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Friday 7 June 2013

मेरा पहला सामाजिक एक्सपोज़र




मुकेश मानस

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कालेज के द्वितीय  वर्ष में मेरा संपर्क इन्डो-जर्मन सोसियल सर्विस सोसाइटी में स्मार्इल कार्यक्रम चलाने वाले लोगों से हुआ। यह कार्यक्रम शहरी एवं कालेज के छात्रों के लिये था। तीन दिन के एक ओरियन्टेशन प्रोग्राम के बाद मुझे पशिचम बंगाल में कार्यरत एक सामाजिक संस्थान 'लैम्प’ में जाने के लिए चुना गया। यह एक तरह का स्टडी टूर था जिसमें मुझे पशिचम बंगाल के संथाल आदिवासियों के सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को देखना और जानना था।  

 

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मेरी पहली लम्बी रेलयात्रा थी और इसमें कहीं कोर्इ गड़बड़ ना हो जाये इसलिए अपनी सुविधा को देखते हुए मैं रेलगाड़ी छूटने के नियत समय से लगभग दो घन्टे पहले नर्इ दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा। ट्रेन में अपनी आरक्षित जगह पर बैठा। रेलगाड़ी ठीक समय पर चली। मैंने अपने आस-पास बैठे लोगों से बातचीत शुरु की और जल्दी ही मैं उनके बीच में घुल मिल गया। मेरी सीट के सामने वाली सीट पर एक मेरी ही उम्र का नवयुवक बैठा था। वह पुरी जा रहा था। वह उड़ीसा का ही रहने वाला था। हमारे पूरे कंपार्टमेन्ट में एक पूरा का पूरा परिवार था जो पुरी मंदिर के दर्शनार्थ जा रहा था। इस परिवार में बूढ़े-माता-पिता उनके दो लड़के, दोनों लड़कों की पतिनयाँ  एवं दो बच्चे एक सात वर्षीय लड़की एवं तीन वर्ष की गोल-महोल से मुँहवाली भोले सी लड़की थी।

            मैं और सुशांत मेरे सामने वाली सीट वाला लड़का जल्दी ही मित्र बन गये। सुशांत ने बातचीत में बताया कि वह चंडीगढ़ में एयरक्राफ्ट इन्जीनियरिंग कर रहा था। अलीगढ़ से एक व्यकित हमारे डिब्बे में चढ़ा और हमदोनों के पास आकर हाथ जोड़कर कहने लगा कि वह बहुत बीमार है और उसकी टांगों के जोड़ों में बहुत दर्द है जिसके कारण वह खड़ा रहने में असमर्थ है। सुशांत ने मुझे अंग्रेजी में मना किया और बताया कि ऐसे लोगों पर जरा भी विश्वास नहीं करना चाहिए खासकर तब जब आप लंबी यात्रा कर रहे हों। ऐसे लोग अक्सर चोर उचक्के होते हैं। मगर मैं भावनाओं में बहने वाला कवि उस जैसे प्रैकिटकल इन्जीनियर की बात कब मानने वाला था। मैंने यह कहकर कि कोर्इ भी दो आदमी इस धरती पर एक जैसे नहीं होते है उस व्यक्ति को अपने साथ बिठा लिया। बातों-बातों में उस व्यकित ने बताया कि उसको गया जाना है। गया का नाम सुनकर सुशांत ने मुझे बताया कि गया चोर उचक्कों के लिए प्रसिद्ध है। मगर मैंने फिर भी चिन्ता नहीं की और पूरे सफर उस व्यक्ति की सच्चे मन से सेवा की। जहाँ कहीं भी किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकती मैं उसको चाय-पानी, फल इत्यादि लाकर देता। मैं उसके लिए जितना भावुक होता सुशांत मुझे उतना ही कोसता। गया आने से दो स्टेशन पहले मैं और सुशांत दोनों सो गऐ। गया निकल जाने के बाद जब हम उठे तो हमारे बैग गायब थे। सुशांत जानता था ऐसा हो सकता है मगर उसे मुझ पर काफी तरस आया क्योंकि मेरा विश्वास टूट चुका था।

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बांकुडा स्टेशन पर उतरकर मैंने सबसे पहले चाय पी। फिर स्टेशन पर ही लगभग आधे घंटे ये सोचकर इंतजार करता रहा कि कोर्इ ना कोर्इ मुझे लैंम्प से लेने आ जायेगा। मगर आधे-पौने घंटे तक जब कोर्इ नहीं आया तो मैं स्टेशन से बाहर निकला। बाहर दाँर्इ तरफ काफी संख्या में रिक्शे वाले खड़े थे।

“प्रताप बागान चलोगे?”- मैंने एक रिक्शे वाले को कहा

“प्रताप बागान” - उसने जिस तरह मेरे शब्दों को दुहराया उससे साफ जाहिर हो रहा था कि वह समझ गया है कि मैं कोर्इ परदेशी हूँ

 “हाँ-हाँ” -उसने जोर से कहा

“कितना लोगे?”-मैंने पूछा

“दोस टका”-उसने कहा

“दस” - मैं आश्चर्यचकित था।

 “ये तो बहुत ज्यादा है”

 मैं ये कहकर आगे बढ़ गया। लैम्प के महासचिव को जो मैंने पत्र लिखा था और उसके उत्तर में जो पत्र पाया था उसमें साफ-साफ लिखा था कि स्टेशन से प्रताप बागान तक का किराया केवल पाँच रुपये है और यदि कोर्इ रिक्शे वाला इससे ज्यादा मांगे तो ना दें।

            “चापो-चापो” - कहता हुआ रिक्शेवाला  मेरे पीछे-पीछे आ गया मैं रिक्शे पर बैठ गया। थोड़ी दूर जाने पर बाजार शुरू हुआ। मुझे बाजारों में दुकानों पर लगे बोर्ड पढ़ने में एक अजीब ही आनंद मिलता है मगर बोर्डों पर जो कुछ भी लिखा था मैं पढ़ नहीं पा रहा था। सुबह का वक्त था। बाजार में लगभग सभी दुकानें बंद थीं। केवल चाय सिगरेट की दुकानें खुली थीं। मैं बड़ी बोरियत के साथ बाजार की छोटी-बड़ी दुकानों व उनसे सटे भवनों की बनावट देखने का प्रयास कर रहा था। बाजार जहाँ खत्म होता है वहाँ एक चौराहा था। दाँर्इ तरफ जो गली थी उसमें रिक्शे वाला घुस गया और मुझे एक फैक्टरी के आगे उतार कर बोला- ''यही लैम्प की फैक्टरी है।” उसने बगला में बोलते हुए अंगुली उठाकर मुझे फैक्टरी के दरवाजे पर लगे बोर्ड को देखने का संकेत दिया। मैंने देखा बोर्ड अंग्रेजी और बंगाली भाषा में था। पढ़कर मुझे उस रिक्शेवाले पर बड़ी हँसी आर्इ वो मुझे सामाजिक संस्था लैम्प की जगह लैम्प बीड़ी कारखाना में ले आया था। मैंने वहाँ से गुजर रहे एक सज्जन से पूछा। पहले तो मैं झिझका क्योंकि मैं बंग्ला जानता नही था। फिर ये सोचा कि पता नहीं वो हिन्दी समझेंगे या नहीं। मगर शुक्र था कि उन सज्जन को हिन्दी समझ में आती थी और वे लैम्प के आफिस का पता भी जानते थे। उन्होंने बांग्ला में रिक्शेवाले को समझा दिया। मैंने उनको धन्यवाद दिया।

 

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इस बार उस रिक्शे वाले ने जिस जगह उतारा उसके बिल्कुल ठीक सामने ही एक इमारत थी उसके चारों तरफ दीवार थी जिसमें एक बड़ा-सा लोहे का दरवाजा था। उस दरवाजे के साथ एक छोटा-सा और लोहे का दरवाजा था। मैंने छोटा दरवाजा खोला और भीतर घुसा। सामने पाँच-छह कमरे दांर्इ तरफ एक पंकित में बने थे जिनमें ताले पड़े हुए थे। इतवार था इसलिए। बाँर्इ तरफ एक बड़ा-सा मकान था जिसमें चार कमरे थे। इस मकान के दरवाजे पर ही एक बड़ा-सा बोर्ड टंगा था जिस पर अंग्रेजी में लिखा था – लैम्प-लिबरल एसोसिएशन फ़ार दा मूवमेंट आफ पीपल। मुझे मन ही मन खुशी हुर्इ कि मैं सही जगह पर आ गया हूँ। दाँर्इ तरफ जो कमरे बने थे उन्हीं से एक दुबला-पतला आदमी मेरे जितना ही ऊँचा था और शायद आज ही गंजा हुआ था मुझे वहाँ खड़ा देखकर मेरे पास आया। मैंने उसको कहा- “मैं दिल्ली से आया हूँ । मुकेश चौधरी मेरा नाम है।“

उसने हाथ जोड़ दिये

“ओ आप दिल्ली की संस्था से आता-आइये।”

“अमारा नाम चित्तो-चित्तोरंजन है।” - उसने हिन्दी में कहा।

मुझे उसकी अजीब से ढंग में बोली गर्इ हिन्दी अच्छी लगी। मैं उसके पीछे-पीछे गया। बाँर्इ तरफ जो मकान बना था उसके दूसरे कमरे में वे मुझे ले गया। उस कमरे में दो बड़े-बड़े मेज लगे थे। एक आलमारी थी और फार्इलें इधर-उधर पड़ी थी। बाँर्इ ओर लगे मेज पर एक सज्जन बैठे थे जो सेहत में थोड़े ज्यादा ही अच्छे थे।

“दास बाबू ये दिल्ली से आता है।“

 वे सज्जन कुछ लिखने में व्यस्त थे। चित्तो के इस तरह बताने पर उन्होंने मेरी ओर देखा। मैंने दोनों हाथ जोड़ दिये। एकाएक उनके चेहरे पर असीम मुस्कुराहट आ गर्इ।

