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Friday 15 March 2013

पब्लिक स्कूलों के बच्चे अक्सर रट्टू होते हैं

मुकेश मानस

आमतौर पर पब्लिक स्कूलों से पढ़कर आने वाले विद्यार्थी मोटी कमाई वाले और हाई प्रोफाईल माने जाने वाले पाठ्यक्र्मों में ही नामांकन कराते हैं और बाकी विद्यार्थी लो प्रोफाईल पाठ्यक्रमों  में। ऐसा माना जाता है कि किसी शहरी गांव और कालोनियों में रहने वाले, निम्न मध्यवर्गीय आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले और किसी सरकारी या सस्ते प्राईवेट स्कूलों में पढ़कर आये विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने या पढ़ाई-लिखाई के प्रति गंभीर नहीं होते। वे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मसलों के प्रति कम रुचि दिखाते हैं और अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति संवेदनशीलता भी उनमें कम होती है। इनकी तुलना में पाश इलाकों मे रहने वाले और अच्छे पब्लिक स्कूलों से पढ़कर आने वाले विद्यार्थी उपरोक्त बातों के प्रति बहुत ही ग़ंभीर और संवेदनशील होते हैं। इस बारे में मेरी राय और मेरा तजुर्बा एकदम उलटा है।  

मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जिस कालेज में पढ़ाता हूँ वहां अपने अपने विषय को पढ़ाने के लिए हमेशा ऐसा तरीका ढ़ूँढता रहता हूँ जिसमें विद्यार्थीयों को ज्यादा से ज्यादा दिमाग लगाना पड़े और उन्हें सक्रिय होना पड़े। मेरी इसी आदत की वजह से इन हाई प्रोफाईल पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को हमेशा मुश्किल पेश आती है। किसी भी विषय को समझने समझाने की सरलतम विधि मेरी यह होती है कि मैं अपने लेक्चर की शुरुआत उस विषय के बारे में उन्हीं की समझ से करता हूँ। मसलन अगर कक्षा में मुझे यह पढ़ाना होता है कि पत्र किसे कहते और यह कितनी तरह का हो सकता है। असल में इस शुरुआत से मुझे उन्हें उनके पाठ्यक्रम में लगे व्यवसायिक पत्र लेखन तक ले जाना होता है। मैं अगर चाहूँ तो उन्हें पाठ्य-पुस्तक में लिखी व्यवसायिक पत्र की एक परिभाषा बताकर और बोर्ड पर पत्र के प्रकार लिखकर इस काम की इति कर सकता हूँ। अध्यापन के पारंपरिक चलन के अनुसार यह सबसे आसान, लोकप्रिय और छात्रोपयोगी तरीका माना जाता है। और ये विद्यार्थी भी ऐसा ही चाहते हैं। मगर मैं ऐसा नहीं करता। यह मेरा तरीका नहीं है। मैं अपने ही तरीके से लेक्चर की शुरुआत करता हूँ। मेरा यह तरीका इन विद्यार्थियों को एक असुविधाजनक क्षेत्र में ले जाता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वे कभी तैयार नहीं होते शुरू में अक्सर दोपांच मिनट तक कक्षा में चुप्पी छा जाती है। सब एक दूसरे का मुंह तकने लगते हैं। फिर मेरे प्रोत्साहित करने पर एक-आध विद्यार्थी एक बेहद बचकानी, (अपवादस्वरूप कभी कभी गंभीर भी) शुरुआत करता है। उसके बाद कुछ और विद्यार्थी बहस में शमिल होने लगते हैं लेकिन एकदम अगंभीर तरीके से। यह बहस किसी भी बेहद आसान सी चीज को समझने की बजाए एक दूसरे पर छींटाकशी करने, एक दूसरे को कौंचने की या एक दूसरे का मजाक़ बनाने की होने लगती है। फिर कक्षा में चिल्ल-पौं मच जाती। ऐसा लगने लगता है कि वह ग्रेजुएटों की मेरी कक्षा किसी प्राईवेट स्कूल की पहली या दूसरी क्लास हो। फिर मैं इस कक्षा को लगातार एक गंभीर कक्षा में बदलने के लिए संघर्ष करने लगता हूँ। एक लम्बे संघर्ष के बाद बड़ी मुश्किल से पूरे पचास मिनट के पीरियड में इस क्क्षा को इस समझ तक ले जा पाता हूँ कि पत्र किसे कहते हैं और यह कितने प्रकार का हो सकता है।

सबसे बड़ी मुश्किल तब होती है जब मैं किसी विषय पर हुई हमारी पूरी बातचीत के सार को उनसे अपनी कापी में लिखने को कहता हूँ। इसके लिए ये विद्यार्थी एकदम से और आराम से तैयार नहीं होते। वे काफी देर तक मेरा मुँह ताकते रहते हैं। जब मैं अपनी बात दुहराता हूँ तब जाकर उन्हें लगता है कि मैं सचमुच उन्हें लिखने के लिए कह रहा हूँ। उनकी सुविधा के लिए मुझे कई-कई बार पूरी बातचीत को दुहराना होता है। चार-पांच बार दुहराने के बाद भी केवल कुछ ही विद्यार्थी होते हैं जो बातचीत के सार को लिखने लगते हैं या लिख पाते हैं। ज्यादातर विद्यार्थीयों से मुझे यह सुनने को मिलता है कि सर लिखवाने की क्या जरूरत है। किताब में सब लिखा ही है। आप किताब में ही निशान लगवा दो। हम वहीं से लिख लेंगे। जब मैं उनपर लिखने के लिए दवाब डालता हूँ तो उनका जवाब होता है कि सर हम हिन्दी में नहीं लिख सकते। हम हिन्दी लिखना भूल गये हैं। ये बात वो विद्यार्थियों कहते हैं जो हाई-प्रोफाईल स्कूलों से स्कूल से दसवीं या बारहवीं तक हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़कर आये हैं। लेकिन मैं हार नहीं मानता। जब मैं उनसे बातचीत के सार को अंगेज़ी में लिखने के लिए कहता हूँ तो मुझे यह देखकर और आश्चर्य होता है जब वे उस सार को अंगेज़ी में भी ठीक से नहीं लिख पाते। अगर मैं उन्हें मैं खुद बोलकर लिखवाने की कोशिश करता हूँ तो मुझे एक ही पंक्ति को बार-बार दुहराना पड़ता है। बहुत धीमी गति में बोलने पर भी वह एक पूरा वाक्य ठीक से सुन नहीं पाते। 

