Total Pageviews

Saturday 6 April 2013

बौद्धिक क्षमता नापने का दावा एक भ्रामक कवायद है


 
मुकेश मानस

लन्दन में रहने वाली भारतीय मूल की एक बारह वर्षीय लड़की ने हाल ही में दिए एक बौद्धिक स्तर मापने वाले मेन्सा टेस्ट में अपनी उम्र के स्तर के हिसाब से अधिकतम 162 अंक लेकर सबको हैरानी में डाल दिया। पेशे से डाक्टर भारतीय दंपत्ति की बेटी नेहा राम 162 अंक लेकर रातों रात ब्रिटेन के अधिकतम बौद्धिक क्षमता वाले लोगों की सूची में सबसे ऊपर पहुंच गई। इसका मतलब यह हुआ कि नेहा राम की बौद्धिक क्षमता इस टेस्ट के मुताबिक महान वैज्ञानिक आईंस्टीन, भौतिकीविद स्टिफ़न हाकिंग और माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेटस से भी ज्यादा हैं।

ध्यान देने की बात यह है कि मेन्सा के ब्रिटेन प्रवक्ता के बयान में नेहा राम की बौद्धिक क्षमता के स्तर की तुलना जिन तीन लोगों से की गई है उन तीनों में से किसी ने भी कभी ऐसा कोई टेस्ट नहीं दिया जिससे उनकी बौद्धिक क्षमता के स्तर को आंका गया हो। आईंस्टीन के समय में बौद्धिक क्षमता को मापने का ऐसा कोई आधुनिक टेस्ट मौजूद ही नहीं था। लेकिन ऐसे परीक्षणों की पैरवी करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी बौद्धिक क्षमता का स्तर लगभग 160 अंकों के आस-पास रहा होगा। स्टीफ़न हाकिन्स और बिल गेट्स की बौद्धिक क्षमता के बारे में भी लगभग यही धारणा है। यह बात अलग है कि ये दोनों महनुभाव अभी ज़िन्दा हैं और इन्होंने भी आज तक अभी ऐसा कोई टेस्ट नहीं दिया जिससे इनकी बौद्धिक क्षमता के स्तर का पता चल सके।

किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता के स्तर को मापने की जरुरत और उसको मापने का कोई पैमाना बनाना पूंजीवादी आधुनिकतावाद के मानव विकास के दृष्टिकोण की ही एक उपज है। दुनिया भर में पूंजीवादी समाज व्यवस्था के उभार और उसके तेजी से विकास के साथ ही मनुष्य की मानसिक क्षमताओं को जानने और उन्हें विभिन्न तरीके से मापने की कवायद की शुरुआत होती है। शुरुआत में किसी बच्चे की शारीरिक उम्र की तुलना में उसके शैक्षणिक (सीमित अर्थों में मानसिक भी) विकास को जांचने के लिए अलग-अलग स्तर पर अलग अलग विषयीगत मूल्यांकन पद्धतियां अपनाई जाने लगी। बच्चों की उम्र के हिसाब से शिक्षाविदों और अध्यापकों ने कुछ मूल्यांकन विधियां और मापक बनाये ताकि एक बच्चे की बौद्धिक क्षमता का बाकी बच्चों की तुलना में एक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सके। इन मूल्यांकन पद्धति पर पूरी दुनिया में आज तक बहस जारी है क्योंकि किसी न किसी मायने में ये व्यस्कों और व्यवस्थापकों, प्रशासनिकों द्वारा तय किए गये मानक होते हैं जिनकी अपनी सीमाएं होती हैं। हम पूरी दुनिया के इतिहास में गैलिलियो, न्यूटन, थामस एडीसन आदि से लेकर बिल गेट्स तक ऐसी हज़ारों हस्तियां हैं जो या तो कभी नहीं जा पाईं या गई तो उन्हें स्कूल में नाकारा घोषित किए गया या जिन्हें स्कूल छोड़ देना पड़ा लेकिन मानवीय सभ्यता के विकास में उनका योगदान अतुलनीय है। ऐसे लोगों की तादात सिर्फ़ विज्ञान के इलाके में ही नहीं बल्कि साहित्य, कला, संस्कृति, समाज और राजनीति के इलाकों तक फैली हुई है। 

बौद्धिक क्षमता मापने के शैक्षिक मानकों की सीमित अर्थों में ही सही एक सकारात्मक भूमिका भी देखी जाती रही है। इनसे बच्चों की बौद्धिक क्षमता को समझने और उसके विकास को तीव्र करने के मामले में तेजी आई। तब माना जाने लगा की शैक्षिक जगत में प्रयोग की जाने वाली इन मूल्यांकन विधियों और मानकों का महत्वपूर्ण कार्य उन विध्यार्थियों की शिनाख्त करना है जो इन तथाकथित मापकों और मानकों के स्तर से पीछे रह जाते हैं और जिनको ज्यादा प्रोत्साहन, देखभाल और अतिरिक्त ध्यान की आवश्यक्ता है। हालांकि यह पूरी मान्यता भी अपने आपमें किसी हद तक भ्रामक है क्योंकि किसी बच्चे बौद्धिक स्तर को किसी खास पैटर्न पर मापना उसकी पूरी बौद्धिक क्षमता का मापा जाना नहीं। यह भी देखा गया है कि मूल्यांकन में भी बच्चे के मूड, वातावरण और उसकी स्थिति की वजह से काफी फर्क पाए जाते हैं। लेकिन इस विचार ने शैक्षिक जगत में काफी परिवर्तन किए है। मारिया मान्टेंसरी से लेकर जान होल्ट और गिजुभाई तक तमाम शिक्षाविदों ने बच्चों की बौद्धिक क्षमता को समझने और और उसे विकसित करने की दिशा में नए विचार, नया चिंतन और नई पद्धतियां दीं।

शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा क्रांतिकारी विचार बच्चे के सर्वांग़ीण विकास का विचार है। लेकिन पूंजीवादी संस्कृति की दुनिया में अभी भी बच्चों की श्रेणियां बनाने और उन्हें कथित बौद्धिक स्तर के मानकों द्वारा बांटने की संस्कृति ही हावी है। शिक्षा और मनोविज्ञान के क्षेत्र से शुरु होकर मानसिक स्तर नापने की कवायद अंतत: विज्ञान, ग़णित और तकनीक के क्षेत्र से होता हुआ यह कार्य अब विज्ञान और व्यापार संबंधी कार्यों के लिए ज्यादा स्तरीय बौद्धिक क्षमता वाले पेशेवर तलाशने का माध्यम बन गया है। आज पूरी दुनिया में ऐसे हजारों टेस्टों की बाढ़ सी आ गई है जो अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषताओं और जरूरतों के हिसाब से व्यक्ति विशेष के बौद्धिक स्तर को नापने का दावा करते हैं। हालांकि बौद्धिक स्तर मापने वाले इन तथाकथित के विषयों, विधियों और मानकों की लगातार आलोचना होती रही है।

दुनिया भर के तमाम शिक्षाविदों का मानना है कि किसी व्यक्ति विशेष की सम्पूर्ण बौद्धिक क्षमता को जाना ही नहीं जा सकता, केवल किसी क्षेत्र विशेष में उसकी सीमित बौद्धिक क्षमता को जाना जा सकता है और उसे किसी व्यक्ति की पूर्ण बौद्धिक क्षमता नहीं माना जा सकता है। बौद्धिक क्षमता मापने का दावा करने वाले ये ज्यादातर टेस्ट पहले से तयशुदा तरीके से ज्ञान के कुछ सीमित विषयों और विधियों पर आधारित मूल्यांकन ही कर सकते हैं जो कभी भी शक के दायरे से बाहर नहीं रहता। अक्सर किसी के बौद्धिक क्षमता के स्तर की तुलना किसी वैज्ञानिक, गणितज्ञ अथवा तकनीकविद से ही की जाती है किसी चित्रकार, किसी संगीतज्ञ, किसी साहित्य्कार के साथ क्यों नहीं की जाती? कला, संगीत, दर्शन, साहित्य आदि इलाकों में अग्रणी लोगों की बौद्धिक क्षमता कैसे नापी जायेगी। इन क्षेत्रों के व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता को मापने का पैमाना क्या होगा? फसल उगाने वाले किसान और बड़ी इमारतें खड़ी करने वाले मजदूर की बौद्धिक क्षमताओं को कैसे मापा जायेगा?। इन तथाकथित पैमानों के आधार पर तो वे तो यहां लगभग फेल ही हो जायेंगे। तो क्या ये मान लिया जाये कि शेक्स्पियर, तोलस्तोय से लेकर पिकासो और सत्यजीत रे तक किसी में भी बौद्धिक क्षमता है ही नहीं। और इन टेस्टों के निराधार होने का पैमाना ये है कि यह सिर्फ़ पढ़े-लिखे लोगों या बच्चों की बौद्धिक क्षमता ही नाप सकते हैं। क्या ये मान लिया जाये कि दुनिया भर में जो व्यस्कों और बच्चों की जो आबादी अनपढ़ अथवा बेहद कम पढ़ी-लिखी है उसका कोई बौद्धिक स्तर है ही नहीं। फिर किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को महज कुछ गतिविधियों के सहारे कुछ अंकों में कैसे परिवर्तित किया जा सकता है? अंकों का पूरा मामला ही भ्रामक है।

दरअसल, एक विशेष प्रकार के टेस्ट द्वारा किसी की बौद्धिक क्षमता को नापने का दावा करना भ्रामक ही नहीं यह पूजीवादी दुनिया में बच्चों में विभेदीकरण करने का तरीका है। बौद्धिक क्षमता को मापने की पूरी कवायद उनके बीच में एक प्रतियोगितावादी मानसिकता पैदा करना और उन्हें अमानवीय होती जा रही बाजारवादी भीड़ में एक सर्वाधिक बिकाउ उत्पाद में बदल देने की कवायद है। बौद्धिक क्षमता नापने की ऐसी भ्रामक कवायदों को ही आधार बनाकर प्रतिभा का सवाल बनाकर आरक्षण का विरोध किया जाता है।

शुक्रवार साप्ताहिक के 21मार्च, 2013 अंक में प्रकाशित

1 comment:

  1. प्यारा ब्लाग बधाई

    ReplyDelete