“बैठिये” - उन्होंने मुझे खाली पड़ी एक कुर्सी पर बैठने के लिए हाथ से र्इशारा किया

“क्या ट्रेन लेट था?”- वे फिर कुछ लिखने लगे

“हाँ”

“काल होम कोलकत्ता गिया था। तोब मोलाए दा, हमारी संस्था का महासचिव ने बताया कि आज सुबह आप दिल्ली से आनेवाला है और आज इतवार हुआ। छुट्टी का दिन। इसी कारण कोलकत्ता से रात्रि में वापस लौटना हुआ। नहीं तो आपको बहुत असुविधा होता क्योंकि इतवार को संस्था का आफिस बंद हुआ।”

            मैं उन सज्जन को बड़े गौर से सुन रहा था। कितना स्नेह कितना आदर था उनकी बातों में। मुझे लगा मैंने पूरी यात्रा ही बिना सोचे समझे की है ना तो टिकट खरीदते वक्त कुछ सोचा और ना ही ट्रेन में सोच समझकर यात्रा की जिसका परिणाम ना सिर्फ मेरे लिए बुरा हुआ बलिक मैंने दूसरो को भी परेशान किया। वे सज्जन हिन्दी बोलने का अच्छा प्रयास कर रहे थे।

“आप तो बड़ी अच्छी हिन्दी बोल रहे हैं।“

            मैंने उन सज्जन की तारीफ की तो वे हँसते हुए बोले - होम पहिले दिल्ली में रहा। कुछ-कुछ हिन्दी सीख गया। वे बीच में रुके और ‘चित्तो – चित्तो’ आवाज लगाने लगे। वही पहले वाला युवक आया। उन्होंने उसे बांग्ला में चाय एवं कुछ खाने के लिए लाने को कहा।

“माफ कीजिएगा, मुझको याद नहीं रहा कि आपको चाय नाश्ता भी तो चाहिए। होम लोग को चाय नाश्ता का इतना आदत नहीं है। दिल्ली में था तब बहुत था।”- और वे खिलखिला कर हँस पड़े। मैं भी थोड़ा सा हँस दिया।

“आपको बांग्ला आती है?”

“नहीं”

“तोब तो आपको लोगों से मिलना, बात करना कोठिन होगा आपको जिन लोगों के साथ काम करना है उनको हिन्दी बिल्कुल नहीं आता है।”

“मैं बांग्ला सीख लूंगा” - मैंने विश्वासपूर्वक कहा

“वह तो आपको सीखना होगा। अगर आप नहीं सीखेगा तो होम आपको सीखाऐगा।”

 तभी चित्तो चाय लेकर आया। चाय लेकर उन्होंने एक चिट्ठी लिखी और चित्तो को दी।

“देखो इन्हें छातना ब्लाक ले जा और रोसमोय को सब बता देना और फिर लौट आना।”

उन्होंने अपना बैग उठाया और जाने को उद्धत हुए तभी वह मेरी तरफ मुड़े – “एक बड़ा भूल हुआ होम से आपसे इतना देर बात हुआ और आपका नाम भी नहीं पूछा”- कहकर वे हँसने लगे।

“मुकेश चौधरी”

“और मेरा गुरुदास चक्रवर्ती। हाम पात्र सराय में लैम्प के एक प्रोजेक्ट का कार्यकर्ता है।” -  अबकी बार हम दोनों एक साथ हँसे। क्योंकि मुझे पता चल चुका था कि वे कार्यकर्त्ता नहीं लैंम्प के सीनीयर कोआर्डीनेटर थे। मैं, चित्तो और चक्रवर्ती साहब तीनों एक साथ बाहर निकले उन्होंने मुझसे विदा ली क्योंकि उन्हें हमसे विपरीत दिशा में जाना था।


5

मैं और चित्तो उसी दिशा में चल पड़े जिस दिशा से मैं आया था। चित्तो मुझे बाजार की दुकानों, (खासकर जो उसके लिए बहुत बड़ी थीं) से परिचित करवा रहा था। बाजार में उसको तीन-चार जानने पहचानने वाले लोग मिले। सबके साथ खुशी, खुशी मेरा परिचय करवाया। इस तरह लोगों से मिलते-मिलाते, बातें करते मैं और चित्तो मुख्य सड़क पर आ गए। सड़क के उस पर करके एक बड़ी-सी इमारत थी जो काफी पुरानी थी उसके आगे ही एक बहुत ही बड़ा खाली मैदान था हम सड़क पार करके उस खाली मैदान के बीच से लेकर गुजरे।

“यह बांकुरा खिष्टान कालेज है” - चित्तो ने बताया। आगे चित्तो ने बताया कि बांकुड़ा जिले में पाँच कालेज हैं। एक स्टेडियम, कर्इ अस्पताल और एक बड़ा डाकघर है और एक टेलीफोन एक्सचेंज भी है। हमने खेल का मैदान पार किया। दूसरी तरफ एक पक्की सड़क थी जिसके दोनों ओर चाय, सिगरेट पान एवं अन्य जरूरत के सामानों की दुकानें थीं। बस अड्डा होने के कारण उस स्थान पर लोगों की काफी भीड़ थी। अधिकतर लोग चाय की दुकानों पर बैठे थे। इस बस अड्डे से छातना, कमलपुर, पुरुलिया, दुर्गापुर, वर्धमान इत्यादि स्थानों के लिए बसें मिलती हैं। मैंने एक पत्र-पत्रिकाओं की दुकान से अखबार खरीदने की सोची। अखबार की दुकान पर पहुंचा और उससे उस दिन का अखबार मांगा तो पता लगा कि वहाँ अखबार हर रोज दोपहर के बाद ही पहुँचता है।

 
मैं और चित्तो पुरुलिया जाने वाली बस में चढ़ गऐ। मैं और चित्तो हिंदी में बातें कर रहे थे। बस में हमारे आस-पास खड़े अधिकतर लोग मुझे अजीब विसिमत सी निगाहें लिए ताक रहे थे। जिसका कारण मेरी हिंदी की बोलचाल एवं खादी का लम्बा कुत्र्ता था। कर्इ लोग तो अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाये। उन्होंने टूटी फूटी हिन्दी में पूछने का प्रयास भी किया कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? क्यों आया हूँ? मैंने उन सबको उनके ढंग में अपने बारे में बताया। तभी एक खिड़की वाली सीट खाली हुर्इ सबने मुझे बैठने के लिए आग्रह किया। मैंने अपने साथ चित्तो  को भी बिठा लिया। दूर-दूर तक खाली-खाली खेत लम्बे-लम्बे ताड़ एवं खजूर के पेड़ भागते हुए नजर आ रहे थे। रास्ते में ही एक बड़ी-सी नदी पड़ी जो बरसाती थी। अभी उसमें पानी बहुत कम था। पुल के आस-पास बहुत से लोग नहा रहे थे। मुझे मन ही मन लग रहा था कि हम जहाँ जा रहे हैं अवश्य ही वह इलाका घने जंगलों का होगा और वे आदिवासी लोग जिनके साथ रहना और काम करना है वे अवश्य ही पारंपरिक भेषभूषा में मुझे मिलेंगे। उनकी अपनी भी एक भाषा अवश्य ही होगी जो मुझे हर हाल में उनसे सीखनी होगी। पर मैं उनके बीच में उनके लिए कोर्इ आकर्षण की चीज नहीं बनूँगा। करीब आघे घंटे बाद एक जगह बस रुकी।

“चलिए आ गया दिल्ली” - चित्तो ने मज़ाक किया।

मैं झटपट बस से नीचे उतरा। जहाँ बस रुकी थी वह एक तिराहा था। बस सीधी चली गर्इ।

“इस जोगा का नाम कमलपुर है।”  

चित्तो ने बताया। मैंने तीनों रास्तों पर देखा एक बड़ी-सी ग्रामीण मार्किट थी। सड़क के दोनों किनारे असंख्य खोखे खड़े थे जिनमें किताबों, चाय पान इत्यादि की दुकाने थीं। एक ही लार्इन में तीन कैमिस्ट की दुकानें भी थी। अनेकों सब्जी फल बेचने वाले पटरी पर बैठे चिल्ला रहे थे। हर तरफ भीड़ ही भीड़ थी। आदमियों की संख्या से ज्यादा सार्इकिलें दुकानों के आस-पास खड़ी थीं। हम जिस ओर से बस में आये थे उसी ओर पैदल वापस जाने लगे। इस रास्ते पर एक बच्चों का होस्टल भी था। होस्टल की बिलिड़ग के साथ जो कुआँ था। छोटे-छोटे आठ-नौ लड़के चरखी पर लटकी रस्सी खींच रहे थे शायद उनकी बाल्टी या कोर्इ अन्य बरतन कुएं में था।

थोड़ी देर और चलने के बाद चित्तो ने बांर्इ तरफ एक लार्इन में खड़ी कर्इ झोपडि़यों की ओर इशारा करके कहा ''यह है जीयूएस यानि ग्रामीण उन्नयन संस्था जहाँ लैम्प के कर्इ प्रोजेक्ट पर काम होता है हम बांर्इ तरफ मुड़े। इनमें एक लाइब्रेरी है, एक मीटिंग रूम है। दो डाक्टर के लिए हैं। दो समवाए तन्तु शिल्पी समिति की दुकानें हैं तथा जीयूएस का आफिस है। चित्तो बताते-बताते सबसे अंतिम झोपड़ीनुमा कमरे में घुस गया। कमरा काफी बड़ा था। दार्इ तरफ दो मेज रखे हुए थे जिनके बीच में एक लकड़ी की आलमारी थी जिसमें फाइलें रखी हुर्इ थीं। दार्इ तरफ वाले मेज के साथ वाली दिवार के साथ एक बड़ी गोदरेज की आलमारी थी जिस पर किसी के हाथ की लिखावट में काले रंग में लिखा था जीयूएस्। बाद में पता लगा कि वो लिखावट रसमोय हँसदा की थी। सामाने की दीवार पर एक कलैंडर टंगा था जिस पर कुछ आदिवासियों के चित्र थ। चित्रों की भाषा से एक कहानी सी साफ झलक रही थी वो यही कि भोले-भाले आदिवासियों को कम पैसा देकर शहर के ठेकेदार उनसे उनके ही जंगल के पेड़ कमाकर खूब पैसा कमाते हैं। दांर्इ ओर नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय एवं बांग्ला कवि गुरुवर रविन्द्रर नाथ टैगोर का बड़ा सा फोटो टंगा था जो अच्छी तरह फ्रेम किया हुआ था। बांर्इ तरफ सांथाल विद्रोह के नायक छेदू-कानू की एक बड़ी सी तस्वीर लगी हुर्इ थी।