असल में पब्लिक स्कूलों से पढ़कर आने वाले बच्चे कुंजीनुमा किताबों से पढ़ने, तयशुदा परिभाषाओं, व्याख्याओं को रटने, ज्यादा से ज्यादा अंक पाने की विधियां जानने और दिमाग पर ज्यादा जोर डालने के आदी होकर कालेज में पहुँचते हैं। वे कालेज में यही तरीके अपनाना चाहते हैं। इन विद्यार्थियों में बहुत ही कम बच्चे पाठ्य पुस्तक खरीदते है। ज्यादातर विद्यार्थी हिन्दी की नहीं अन्य विषयों की भी सिर्फ कुंजी खरीदना ही उचित समझते हैं। पाठय पुस्तक की बजाए वे मुझसे सबसे अच्छी कुंजी के बारे में पूछते हैं। मेरे बार-बार यह कहने के बावजूद कि अगर वे किसी विषय पर मेरी बताई बातें गृह परीक्षा में लिखेंगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। लेकिन वे गृह परिक्षाओं में कुंजियों से रटे गए उत्तर ही लिखते हैं। मध्यावधि और वार्षिक परिक्षाओं के दौरान ज्यादातर बच्चों की कोशिश यही रहती है कि मैं उन्हें कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न बता दूँ जिन्हें रटकर वे ज्यादा से ज्यादा अंक ले आएं। उनका ध्यान अपना ज्ञान बढ़ाने पर नहीं होता बल्कि ज्यादा से ज्यादा अंक लाने पर रहता है। ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं प्राप्त करना, ज्यादा से ज्यादा अंक लाना और कक्षा में टाप करना ही उनके लिए ज्ञान और सफलता का पैमाना होता है।

पब्लिक स्कूलों से पढ़कर आने वाले इन विद्यार्थियों के साथ किसी ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनीतिक विषय पर बात करना एक टेढ़ी खीर होती है। अक्सर कोई पाठ पढ़ाते वक्त संदर्भ के लिए किसी ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनीतिक विषय पर बात करना लाज़मी हो जाता है। ऐसे किसी संदर्भ पर बातचीत शुरु करते ही वे ऊंघने लगते हैं या अरुचि का प्रदर्शन करने लगते हैं। बहुत ही जल्दी उनका धैर्य उनका साथ छोड़ जाता है और आपस में बातचीत और छेड़खानी शुरु कर देते हैं। अक्सर उनकी कोशिश रहती है कि मैं उन्हें कुछ बोलने, लिखने या कुछ करने के लिए ना कह दूँ। आमतौर पर ये विद्यार्थी सवाल ही नहीं पूछते और कभी कभार पूछ्ते भी हैं तो वे सवाल बेहद बचकाने और अक्सर ही विषय से हटकर होते हैं। कभीकभी तो ऐसा भी होता है कि उनके सवाल पूरी बातचीत को ही मज़ाक बना देते हैं। ऐसा लगता है मानों उन्होंने मेरी बातचीत सुनी ही ना हो।

निम्न वर्गीय पृष्ठ्भूमि और सरकारी स्कूलों से आने वाले बच्चों के साथ मुझे आशा से कहीं ज्यादा अच्छा रेस्पान्स मिलता है। इन विद्यार्थियों को एकाग्रचित्त करने में मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। वे पूरी सजगता और शांति के साथ मेरी बातचीत सुनते हैं और उससे जुड़े सवाल पूछने से भी नहीं चूकते। और आम तौर पर उनके सवाल बेहद गंभीर होते हैं। ऐसे सवालों से मुझे अपनी बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है। ज्यादातर बच्चे पाठ आधारित किसी भी गतिविधी या कक्षा कार्य में पूरी तल्लीनता के साथ शामिल होते हैं। अगर मैं उन्हें कुछ सुनने के लिए कहता हूँ तो पूरे ध्यान से सुनते हैं। अगर मैं उन्हें किसी विषय पर कुछ बोलने के लिए कहता हूँ तो जैसा उन्हें समझ आता है वे बोलते हैं। मैं उन्हें कुछ लिखने के लिए कहता हूँ वे लिखते हैं। उन्हें ऐसी गतिविधियां या कक्षा कार्य अच्छे लगते हैं जिनमें उन्हें अपने विचार रखने या लिखने का मौका मिले। खासतौर पर ऐतिहासिक और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आधारित बातचीत में वे पूरी दिलचस्पी लेते हैं और अक्सर ही बातचीत को अपने आस-पास घटित किसी किसी घटना या संदर्भ से जोड़ देते हैं। उनमें किसी भी मसले के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की ललक दिखाई पड़ती है।
  
शुक्रवार साप्ताहिक के 7 फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित

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