की इच्छा के बावजूद तीसरी कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए। समाज के और देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के सानिध्य में आकर उनमें पढ़ने-लिखने की इच्छा तीव्र हुई। फिर कविता और गीत लिखने और गाने लगे। आदिवासी समाज की समस्यायें, पीड़ाएं  और उसका शोषण जीतन मरांडी के गीतों मुख्य विषय रहा है। आदिवासियों का दर्द ही उनके गीतों की केन्द्रीय भावभूमि थी। एक गीत में उन्होंने लिखा है…..”आवा-आव क्रांति के डगर में/चला –चला संगठन बनावा/तिलक-दहेज के मिटावा।” ध्यान दीजीये तिलक–दहेज उनके लिए कितनी बड़ी समस्या है और उसके खिलाफ खड़े होना ही उनके लिए क्रांति है। लेकिन जैसे –जैसे उनका राजनीतिक विकास होता गया वो आदिवासियों की बदहाली के गहरे कारणों को भी अच्छी तरह से समझने लगे। यहीं से एक और जीतन मरांडी की शुरुआत होती है जो आज झारखंडी आदिवासी जनता का सांस्कृतिक नायक है।
1984 में गठित एभेन(जागृति) संस्कृति मंच में शामिल हुए जो उनके नेतृत्व में एक ताकतवर सांस्कृतिक मंच बना। बच्चे और युवा उनके गीतों और कला प्रदर्शन से आकर्षित होकर उनके इर्द-गिर्द जुटते हए। उनकी सांस्कृतिक टोलियां बनती गईं और झारखंड एभेन मजबूत होता गया। बाद में एभेन बिहार क्रांतिकारी सांस्कृतिक संघ से सम्बद्ध हो गया।
जीतन मरांडी ने गांव-गांव घूमकर आदिवासियों की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना को न सिर्फ़ उन्नत किया बल्कि उसे वैज्ञानिक और तर्क़पूर्ण भी बनाया। उनके नेततृत्व में एभेन ने नशाखोरी, दहेज प्रथा, अन्धविश्वास और नारी शोषण के खिलाफ बिगुल बजाकर आदिवासी समाज को भीतर से मजबूत किया और उसे जल, जंगल और जमीन के लूट के खिलाफ संघर्षरत होने के लिए जाग्रत भी किया। उनके अपनी एक और कविता में वह कहते हैं…“झारखंड में भरा पूरा संपत्ति देखा रे/देशी–विदेशी पूंजी हाथ जोड़ी रे/झारखांड का सरकार देशी-विदेशी/संग हाथ जोड़ कर बेची देलाय रे” और एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है…“झारखंडी-झारखंडी मजदूरो किसान/जिंदल-मित्तल टाटा के भगावा/अर्जुन मुंडा बड़ा गुंडा पूज़ीपति के दलाल/विकास नामे विकास नामे झारखड के लूटेला”
इससे ज्यादा स्पष्ट और ताकतवर कविता और क्या हो सकती है। आदिवासियों की लूट में झारखंड में भारतीय पूज़ीपतियों, राजनेताओं से लेकर अब साम्राज्यवादी शक्तियां तक शामिल हो गई हैं यह अब किसी से छुपा नहीं है। जीतन मरांडी अपनी कविता में वही कह रहे हैं जो एक आम झारखंडी भी जानता है। यह झारखांड का आज का यथार्थ है। लेकिन इस सच का ब्यान करने के बाद ही जीतन मरांडी, उनकी कविता और उनके सांस्कृतिक कर्म की उस भूमिका की शुरुआत होती है जिससे सत्ता भय खाती है। सत्ता और पूजीपतियों की मिली-जुली लूट और शोषण के खिलाफ़ अदिवासियों को जागरूक करना ही जीतन मारांडी के गीतों की ताकत है। अपने सक्रिय सांस्कृतिक कर्म से जीतन मरांडी ने पूरे झारखंड में एक हलचल पैदा कर दी जिससे झारखंडी शासन और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों में घबराहट फैलने लगी।

जीतन मरांडी ने 2008 में प्रभात खबर में ‘झारखंड में नक्सलवाद पर एक नज़र’ शीर्षक से एक लम्बा लेख लिखा जो कई किश्तों में छपा। इस लेख में उन्होंने आदिवासी जनता की बदहाली के कारण, जल जंगल जमीन की लूट और सत्ता के राजकीय दमन –शोषण का वर्णन किया है। जीतन मरांडी का यह लेख झारखंड की धरती पर जारी वर्ग-संघर्ष और राज्य के हिंसक दमन को रेखांकित करता है। इस लेख के छपने के बाद प्रशासन उन पर पैनी नज़र रखने लगा जिसका परिणाम अंतत: उनकी गिरफ़्तारी और झूठे मामले में उन्हें फँसा कर फाँसी की सजा सुनाने में हुआ।
पीपुल्स वायस मासिक में प्रकाशित 

1 comment:

  1. सार्थक , सामयिक पोस्ट, आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर अपना स्नेहाशीष प्रदान करें

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