            मैं ये सब देखने में व्यस्त था। तभी बाहर एक मोटर सार्इकिल के आकर रुकने का अहसास हुआ। भीतर आए मोटे से व्यकित जिन्होंने एक सस्ती सी कमीज एवं पैंट पहन रखा था। कमीज के दो बटन टूटे हुऐ थे। उनके पैरों में रैक्सोना की चप्पल थी। वो भीतर आकर मेज के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गऐ। कुछ एक पल वे मुझे देखते रहे और मैं उनको। उनके भारी भरकम शरीर, घुंघराले छोटे बाल, चपटी नाक एवं भरा हुआ मुँह देखकर मैं समझ गया कि अवश्य ही वे किसी ना किसी आदिवासी जाति से संबंध रखते होंगे हालांकि उनके बाद मैं आदिवासी जाति से संबंध रखने वाले जितने भी लोगों से मिला उनके चेहरे अथवा शरीर में मुझे कोर्इ ऐसी खास बात नहीं मिली जिससे उनके आदिवासी होने का अहसास होता हो।

            चित्तो ने परिचय उनके साथ करवाया। उनका नाम रसमोए हाँसदा था। जीयूएस के जनरल सेक्रेटरी हैं और लैंप का एक प्रोजेक्ट यहाँ के क्षेत्र में चलाते हैं।

''क्या आप यहा काम करने सकेगा?” - रसमोयदा टूटी-फूटी हिन्दी में बोले। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ मन ही मन। मैंने तो सपने में भी यह नहीं सोचा था कि कोर्इ आदिवासी अच्छी हिन्दी भी बोलता होगा।

''काम तो करना ही चाहिए। मैं यहाँ कुछ सीखने आया हूँ। आप लोग मुझे सिखायेंगे और मैं सीखूँगा। कुछ मुझ पर भी निर्भर है कि मैं आपसे कितना सीख पाता हूँ। आपके बारे में कितना जान पाता हूँ।” फिर मैं शुरू हो गया। बीच-बीच में मैने कर्इ बार यह जानने का प्रयास अवश्य किया कि उनको मेरी बात समझ में आ रही है या नहीं।

''यहाँ तो चारों तरफ जंगल है। झाड़ झंकड़ है। गाँव भी बहुत दूर-दूर हैं। बसें भी बहुत कम चलती है। ये तो कोर्इ बहुत बड़ा समस्या नही हुआ। सबसे प्रथम समस्या है भाषा का।आप लोगों से कैसे बात करेगा जबतक आप उनका भाषा नही सीखेगा।” रसमोय दा सही कह रहे थे

''मैं आपकी भाषा सीखने का पूरा प्रयास करुंगा और आपको भी अपनी हिन्दी सिखाने का प्रयास करुंगा।” मैंने आशा जतार्इ थी। थोड़ी देर बाद एक और सज्जन आफिस में आऐ। उन्होंने आफिस में ही रखे स्टोव पर चाय बनार्इ। जब उन्होंने चाय मेरे सामने रखी तो में काली चाय देखकर हैरान था। मगर मैंने अपने भावों को दबा लिया। जिन्दगी में शायद पहली बार में बिना दूध की चाय पी रहा था।

''ये इधर का चार्इ है। इसको इधर का लोग लैमन टी बोलता है। आप इसको पीया तो दिल्ली की चार्इ भूल गया।” - एकाएक रसमोय दा खिलखिलाकर हंस पड़े। मैं और चित्तो भी उनके साथ हँसने लगे। कुछ देर और हमारे साथ बात करने के बाद चित्तो वापस चला गया।

            ''आप सफर से आया है। थाक गीया होगा। चलो स्नान कर लो। इधर साथ में ही कुआं है।” - रसमोय दा यह कहकर आफिस से बाहर चले गये। मैंने अपने दूसरे बैग में से एक साबुन निकाला और तौलिया शरीर पर लपेट कर आफिस के साथ ही कुँएं पर उधर आ गया। रसमोय दा वहाँ पहले ही पहुँच चुके थे और वे नहा भी चुके थे। उन्होंने एक बाल्टी में पानी खींचकर मेरे लिए भर दिया। मैं नहाया। पानी कुछ-कुछ ठंडा था। मगर मुझे अच्छा लगा।


            आफिस के पीछे ही रसमोय दा की बाड़ी(घर) थी। जब मैं मुख्य द्वार पर घुसा तो घर में सब लोग मुझे आश्चर्य से ताकने लगे। शायद उन्हें अतिथी के आने की खबर पहले ही दी जा चुकी था। रसमोय दा की पत्नी ने एक लोटे में पानी लाकर मेरे हाथ धुलाऐ और एक घर के ओसारे में, जहाँ उन्होंने जमीन पर पहले ही कुछ कपड़े बिछाये हुये थे, बैठ जाने को कहा। रसमोय दा ने तब घर के सभी सदस्यों से मेरा परिचय करिवाया। उनके माता-पिता दोनों बूढ़े हैं। वे पाँच भार्इ हैं। दो शादी शुदा हैं, तीन अविवाहित। रसमोय दा के अपने दो बच्चे हैं एवं उनसे छोटे वाले भार्इ का एक लड़का। एक बूढ़ा भी है जो उनके मवेशियों को चराने का काम करता हैं। इतना बड़ा परिवार कितने स्नेह से प्यार से रहता है मुझे उस दिन मालूम पड़ा। केवल औरतों को छोड़कर सबने एक साथ भोजन किया। उस क्षेत्र में एक बड़े पत्तों वाला पेड़ मिलता है जिसके पत्तों की ये लोग पत्तल बनाते हैं और उसी पर खाना परोस कर खाते हैं। इस पत्तल के दो फायदे हैं एक तो ये कि यह सस्ती है और दूसरा ये कि इनको धोना भी नहीं पड़़ता। इसके अतिरिक्त सूख जाने पर यह ईंधन का काम भी करती हैं। खाना एकदम सादा था, चावल, दाल और एक प्रकार की घास जो वहाँ बहुत मिलती है जिसको उबालकर मिर्च नमक मिलाकर खाया जाता है।

खाना खाकर हम वापिस आफिस आ गऐ। रसमोय दा ने बताया कि जीयूएस का डाक्टर अपने घर गया हुआ है। इसलिए कुछ दिन उसके कमरे में मैं रह सकता हूँ। उन्होंने वो कमरा खोल दिया। मैंने अपना सारा सामान उस कमरे में सजाया ''आज शाम  को जीयूएस के सभी मेम्बरों का मीटिंग होगा, आपका उपसिथति होगा?”- रसमोय दा ने पूछा मैंने हाँ कह दी।

''ठीक, अभी आप सो सकता। आराम करो। संध्या में होम आपको जगायेगा।” - ये कहकर रसमोय दा चले गऐ। मैं कुछ देर बैठा। पूरे दिन की घटनाओं को क्रमवार सोचने लगा और कुछ देर बाद में गहरी नींद सो गया।

            करीब पाँच-साढ़े पाँच बजे मैं नींद से जागा। सीधा कुएं पर गया। बाल्टी कुएं में डालकर पानी खींचा। मुँह धोया और वापिस अपने कमरे में गया और दूसरे कपड़े पहन कर आफिस में आया। आफिस में करीब बीस लोग बैठे थे, कुछ लोग बैंचों पर कुछ तख्त पर एवं कुछ कुर्सियों पर। जैसे ही मैं भीतर घुसा एक आदिवासी नौजवान ने मुझे अपनी कुर्सी दी। मैंने मना किया किन्तु सब लोगों की इच्छानुसार मुझे बैठना पड़ा। रसमोय दा अपनी मीटिंग शुरु कर चुके थे। उन्होंने अपना वक्तव्य बीच में ही अधूरा छोड़कर वहाँ उपसिथत सभी सज्जनों से मेरा परिचय करवाया। उन सब के नाम बिल्कुल हमारे नामों जैसे ही थे। जैसे कुछ नाम(सभी तो नहीं) मुझे याद रह गऐ है, बानेश्वर हँसदा, रोहन चंद्र मंडी, मदनमोहन मुरमु, नलिनी रंजन मुरमु  विधानचंद्र मुरमु शकितपदा टूडू, रामादन सौरेन इत्यादि। उस मीटिंग में कुछ बंगाली लोग भी बैठे थे जैसे मृत्युंजय देघुरिया, खगेन्द्रनाथ राय मंडल इत्यादि। परिचय होने के बाद वहाँ उपसिथत सभी सज्जनों ने मुझसे मेरे बारे में, आईजीएसएस के बारे में, दिल्ली की कुछ खास बातों के बारे में कुछ जानने की इच्छा जाहिर की। जितना मैं जानता था। उतना मैंने एकदम सरल भाषा में समझने का प्रयास किया। वहाँ उपस्थित सज्जनों ने कर्इ और भी सवाल किए जिनके उत्तर मैंने पूरे विश्वास के साथ एवं संयम से दिए और जिस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं था मैंने सीधे-सीधे उनसे बिना किसी हिचकिचाहट के कह दिया। उनके बाद रसमोय दा ने अपना वक्तव्य पूरा किया।

