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Wednesday 18 April 2012

मेरी कुछ नई कविताएं

Photos by Mahesh Basedia

एक ही साथ
जो सही मानकर करता हूँ वो होता है गलत साबित
और गलत जो होता है उसे कर पाता नहीं
गलत भी अक्सर सही सबित हो जाता है
हालात की दुश्वारियां हैं या मेरी लन्तरानियां
कि एक ही साथ सही और गलत होने को
अभिशप्त हूं मैं

दोस्तों के बीच हूं और दुशमनों के बीच भी
न दोस्तों को जानता न पहचान दुशमनों की है
दोस्त बहुत जल्दी ही दुश्मन हो जाता है
दुश्मन भी कभी कभी दोस्त बन जाता है
लोगों का नज़रिया है या मेरी बेवकूफियां
कि एक ही साथ दुश्मन और दोस्त होने को
अभिश्प्त हूँ मैं

गलती
मुझे सुख को बढ़ाने के बारे में सोचना था
मैं दुख घटाने के बारे में सोचता रहा

मुझे समृद्धि बढ़ाने के बारे में सोचना था
मैं गरीबी घटाने के बारे में सोचता रहा

मुझे सुरक्षा बढ़ाने के बारे में सोचना था
मैं असुरक्षा घटाने के बारे में सोचता रहा

मुझे भाईचारा बढ़ाने के बारे में सोचना था
मैं साम्प्रदायिकता घटाने के बारे में सोचता रहा

मुझे मानवीय विकास बढ़ाने के बारे में सोचना था
मैं मानवीय विनाश घटाने के बारे में सोचता रहा

ये कैसी आज़ादी मिली मुझको
जिसमें  मेरा अब तक का सारा जीवन
उस  गलती को सुधारने में गया
जो मैंने नहीं की
शायद यही मेरी गलती है
जनवरी 2012


राजनीतिक गरीबी

मैं अक्सर ही दे नही पाता
कुछ बेहद आसान सवालों के जवाब
मसलन आजकल इस देश का प्रधानमंत्री कौन है
मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी

उत्तर प्रदेश के दलितों का नेता कौन है
मायावती य सतीश मिश्रा

आधुनिक मध्यवर्ग की पहली पसंद क्या है
आसाराम बापू य मल्लिका शेरावत

इस देश में किनकी संख्या ज्यादा है
शनि, सांई और काली के मंदिरों की
या स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों की

अगर आप कहेंगे कि पहला जवाब सही है
तो मैं कहूंगा कि आपके पास  दिमाग ही नहीं है
अगर आप कहेंगे कि दूसरा जवाब सही है
तो मैं कहूंगा कि आपका दिमाग ठिकाने पे नहीं है

अगर  आप कहते हैं कि दोंनो जवाब सही हैं
तो मैं कहूंगा कि आपमें सही गलत  चुनने की क्षमता ही नहीं है
असल में हिन्दुस्तान के मध्यवर्ग चरित्र ही यही है
कि न तो वह गलत है और न सही है
वह एक साथ गलत भी है और सही भी
                                                       दिसम्बर 2011


1 comment:

  1. कवि के अपने अनुभवों से बहकर निकली सबकी हो गई हमारे समय की कविताएँ हैं यह. पहली कविता तो ऐसे लगता है जैसे मैं उसे पढ़ नहीं रहा बल्कि खुद उसे जी रहा हूँ.

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