बाद में हम सब लोग मिलकर मोड़(बाजार) गए जहाँ हमने चाय पी। वहाँ भी कुछ दुकानदारों से रसमोय दा ने मेरा परिचय करवाया। फिर मैं और रसमोय दा वापिस दफ्तर लौटे। करीब बाठ बजे हमने रात्रि का भोजन किया उसके बाद रसमोय दा मुझे मेरे कमरे तक मुझे छोड़ गऐ। मेरा पहला दिन एक सुखद अनुभव के सुखद अहसास के साथ गुजरा। यूँ तो उस दिन मैंने अनेक व्यकितयों से बातचीत की, जान पहचान बढ़ार्इ मगर सब व्यकितयों में मुझे केवल दो व्यकितयों ने अत्यधिक प्रभावित किया जिनमें एक थे रसमोय दा एवं दूसरे थे नलिनी रंजन मुरमु। नलिनी रंजन मुरमु मीटिंग में जिस स्थान पर बैठे थे उसके पीछे की दिवार के ऊपर गुरुवर रविन्द्र नाथ टैगोर का एक चित्र टंगा था। मुझे उस चित्र वाले व्यकित में और नलिनी दा में कुछ ज्यादा प़+र्क नहीं दिखा।  नलिनी दा लम्बे काले और घुंघुराले वा बाल उनकी गरदन तक लटक रहे थे और उनकी दाड़ी गुरुवर टैगौर की दाड़ी से कम घनी न थी। उनसे बातचीत की तो वे एक समाजवादी विचारधारा के व्यकित लगे। मुझे एक खास बात जो बाद में मालूम पड़ी जो ये थी कि वे बिहार में पिछले कर्इ वर्षों से जोर पकड़ते झारखंड आंदोलन में भाग ले चुके थे।

            वानेश्वर ने इसी वर्ष बी. ए. किया है और आगे बी. एड करना चाहता है। रोहन ने अभी दसवीं पास किया है पर आगे पढ़ना नहीं चाहता है। मदन मोहन मुरमु किसी दूसरे जिले में सरकारी नौकरी करते हैं और संथाली भाषा के अच्छे कवि हैं।


6

दूसरा दिन सोमवार था। सुबह करीब सात बजे उठा। रसमोय दा का सबसे छोटा भार्इ नरेन्द्रनाथ मुझे तालाब पर ले गया। वहीं पर उसने मुझे खजूर के पेड़ की टहनी दांतून बनाकर दी। तालाब बहुत बड़ा था। हम जिस ओर बैठे थे उसके दूसरी ओर बहुत से आदिवासी बच्चे, औरतें एवं पुरुष नहा रहे थे, कपड़े धो रहे थे। मैं और नरेन्द्र काफी देर तक वहाँ हरी घास, पर बैठकर इधर-उधर की बातें करते थे। नरेन्द्र मेरी हर बात को समझ रहा था। किन्तु जब मैं उससे कभी कुछ पूछता तो पहले तो वो मेरा मुँह देखता फिर वह मुझे बांग्ला में समझाने लगता और जब वह मुझसे कुछ पूछता तो मैं उससे हिन्दी में। वह हिन्दी समझता था पर बोल नहीं सकता था और मैं थोड़ी बहुत बांग्ला समझ सकता था। पर उसमें अपने भाव व्यक्त कर पाना मेरे लिए भी कठिन था। हम वापिस आफिस लौटे। मैंने स्नान किया और आफिस में जा बैठा। थोड़ी देर में रसमोय दा भी कोर्इ सांथाली गीत गुनगुनाते हुए आफिस में आये।

''मुखेश चलिए आपको हमारा जीयूएस का काम दिखाते हैं।” - रसमोय दा ने मुझे मुकेश से मुखेश बना दिया (यही नाम बाद में वहाँ के सभी लोगों के बीच प्रचलित हुआ।) बड़े हाल में बानेश्वर एवं रोहन चंद्र मंडी दोनों बच्चों को पढ़ा रहे थे

''हैलो मुखेश चौधरी आप कैसा है?” - वानेश्चर ने मुस्कुराते पूछा

''अच्छा है।” – मैंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया

''आपको रात्रि में निद्रा हुआ?” - सोहन का सवाल था

''नहीं रात को अच्छी नींद नहीं आर्इ।” मैंने उदास होकर कहा

''क्यों?” सभी की आखों में प्रश्न था।

 ''क्योंकि मैं दिवस में सोया था।”

''ओSSS” -  सब लोग हँसने लगे। यहाँ रसमोय दा ने गरीब आदिवासी छात्रों के लिए टयूशन की व्यवस्था कर रखी थी। उनके अनुसार उनके क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ार्इ नहीं होती है। बच्चों को टयूशन लेनी पड़ती है।

            ''यहाँ के अध्यापक लोग टयूशन बहुत लेते हैं। इसीलिए हम यहाँ पर टयूशन सेंटर खोला और गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाता है।”

            रसमोय दा ने बताया। इसके बाद हमने हाल के साथ लगे कमरे में टाइपिंग ट्रेनिंग स्कूल देखा जिसमें एक पाली में कम से कम बीस लड़के टार्इपिंग सीखते हैं। यहाँ के प्रशिक्षक खगेन्द्रनाथ राय हैं। डाक्टर साहब का दवाखाना बंद पड़ा था क्योंकि डाक्टर साहब अपने गाँव गए हुए थे फिर हमने तंतु शिल्पी समवाय समिति की दुकान एवं भंडारगृह देखा। रसमोय दा ने बताया कि यह एक सहकारी समिति है जो बुनकरों को उचित दाम पर सूत बेचती है एवं उचित दाम पर ही उनके हाथों से बने कपड़े खरीदकर बाजार में बेचती भी है।

            इस देखा-देखी और मेल-मिलाप में काफी समय गुजर गया। फिर मैं और रसमोय दा बाजार में चाय पीने गए। वहाँ उन्होंने मेरी कुछ और लोगों से मुलाकात भी करवार्इ। वहाँ मैंने एक किताबों की दुकान से बांग्ला भाषा सीखने के लिए दो किताबें भी खरीदीं। संस्था में जिसने भी वह पुस्तकें देखीं सबने मेरी तारीफ की।

            संस्था में संथाली भाषा कें संवेदनशील एवं क्रांतिकारी भावनाओं वाले कवि मदन मोहन मुरमु  ने मुझे संथाली में छपने वाली आदिवासियों की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'सार सागुन की एक प्रति दी। यह पत्रिका बांगला लिपी में छपती है। यह अभी भी पूरे पशिचम बंगाल की एकमात्र ऐसी पत्रिका है जिसमें संथाली भाषा का साहित्य होता है। इस पत्रिका के संपादक स्वयं मदन मोहन मुरमु थे और यह पत्रिका ग्रामीण उन्नयन संस्था यानि जीयूएस की वित्तीय सहायता से कमलपुर में ही छपती थी किन्तु पिछले कुछ महिनों में पैसों की कभी के कारण यह पत्रिका अब बंद है हाँलाकि बाजारों में इसकी काफी माँग थी।


मेरे आग्रह करने पर उन्होंने अपनी एक कविता का अर्थ मुझे अंग्रेजी में समझाया। यह एक क्रांतिकारी कविता थी। कविता में जगलों के दावेदार एवं संथाल विद्रोह के सिरमौर बिरसा मुंडा की भावनाओं को उत्तेजक स्वरों के साथ जोशीले शब्दों में पिरोया गया था। इस कविता में बिरसा मुण्डा अपने साथियों को जमींदारों के आदिवासियों पर अत्याचार और शोषण के विरुद्ध प्रेरित करता है। इस कविता ने मुझे प्रभावित किया। पूरी कविता के सम्पूर्ण भाव तो मुझे समझ नहीं आए मगर जितने समझ आए अच्छे लगे।

           
रात को रसमोय दा ने मुझसे कहा कि मैं जितने दिन भी वहाँ रहूँ क्यों ना रोज रात को रंगामेटा एवं आसपास के लड़कों को हिन्दी सिखाऊँ। मुझे इससे अच्छा कार्य और क्या मिल सकता था। मैंने उसी रात से इस कार्य का शुभारंभ किया। पहली ही रात रसमोय दा के दो भार्इ एवं उनके मित्र बंधु सब मिला कर तेरह-चौदह जन एकत्रित हुए। मैंने उन्हें उत्साह से हिन्दी पढ़ाना शुरु किया। सभी लड़के अत्यंत ही उत्साहित एवं अध्ययन मनन करने वाले थे। अत: मेरा भी उन्हें पढ़ाने में मन रमा। मेरी पहली हिन्दी की कक्षा अत्यंत ही सफल रही। बाद में मैंने सभी सांथाली लड़कों को उनकी फरमार्इश पर कुछ हिन्दी के फिल्मी गीत सुनाऐ। कुछ हिन्दी में चुटकुले भी सुनाऐ। उस रात में काफी देर तक उनके साथ बातचीत करता रहा।

तीसरे दिन सुबह मुझे दाड़ी बाबू (नलिनी रंजन मुरमु उर्फ गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगौर के कलोन) के साथ गाँवों में संस्था इंदिरा गांधी आवास योजना एवं जवाहर रोजगार योजना के साथ जो काम कर रही है उसको देखने जाना था। दाड़ी बाबू सुबह ही आकर आफिस में बैठे थे। मैंने जल्दी-जल्दी स्नान किया, कपड़े पहने और उनके साथ चल दिया। हमें हूरा जाना था। यह एक छोटा सा ब्लाक और है जो पुरुलिया जिले में पड़ता है। हम बस द्वारा हूरा पहुँचे। यहाँ इतनी भीड़ भाड़ नहीं थी। इक्का दुक्का दुकानें थी हम बाजार से करीब तीन किलोमीटर पैदल चले। वहां मैंने आवास योजना का काम देखा। यह झोपड़ीनुमा घर थे जो केवल नीची जाति के लोगों के लिए उन्हीं को मजदूरी देकर बनवाये जा रहे थे। नलिनी दा के साथ मुझे (यानि एक खíर के लम्बे कुत्र्तें वाले को) सब गाँव वाले बड़े आश्चर्य से देख रहे थे। काफी देर तक गाँव के बच्चे, स्त्री-पुरुष मुझे घेर कर बैठ रहे मानों में कोर्इ देखने की वस्तु रहा हो। दोपहर तक हम वापस कमलपुर लौट आये। रसमोय दा आफिस में ही थे उनके पूछने पर मैंने उन दिन के अनुभव उन्हें सुनाये। वानेश्वर ने दफ्तर में ही काली चाय (बिना दूध वाली) बनाकर पिलार्इ। शाम को मैं नरेन्द्र और उसके साथियों के साथ रंगामेटा गाँव घूमने गया। वहीं मैंने उनसे उनके गाँव की बनावट, घरों की निर्माण संरचना इत्यादि पर जानकारी हासिल की।

7

 

            अब मैं बाजार अकेले जाने लगा था। मगर दुकान में बैठकर मनपंसद चीज़ खाने में बड़ी परेशानी होती थी। मैं केवल समोसा जिसको वहाँ सिंगाड़ा कहा जाता है, को छोड़कर अभी तक किसी और खाने वाली वस्तु का नाम नहीं जान पाया था। अत: मैं दुकान में जाकर सिर्फ चाय और समोसा खाकर ही लौट आता मगर अब मेरे साथ अक्सर कोर्इ ना कोर्इ बंगाली लड़का होता था। नरेन मेरे साथ ही रहता। उसे हरदम हिन्दी सीखने का भूत सवार हो गया था। मैं जो कुछ भी उसके साथ हिन्दी में बोलता वह उसका झट मतलब पूछ लेता। तीसरे दिन ही शाम को जब मैं अपने कमरे से कुर्सी निकालकर बाहर बैठा कुछ पढ़ रहा था कि एक बिल्कुल मेरे ही बराबर कद काठी रंग वाले लड़के ने मुझे आकर प्रणाम किया और मेरे पास ही खड़ा हो गया।

''दादा आप कोथाए थेके आश्चेन?”

''दिल्ली से”

''कोथाए बाड़ी?”

''दिल्ली”

उसने और भी कर्इ प्रश्न पूछे। मुझसे मिलकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और अगले दिन अपने गाँव चलने का न्यौता दिया। बातचीत करने पर पता लगा कि उसने अभी इसी वर्ष बांकुडा किष्टान कालेज से बी. ए. की है और ळन्ै में टार्इप एवं शार्टहैंड सीखने आता है। उसका नाम अरिजीत भंडारी था और वह मंतोरा गाँव का निवासी था। लगभग आधा घंटा बातचीत करने के बाद वह चला गया।

            उस दिन एक और बड़ी मजेदार घटना घटी। रात को संस्था में मीटिंग हुर्इ और उसमें ये निर्णय लिया गया कि संस्था के साभी कार्यकर्त्ता आपस में सकल (सुबह) से 10 बजे तक अंग्रेजी बोलेंगे और उसके बाद से शाम चार बजे तक बंगला अथवा संथाली और चार बजे से रात तक हिन्दी। शुरु शुरु में इस नियम को निबाहना बड़ा दुष्कर था। दो चार लोगों के लिए इतना कठिन नहीं था। खैर जो भी हो निर्णय सबने माना और मैं जितने दिन भी वहां रहा, मेरे सामने संस्था के किसी भी सदस्य ने इस नियम का उल्लंघन नहीं किया। शुरु शुरु में वानेश्वर, रोहन, शक्तिपदा इत्यादि सुबह बोलते ही नहीं थे क्योंकि अंग्रेजी का वक्त होता था किन्तु दो-चार दिन के बाद अपनी बात कहने का प्रयास करते। बंगला एवं संथाली के लिए समय निश्चित होने से मुझे अधिक फायदा हुआ। मेरी अच्छी प्रैकिटस हो जाया करती थी। शाम को जब हिन्दी में बातें करते हुए हम सब मोड़ पर चाय पीने जाते तो सबको हिन्दी बोलते देख जानने  वाले लोग हमारे पास इकट्टा हो जाते और बड़े गौर से सुनते। करीब दस या पन्द्रह दिन बाद सभी अच्छी हिन्दी बोलने लगे थे मगर शुरु शुरु में जब, दूसरे लोग हिन्दी बोलते तो हँसते-हँसते मेरे पेट में बल पड़ जाते। बात ये थी कि उनकी टूटी-फूटी हिन्दी में सब पुलिलंग था। स्त्रीलिंग कुछ भी नहीं था।

 

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अगले दिन मैं अरिजीत के साथ उसके गाँव गया। उसका गाँव कमलपुर से लगभग सात-आठ किलोमीटर दूर था। पहले सुबह-सुबह संस्था से आकर उसने टार्इप की, शार्टहैंड की क्लास की। उसके बाद हम बाजार गए। चाय पी। फिर उसके गाँव की ओर जाने वाली बस में चढ़े। उसके गाँव की ओर केवल एक ही बस जाती थी। वही दिन में बांकुड़ा से चक्कर लगाती रहती थी। इस बस की हालत बड़ी खराब थी शायद बहुत पुरानी बस थी। उसके गाँव तक जाने वाला रास्ता अभी कच्चा ही था, वो भी समतल नहीं था। खूब गहरे-गहरे गड्ढ़े थे। बस खूब भीड़ भरकर उस उबड़-खाबड़ रास्तों पर हौरन बजाती हुर्इ चलती और उसका एक-एक पुर्जा हिलने लगता था। बस जब सड़क से उतर कर सड़क के किनारे पर चलती तो एक तरफ झुक जाती और मेरी सांस मेरे गले में अटक जाती। आखिकार हम उस बस से उतरे। जब मैंने अरिजीत को कहा कि बड़ी पुरानी बस है तो अरिजीत ने हँसकर कहा कि पशिचम बंगाल सरकार की गाड़ी यानि जोती बाबू की गाड़ी है। हम इसे प्यार से जोति बाबू गाड़ी कहते है। उसकी इस बात से मैं काफी देर तक हँसता रहा। मुझे लगा जैसे यह ज्योति बसु के समस्त कामकाज और पश्चिम बंगाल पर सबसे गहरा व्यंग्य था।

अरिजीत का घर छोटा सा था। दो कमरे थे और बाहर ओसारा। एक कमरे के ऊपर जो परछत्ती थी उस पर अरिजीत के सोने की जगह थी। मैं और अरिजीत काफी देर वहाँ बैठे। उसके बाद खाना खाने जब दूसरे कमरे में गए तो अरिजीत ने अपनी माँ, बहन, भाभी, और एक भार्इ से परिचय करवाया। अरिजीत के तीन भार्इ थे, विश्वजीत, अभिजीत और सुजीत। दो भार्इ पुलिस में थे और सुजीत एवं उसकी छोटी बहन अभी पढ़ रहे हैं।  अरिजीत की माँ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनसे मैं ज्यादा बातें नहीं कर पाया क्योंकि हिन्दी बिल्कुल उनकी समझ से बाहर थी। इससे पहले मैं अरिजीत के साथ नदी पर गया। वहाँ स्नान किया। वहीं उसने मेरी मुलाकात अपने दोस्तों से करवायी। उनमें से दो दिल्ली में रह चुके थे सो हिन्दी बोल सकते थे। बाद में हम कैरम खेले। दोपहर को अरिजीत मुझे वापस कमलपुर अपनी सार्इकिल पर छोड़ गया। मैं कमलपुर से पैदल संस्था पहुँचा। पता चला मृत्युजंय देघुरिया जो संस्था के लेखापाल है संस्था के काम से बांकुड़ा जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे लैम्प आफिस भी जायेंगे तो मैंने भी उनके साथ चलने की सोची दो या ढार्इ बजे हम दोनों जन बांकुड़ा चल पड़े।

            बाँकुड़ा लैम्प आफिस में पहुँचकर मैंने सबसे मुलाकात की। चित्तो, (यदि उसे लैम्प बंधु कहें तो अच्छा होगा)  ने मेरा परिचय संस्था के सभी लोगों से करवाया। उन दिनों लैम्प के प्रोग्राम सचिव श्री सत्मय भौमिक थे। अच्छे लम्बे तगड़े थे। उनके चेहरे पर सदा प्रसन्नता के भाव रहते। पहली ही मुलाकात में उन्होंने मेरा दिल जीत लिया। संस्था में ही एक डाक्टर थे जिनका नाम था डा. दिलीप शिट। वे हिन्दी भी नही जानते थे और न उन्हें अंग्रेजी आती थी। जो कुछ भी कहते केवल बंगला में ही कहते। उनकी मेरी अच्छी पटने लगी। वे अक्सर मुझे अपने पास बिठा लेते और ग्रामीण स्वास्थ्य एवं वातावरण पर मुझे कुछ ना कुछ दिखाते अथवा बनाते रहते। जब हम दोनों बात कर रहे होते तो कोर्इ और हमारे पचड़े में फँसने का प्रयास नहीं करता। दिलीप दा आयुर्वेद की जानकारी रखते हैं। वे बांकुड़ा मेडिकल कालेज में  पढ़ाते थे। वे मुझे आयुर्वेद पर किताबें पढ़ने के लिए देते। जो किताब हिन्दी या अंग्रेजी में होती उसे तो मैं स्वयं पढ़ लेता। बंगला भाषा में लिखी पुस्तकें वे स्वयं पढ़कर सुनाते। मैंने उनसे स्वास्थ्य पर काफी जानकारी हासिल की। दिलीप दा मेरा मुस्कुराते हुए स्वागत करते और संस्था के रसोइघर में रोज ही मुझे कोर्इ ना कोर्इ खाने वाली चीज बनाकर खिलाते। सूजी का हलवा, बेसन के लìू इत्यादि उन्होंने मुझे बड़े प्यार से बनाना सिखाया। दो तीन बार कच्चा-पक्का बनाकर प्रयोग किऐ और कुछ ही दिनों में  उनकी सिखार्इ हुर्इ चीजें मैं खुद बनाने लगा था।

            दिलीप दा ने एक दिन एक कमरे में रखे लकड़ी के छोटे-बड़े खिलौने दिखाये बड़े ही सुंदर खिलौने थे। बाद में उन्होंने बताया कि वे सभी खिलाने आस-पास के गाँवों में रहने वाले गरीब बच्चों ने बनाये थे। दिलीप दा इन ग्रामीण बच्चों से ये खिलौने इकट्टे कर उन्हें संस्था के नाम से उचित दाम देकर खरीद लेते है फिर कलकत्ता, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बेचने के लिए ले जाते हैं।

            एक बार मैं दिलीप दा से मिलने उनके घर भी गया। बांकुड़ा और कमलपुर के रास्ते पर रेलवे लार्इन के पास मेन रोड पर दिलीप दा का घर है। उस जगह का नाम काठजुरी डांगा हैं। घर में उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों से मिलवाया। उनकी तीन लड़कियां हैं सबसे बड़ी लड़की के जो कि लगभग 15-16 साल की है, मस्तिष्क में विकार है किन्तु दिलीप दा उस पर आयुवैदिक प्रयोग करने में रत हैं। उन्हें विश्वास है कि एक ना एक दिन वे अपनी लड़की के दिमाग का ये विकार दूर कर देंगे।

9

रंगामेटा गाँव जिसमें जीयूएस का मुख्यालय था ज्यादा बड़ा नहीं था। गाँव में केवल 50-60 कच्चे घर थे। यहाँ के सभी गांवों में केवल एक ही चौड़ी गली थी जिसके दोनों ओर आदिवासी लोग अपने-अपने घर बनाकर रहते हैं। दूसरी चीज जिसने मुझे प्रभावित किया वो थे दूर-दूर तक चारों तरफ फैले खजूर, एवं ताड़ के वृक्ष एवं अन्य वृक्षों जंगली झाडि़यों के झुरमुट। तीसरी चीज, यहाँ एक पौèाा होता है जिसकी लम्बार्इ पांच-छह फुट से ज्यादा नही होती है। उसे हम बंगाल का नीम कह सकते हैं इस पेड़ पर एक बड़ा सा पत्ता लगता है जिसको यहां के लोग 'दोने’ (कटोरी) की शक्ल देकर काम में लाते हैं। यहां के लोग केवल मेहमान के आने पर स्टील अथवा पीतल के बरतनों का उपयोग करते हैं अन्यथा वे रोज इसी पेड़ से पतों तोड़ दोने एवं पत्तलें बनाकर उन्हें बरतनों की तरह प्रयोग करते हैं। स्त्री एवं पुरुषों का पहनावा भी एक दम सस्ता एवं सादा है।

            अक्सर शाम को जब मुझे संस्था का कोर्इ काम नहीं होता तब मैं अपने आदिवासी मित्रों के साथ दूरवर्ती गांवों में जाता। अक्सर लोग मेरी वेशभूषा से मुझे पहचान जाते और समझ जाते कि कोर्इ शहरी है। इस कारण वे मुझे घेरकर खड़े हो जाते और मेरे विषय में सवालात करते और इस प्रकार अनायास ही उनसे मेरी दोस्ती हो जाती। फिर जब कभी मैं उन्हें मोड़ पर घूमता मिलता तो वे मुझे पहचान लेते  और बातें करते इसीलिए मैं मोड़ पर कभी भी अकेला नहीं होता था। अक्सर दो चार लोग मेरे साथ होते। महिलाओं से मैं कम ही मिल पाया। अधिकतर आदिवासी महिलायें अनपढ़ थीं और बहुत सारी तो बांगला तक नहीं जानती थी। इसलिए उनसे बात करने में असुविधा होती।

            मैं अक्सर रसमोय दा के साथ गाँवों में जाता। रसमोय दा के साथ जाने में मुझे बहुत फायदे थे। रसमोय दा मुझे जिस किसी भी गाँव में ले जाते उसका पूरा इतिहास मुझे बताते। बहुत से गांव जमींदारों द्वारा जला दिए जाने पर दूसरी जगह विस्थापित किए गये थे। अनेकों गांवों में प्राचीन एवं प्रसिद्ध देवी-देवताओं के मंदिर थे। मैंने देखा लगभग सभी गाँवों में एक या दो पूकूर (तालाब) अवश्य थे जो पूरी तरह से बरसाती थे। इनमें अगली बरसात तक खूब पानी रहता है। लोग इसे नहाने, कपड़े धोने इत्यादि के काम में लाते हैं। गाँव के लोग चाहे वह संथाली यानि आदिवासी होते अथवा बंगाली सभी बड़े प्यार से मिलते। अपनी हैसियत के अनुसार खातिरदारी करते। हम गांवों में ग्रामीण उन्नयन संस्था की शाखाओं की मीटिगों में जाते थे। अत: मिटिंग में मुझे भी बोलने के लिए कहा जाता। अब मैं बेझिझक एवं बिना रुके हिंदी में बोलता। अब लोग मेरी बातें समझने लगे थे जो नहीं समझ पाते उन्हें रसमोय दा संथाली में बता देते। रात को हम किसी ना किसी ग्रामीण के घर पर भोजन करते और देर रात को संस्था वापिस लौटते।

            एक बार शक्तिपदा टूड़ू के गांव में मीटिंग थी। हमलोग यादि रसमोय दा, रोहन, वानेश्वर और मैं उनके गांव गये। मीटिंग की और रात को वीडियो देखा। अक्सर गांव के समस्त जन कुछ रुपये, इक्कट्ठे कर मनोरंजन के लिए वीडियो मंगवाते और पूरी रात दो या तीन फिल्में देखते। मगर गाँव में जब भी विडियो लगता सबसे पहले उन्हें लैम्प की फिल्म दिखार्इ जाती जो उन्हें सामाजिक जागरूकता लाने एवं नवचेतना भरने का कार्य करती। इस फिल्म में समस्त गांव वालों को लैम्प की जानकारी दी जाती।

            मेरी और रसमोय दा की अब लगभग रोज देर से संस्था लौटने की एक आदत सी बन गर्इ थी। एक बार की बात है मैं और रसमोय दा मोटर सार्इकिल पर संस्था लौट रहे थे। संस्था अभी लगभग 15 किमी. दूर थी। हम गाने-गुनगुनाते चले आ रहे थे। रसमोय दा ने 'रोड ब्रेकर्स’ को ज्योति बाबू का नाम दिया हुआ था। सड़क पर जब भी कभी ब्रेकर आता रसमोय दा हँसते हुए कहते ''मुखेश संभलो ज्योति बाबू आता है” और मैं खिलखिला कर उनके साथ हंस पड़ता। एक दिन रसमोय दा ने गंभीर स्वर से कहा - 'मुखेश सावधान आगे शायद चोर हैं।“ मैंने देखा कुछ दूरी पर कुछ लोग खड़े थे और रसमोय दा को रुकने का र्इशारा कर रहे थे। रात के लगभग दो या तीन बजे थे। उनकी बात सुनकर मेरा पूरा शरीर झनझना उठा। मगर मैं सावधान था। रसमोय दा ने गाड़ी रोक दी।

“माल निकालो”

उन लोगों ने ठेठ बंगला में कहा। वे सचमुच में चोर थे। संख्या में चार थे। चारों के हाथ में छुरे एवं गंडासे थे। रसमोय दा शांत रहे। उन्होंने रसमोय दा के मुँह पर टार्च की रोशनी फैंकी। उन्होंने रसमोय दा का चेहरा देखा तो टार्च वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए। वे आदिवासी नवयुवक थे और रसमोय दा को अच्छी तरह से जानते थे बेरोजगारी एवं गरीबी में ऐसा काम करने लगे थे।

            ऐसी ही छोटी सी एक घटना और है। एक रात जब हम वापिस संख्या जा रहे थे तो मोटर सार्इकिल बीच रास्ते में खराब हो गर्इ रसमोय दा ने लाख कोशिश की मगर ठीक ही नहीं हुर्इ। हम वही सड़क के किनारे लेट गए। नींद आ गर्इ। सुबह मोटर सार्इकिल गायब थी। मगर दूसरी रात को संस्था के दरवाजे पर खड़ी मिलीं।

            रसमोय दा अपने क्षेत्र में निहायत ही इज्जतदार एवं शरीफ और सबसे बड़ी बात एक समाज सेवक के रूप में जाने जाते हैं। आदिवासी लोग अपने लोगों से कभी दगा नहीं करते हैं।

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भाषा कुछ समय के लिए एक समस्या बनकर अवश्य सामने आती है मगर जब एक मनुष्य का हृदय दूसरे व्यक्ति के सामने एकदम स्पष्ट हो अथवा दोनों व्यक्ति एकदम निर्दोष विचारों और भावनाओं वाले हों तो भाषा की ना समझी कोर्इ समस्या नहीं रह जाती है। रसमोय दा के दो छोटे-छोटे लड़के थे। उनमें से बड़ा जो करीब साढ़े चार साल का था, उसका नाम मैंने झंझोल रख दिया था। 'झंझोल शब्द उसकी अलग सी दिखती तोंद के लिये था। भोला-भाला चेहरा मासूम सी आखें। झंझोल मुझे बड़ा प्यारा लगा। कुछ दिन तो वह मुझसे शरमाया। मगर बाद में उसकी और मेरी खूब पटी। सुबह दस बजे तक वह मेरा साथी रहता। सुबह सुबह आकर मुझे उठाता। मेरी उगुली पकड़कर पूकूर ले जाता। र्इशारे से मुझे खजूर की टहनी तोड़कर देने को कहता। शुरुआत के हमारे ये र्इशारे बाद में âदय मिल जाने पर मेरी और उसकी मूक भाषा बन गए। सबको बड़ा ताज्जुब होता था कि झंझोल को मुझे जो कुछ भी कहना होता वह संथाली में कहता और मुझे जो भी कहना होता मैं हिन्दी में उसे समझाता और सबसे मजे़ की बात तब होती जब हम दोनों एक दूसरे की बात को समझ जाते। मैंने डेढ़-दो महिने में जितनी भी संथाली भाषा सीख पाया। उसका तीन चौथाई हिस्सा मैंने झंझोल से सीखा। खाने पर बुलाने के लिए जब वह दफ्तर में आता। बड़े चाव से मुझे कहता 'ढाका जाम 'बाड़ी चलो अर्थात भूख लगी है घर चलो या फिर शाम को सौभाग्य से हम दोनों अगर टहलने जाते और सड़क पर उसे कोर्इ ट्रक आता दिखार्इ पड़ता तो झंझोल मुझे मेरा हाथ खींचकर कहता 'हान्ते चलो मतलब इधर चलो। सही मायने में अगर देखा जाये तो संथाली मुझे झंझोल ने ही सिखार्इ।

            मैं और झंझोल अक्सर अवसर मिलते ही पुकूर(तालाब) पर जाते। वहां एक पत्थर पर बैठकर कुछ गीत गुनगुनाते। वहीं उसी पत्थर पर बैठकर मैंने झंझोल को हिन्दी में कितनी ही बच्चों वाली छोटी-छोटी कविताऐं सिखार्इ और झंझोल ने मुझे। वह अक्सर एक कविता गुनगगुनाता रहता। इस कविता का मतलब था कि अब उसे घर में कोर्इ प्यार नहीं करता है। इसलिए वह बड़वान चला जायेगा और फिर कभी वापस नहीं आयेगा (पहले बडवान पशिचम बंगाल का एक विकसित जिला था अक्सर लोग वहां नौकरी तलाशने जाते थे और कुछ तो वापस अपने गांव नहीं आते थे)

            भाषा की समस्या अब लगभग समाप्त हो चुकी थी मुझे संस्थाली और बंगाली दोनों समझ आने लगीं थीं। मैं रोज जिन लड़कों को हिन्दी सिखा रहा था वह भी अब हिन्दी समझने बोलने लगे थे। उनमें से कर्इ हिन्दी लिखना तो जानते थे पर बोल नहीं सकते थे। यहां मेरी यह कक्षा अच्छी चली लड़कों ने बड़ी मन से हिन्दी सीखी।

11

एक दिन सुबह जब मोड़ का चक्कर लगाकर मैं वापस संस्था में आया तो देखा वानेश्वर और रोहन दोनों संस्था के दफ्तर में बैठे मेरा इंतजार कर रहे हैं। बातचीत करने पर पता चला कि दोनों झांटी पहाड़ी पर लगने वाले मेले को देखने जा रहे हैं और मुझे भी अपने साथ ले जाने के इच्छुक हैं। मैंने रसमोय दा से पूछा उन्होंने कहा कि वह शाम को आयेंगे और हमसे मिलेंगे।

            मैं वानेश्वर और रोहन के साथ चल पड़ा। झाँटी पहाड़ी एक छोटा-सा कस्बा है जो कमलपुर और छातना के बीच में पड़ता है। मुख्य सड़क पर आने पर मैंने एक विशाल जनसमूह को जाते देखा। अधिकतर लोग साइकिलों पर  कुछ पैदल और कुछ र्इट रोड़ी ढोने वाले ट्रकों पर जा रहे थे। मैं भी वानेश्वर की सार्इकिल पर पीछे कैरियर पर बैठा था। लगभग आधा घंटा मुख्य सड़क पर चलने के बाद हमने एक कच्ची सड़क पकड़ी। कच्ची सड़क बहुत उबड़ खाबड़ थी। अत: कभी कभार सार्इकिल सवारों को उतर पैदल भी चलना पड़ता था। सड़क पर बच्चों, औरतों पुरुषों की भीड़ इतनी थी कि लगता था मानो कोर्इ मेला चल रहा हो।

            अब मेले के दृश्य दिखने शुरू हो गए थे। भीड़-भाड़ चिल्ल-पौ सबकुछ सामने था। सर्कस का ऊँचा तंम्बू लगा था। कहीं बासुरीवालों की बासुरियों से निकलता स्वर तो कहीं  कैसेट की दुकान पर बंगला में गीत गाता लाऊड स्पीकर। एक कतार में दूर तक तंबू लगे थे। दुकानें ही दुकानें थीं। कहीं औरतों का क्रीम, पाउडर कहीं पैंट कमीज कहीं पर टोपियों की तो कहीं रूमालों की सेल। हमने सार्इकिल खाने में सार्इकिल खड़ी की और बाजार की भीड़ में घुस गए। भीड़ की अपनी कोर्इ आवाज नहीं होती और ना ही भीड़ का कोर्इ अपना चेहरा होता है। मेले में ना जाने कितने ही चेहरे मेरे जाने पहचाने थे। पूरे बाजार में मैंने सुकांत भट्टाचार्य की एक बड़ी तस्वीर खरीदी। लगभग दो घंटे बाजार में घूमने के बाद हम बाजार से बाहर आ गए। वहां पर आदिवासी नृत्य 'बहार’ और ‘छोऊ’ देखा। एक ताल पर उठते पाँव, एक साथ एक दिशा में घूमते हाथ, कमरों पर बंघे घुंघुरूओं की एक स्वर में निकलती आवाज़। मन पूरी तरह से रम गया था। वहाँ से उठकर कहीं और जाने की इच्छा नहीं हुर्इ। बाद में हम सब एक गाँव की ओर चले। गांव का नाम तो मैं अब भूल चुका हूँ। उस गांव में जातरा कम्पीटशन था। 'जातरा खुले नाटक मंच को कहते है। अनेकों गांवों की नाटक मंडलियां इस प्रकार के मंच पर अपने-अपने नाटक मंचित करती है। अच्छी नाटक मंडली को उस गांव की तरह से इनाम दिए जाते है।

            जिस गांव में ये कार्यक्रम होने वाला था उसी गांव में रोहन के मामा भी रहते थी। अत: रात को हम उन्हीं के घर पर ठहरे। रात का भोजन भी उन्हीं के घर पर किया। करीब नौ साढ़े नौ बजे रसमोय दा भी अपनी राजदूत पर फट-फट करते आये। 'जातर’ के लिए मंच गांव से बाहर एक विशाल मैदान में लगाया गया था। मंच चारों तरफ से खुला था। अत: लोग चारों तरफ बैठे थे। मुझे मंच पर एक तरफ बैठने की जगह दी गर्इ। पूरी रात नाटकों का दौर चला। लगभग छह या सात मंडलियों ने नाटक किए। सभी नाटक संथाली में थे। अत: मुझे डायलाग अधिकांशत: नहीं समझ में आये मगर कलाकारों की कलाकारी और उनके हाव भावों से मैं लगभग नाटकों की कहानी समझ गया था। ‘तांतांग’, 'छोटी बहू’, 'प्यासी धरती’, ‘शराब जहर है’। अधिकतर नाटक किसी ना किसी सामाजिक बुरार्इ को लेकर थे।


          
  'जातरा’ बिना किसी रुकावट के संपन्न हो गर्इ। जेनरेटर खराब नहीं हुआ, ना ही बीच में बारिस आर्इ। मैं पूरी रात बिना आंखें झपकाये सभी नाटक बड़े गौर से देखता रहा। रघुनाथ पुर की नाटक मंडली को प्रथम पुरस्कार मिला। निर्णायक मंडली के अध्यक्ष रसमोय दा थे। बाद में बातों-बातों में पता चला कि संथालों में और वो भी बंगाल के संथालों में सबसे पहली नाटक मंडली रसमोय दा ने बनार्इ थी। कुछ बरसों तक इस मंडली ने खूब नाटक किये। बाद में यह मंडली बिखर गर्इ जिसके कारण अनेकों नाटक मंडलियाँ बन गर्इ। इस प्रकार यदि देखा जाये तो रसमोय दा को संथाली जातरा का जन्मदाता कहा जा सकता है।  सुबह वही पास के ही गांव में हम रसमोय दा के साथ उनके एक संबंधी के घर गए। वही नाश्ता किया और दोपहर तक सोये। दोपहर का खाना भी वहीं किया शाम को देर से संस्था में पहुँचे। उस दिन मुझे बड़ी गहरी नींद आर्इ थी।

            जातरा देखने का शौक मुझे वहां जो लगा फिर छूटा नहीं। मैंने एक-डेढ़ महिने में ना जाने कितने जातरा देखे। नाटकों के प्रति रुझान मेरे भीतर जातरा से ही पैदा हुआ।

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जिन दिनों मैं संस्था में रहा उन दिनों वहाँ खूब पानी बरसा जिसके कारण आस-पास के सभी तालाब खूब भरे हुऐ थे। इसी बारिश और तालाबों में भरे पानी से जुड़ी हैं मेरी जिन्दगी की ऐसी घटनाऐं जो मेरे साथ वहां जिनको मैं भूल नहीं सकता।

            मैं अक्सर संस्था में अकेला सोता था। बाद में संस्था के डाक्टर और उनकी पत्नी भी आ गए थे। परन्तु यह घटना उन दिनों की है जब मैं संस्था में अकेला सोता था। उस दिन खूब बारिश पड़ी थी। अत: जगह-जगह पानी था। पेट खराब होने की वजह से में दो बार पूकूर हो आया था। जब तीसरी बार पूकूर की तरफ चला तब काफी रात हो चुकी थी। मेरे पास एक छोटी सी टार्च थी जो एक छोटे से जमीनी दायरे को प्रकाश देती थी जिसके कारण मैं अक्सर रास्ते पर बने खड्डों में अपना पांव रख देता। दो बार तो मुझे डर-वर नहीं लगा मगर तीसरी बार जब मैं घने पेड़ों के जंगल के बीच में से निकला तो शरीर में भय की एक फुरफुरी सी दौड़ रही थी। ये भय शायद ज्यादा रात और सूनसान जंगल होने की वजह से था। जैसे-तैसे मैं पूकूर पहुँचा। वापिस लौटते वक्त एक काला सांप एक पैर के नीचे आ गया। सांप ने पलटकर दाये पैर के अंगूठे पर अपना फन मारा। उसके दांत जैसे ही मेरे अंगूठे में घुसे। मैं बिना किसी आवाज के भय से कांप उठा। तीर की तरह वहां से भागकर संस्था पहुंचा। मैं इतनी तेजी से भागकर आया था कि संस्था में किसी को आवाज़ देकर बुलाने के काबिल नहीं रहा। मैं चुपचाप चारपार्इ पर लेट गया लगा। मानो अंत समय निकट है। जल्दी ही जहर मेरे पूरे शरीर में फैल जायेगा। मैंने अपने माता-पिता बहन-भार्इ मित्र बंधुओ और भगवान सभी को मन में याद किया। सुबह जब होश आया तो मुझे अपने जिंदा होने पे बड़ा ताज्जुब हुआ। पता चला वो सांप जहरीला नहीं था। मैं खुश हुआ और अपने सभी संस्था के मित्रों को सूजी का हलवा बनाकर खिलाया।

            अक्सर शनिवार की रात मेरे ग्रामीण मित्र मेरे साथ संस्था मैं सोते थे। एक बार मैं अपनी चारपार्इ के पास अजीब-अजीब सी आवाजें सुनकर जाग गया। जागते ही पता चल गया कि आवाजें मेढ़कों की थी। मैंने इधर-उधर नजरें फेरी। एकतरफ नरेन्द्र, सौरेन और न जाने कौन कौन आग जलाकर बैठे थे। आग के बीचों बीच उन्होंने एक तार से करीब दस ग्यारह बड़े-बड़े मेढ़क बांध रखे थे जो आग की लपटों में झुलसते जा रहे थे। मुझे अचानक जगा देखकर सब घबरा से गए। वे मेढ़कों को  उन्हें घबराया देखकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ।

 मैंने कहा - ''यारो भूख तो मुझे भी लगी है।”

नरेन्द्र बोला - ''आप खायेगा?”

“हां” - मैंने विश्वास के साथ कहा

और इसके साथ ही सब फिर अपने-अपने कामों में जुट गये। कोर्इ मसाला पीस रहा था कोर्इ आग जला रहा था। मैं चारपार्इ पर बैठा उन्हें देखता रहा। बाद में जब उन्होंने मुझ मेढ़कों को परोसा। तब मैंने उन्हें हंसकर मना कर दिया। कारण भी बताया कि मेरा पेट खराब है उन्होंने बुरा नहीं माना।

 

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जिन दिनों में रंगामेटा में था उन दिनों वहां शादी-विवाहों का बड़ा जोर था। मुझे अक्सर गावों में निमंत्रण आते मुझसे यहां तक संभव होता मैं पास पड़ोस के गांवों में जाता और शादी विवाहों में समिमलित हेाता।

            एक दिन मुझे दो निमंत्रण एक साथ मिले। एक मेरे बंगाली मित्र के यहाँ से था था दूसरा संथाली के यहाँ से। दोनों के यहाँ बहनों की शादी थी। ये दोनों मित्र मुझे विशेष प्रिय थे। दोनों के गांवों में बीस कि.मी. का फासला होने के कारण दोनों विवाहों में जाना संभव नहीं था। खैर में तैयार हुआ पहले बंगाली मित्र के यहाँ जाना था संस्था से बाहर निकला ही था कि रसमोय ने मेरे आगे अपनी फटफटी रोक दी। रसमोय दा बांकुडा गये थे और कहकर गये थे कि दो दिन बाद लौटेंगे ''क्या हुआ आप इतनी जल्दी?”

''हां काम समाप्त जल्दी हो गया तो हम लौट आया।”

            मैं खुश हुआ। मैंने रसमोय दा को अपनी समस्या बतार्इ। सुनकर रसमोय दा बोले – “तुम जाकर पैला शादी अटैंड करो तब तक हम स्नान-टान करके आता है। फिर तुमको फटफटी पर तुम्हारे दूसरे बंधू के यहाँ छोड़ देगा।”

            इस प्रकार मैंने दोनों शादियां अटैंड कीं। इन शादियों में मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा। पहली बात तो ये कि दोनो शादियों में मैं एक विशेष अतिथी बनकर गया था। दूसरे लोगों को मेरे खाने की आदतों ने हंसने के लिए मजबूर किया। बंगाली मित्र के यहां काफी विशाल आयोजन था। बांकुडा से टैंट मंगवाया गया था। लाउडस्पीकर का भी इंतजाम था। दिखावट के शहरी साधन वहां उपलब्ध थे। किन्तु संथाली मित्र के यहां सबकुछ साधारण था। वहां बराती भी कम थे। सबने पेड़ की छांव में बैठकर भोजन किया। टैंट और लाउडस्पीकर पर रुपया नहीं बहाया गया। इसीलिए मुझे संथाली मित्र के घर पर अच्छा लगा। मिट्टी के बरतन में पानी, पेड़ के पत्तों की पत्तल पर भोजन सब मन को भाया। विवाहोपरांत आदिवासी नृत्यों का भी आयोजन हुआ।

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हिन्दी सिखाते, बंगाली-संथाली सीखते, गांवो में घूमते-घुमाते मित्र मंडली में मस्ती मारते, मोड़ पर आकर्षण बनते - बनाते, कब समय गुजर गया पता ही नही लगा। तीस जून का दिन आदिवासी समाज के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण होता है। ये दिन क्रांति का प्रतीक है। यही वो दिन है जिस दिन जंगल के दो दावेदारों छेछू-कानू आदिवासी भार्इयों को ब्रिटिश हकूमत ने फांसी की सजा दी थी। ये सोचकर कि उन दोनों की मौत जंगल के अन्य दावेदारों को भयभीत कर देगी मगर छेदू-कानू का बलिदान बेकार नहीं गया। भारत के अन्य इलाकों में चाहे इन मां के जंगली सपूतों को याद ना किया जाता हो मगर जंगलों के दावेदार अभी भी इन्हें क्रांति के देवता मानकर आज भी उनका सम्मान करते हैं।

            30 जून को हमने जीयूएस में छेदू-कानू बलिदान दिवस समारोह का आयोजन किया। पहले सब उपसिथत व्यकितयों ने छेदू-कानू की प्रतिमा पर फूल चढ़ाकर उनका अभिवादन किया। उसके बाद संथाली भाषा में वीरों को श्रद्धांजली देते हुए रसमोय दा, मदनमोहन मुरमू, वानेश्वर, रोहन और भी लोगों ने मिलकर एक गीत गया। उसके बाद कुछ गांव के बूढ़े-बुजुर्गो ने अपने-अपने विचार रखे। बाद में कविताऐं पढ़ी गर्इ, गीत गाए गाये। अंत में मुझे अपनी एक हिन्दी कविता पढ़नी पढ़ी जिसका सांथाली में रूपांतरण रसमोयदा ने किया। फिर मैंने जितना संथाली में बातें सीखी सब सुनार्इ और अंत में सबके कहने पर मैंने हिन्दी में एक छोटा सा भाषण मुझे उनके बीच कैसे-कैसे अनुभव हुए पर दिया।

            एक जुलार्इ को कलकत्ता से लैम्प संस्था के महासचिव मलय दीवान  बांकुड़ा आये। हम (मैं और रसमोय दा) उनसे मिलने गए। मलय दीवान साथ उनके परिवार के अन्य सदस्य भी आये थे उनकी पत्नी सुतापा, लड़का राज, मणी उनकी पुत्री सभी से मेरा परिचय हुआ। मैं दो दिन दीवानजी एवं उनके परिवार के लोगों के साथ रहा। हम अनेकों स्थानों जैसे रानीगंज, दुर्गापुर, पातरसराय, सोनमुख पर लैम्प के प्रोजेक्ट देखने गऐ। राज और ड्रार्इवर साहू (छबि साहू) के साथ तो मेरी बड़ी अच्छी मित्रता हुर्इ। छोटी मणी मुझे प्यार से हिंदी अंकल पुकारती थी। तीन दिन बाद दीवान परिवार वापिस कलकत्ता चला गया।


            मैं भी दो दिन बाद रसमोय दा व अन्यलोगों के साथ कलकत्ता गया। रसमोयदा तो अपना संस्था से संबंधित कार्य समाप्त होने पर वापस रंगामेटा चले गऐ किन्तु मैं वहीं डटा रहा। तीन-चार दिन कलकत्ता में सभी दर्शनीय स्थान, र्इमारतें, प्राचीन महल, म्युजियम, काली माता का मंदिर, वहां के बाजार इत्यादि राज एवं विश्वास के साथ देखे। विश्वास राज का मित्र था। बाद में वह मेरा भी अच्छा मित्र हो गया। लगभग दस दिन कलकत्ता में बिताने के बाद मैं रंगामेटा लौट आया।

            18 जुलार्इ का मेरा आरक्षण नीलांचल एक्सप्रैस में करवाया गया था। मैं दो दिन बांकुड़ा (लैम्प) में और रहना चाहता था। अत: रंगमेटा से मैं 15 को रवाना हुआ। विदार्इ के समय संस्था के प्रत्येक सदस्य का करूणमयी चेहरा मुझे आज तक याद है। उनके बीच में से आने का मेरा बिल्कुल भी मन न था। मगर क्या करता कालेज खुल चुका था। तृतीय वर्ष की पढ़ार्इ करनी थी मैं सबको पुन: लौट आने का आश्वासन देकर बांकुड़ा आ गया। बांकुड़ा में मेरी मुलाकात कुछ और लोगों से हुर्इ। एक दिन मैंने घूमकर पूरा का पूरा बांकुड़ा देखा! दरिद्रता और गरीबी की रेखा से नीचे जीता बांकुडा भरी गलियों आज भी मेरी आंखों के सामने है।

            अंत में एक गलती हुर्इ। मैंने ट्रेन मिस कर दी। अगली गाड़ी में बिना आरक्षण बड़ी तकलीफ हुर्इ। दिल्ली पहुँच कर सबसे पहले रसमोय दा को पत्र लिखा। अब भी रसमोय दा और बाकी मित्रों की बड़ी याद आती है।

 अगस्त, 1991
 


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