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Thursday 6 June 2013

PEOPLE WITH AIDS AND VIOLATION OF HUMAN RIGHT


 

MUKESH MANAS

(A paper about the Struggle for human rights protection of PWA's, Presented in 2nd Internationalal conference held at Pune in Aug'96)

 

 

दोस्तो,

मैं दिल्ली के एक लोक समूह एडस भेदभाव विरोधी आन्दोलन यानी ए. बी. वी. ए. के सभी साथियो की तरफ से एक प्रतिनिधी के तौर पर आपके साथ इस कार्यशाला में शामिल हो रहा हूँ। साथियो, इससे पहले कि मैं आपको यह बताऊँ कि ए. बी. वी. ए. की एडस के मसले पर क्या सोच है और उसके सदस्य इस विषय पर दिल्ली पर क्या रहे हैं, मैं आपको थोड़ी सी जानकारी ए. बी. वी. ए. के बारे में देना चाहूँगा

 

ए. बी. वी. ए. के बारे में

ए. बी. वी. ए. 18-19 अलग-अलग पेशों में लगे हुए व्यकितयों का एक संगठन है। इनमें से कुछ डाक्टर, वकील, पत्राकार, समाज सेवी और पेशेवर रक्तदाता हैं। इस समूह की शुरूआत तकरीबन 8-9 साल पहले दिल्ली के रैड लार्इट एरिया में रहने वाली महिलाओं की समस्याओं को समझने और जानने को लेकर हुर्इ थी। ये सभी साथी काफी पहले ही शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून, पर्यावरण और शांति सदभाव जैसे मसलों पर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे।

ए. बी. वी. ए. एक ऐसा संगठन है जो किसी सरकारी गैर सरकारी या विदेशी संस्था से किसी तरह का दान या èान नहीं लेता है। ग्रुप सदस्य अपनी हर गतिविधि और एक्शन के लिए अपनी जेबों से धन इकट्टा करते हैं और उसका उपयोग आवश्यकतानुसार करते हैं। जैसे, रिपोर्ट निकालने में, प्रैस कान्फ्रैंस करने में, जानकारी के लिए यात्रा करने में, चिट्टियाँ टार्इप करवाने और उन्हें भेजने में। अगर कुछ विशेष जरूरत हो तो साथी संगठनों से मदद की अपील की जाती है। यह एक गैर पार्टी संगठन है मगर इसका मतलब यह कतर्इ नहीं है कि ए. बी. वी. ए. के साथी समाज में राजनीति की भूमिका को नकारते हैं। ए. बी. वी. ए. के सदस्य गरीबों, शोषितों के अधिकारों और सही विकास की दिशा वाले राजनीतिक दृषिटकोण में विश्वास रखते हैं।

 

ग्रुप के सदस्यों ने एडस के मसले पर लगातार काम करने की प्राथमिकता तय कर रखी है मगर इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि हम अन्य मुद्दों के बारे में नहीं सोचते है। हम समाज में उठने वाले हर मुद्दे, चाहे वह झुग्गी बस्ती की औरत के साथ बलात्कार का मुद्दा हो, स्वास्थ्य का हो, चाहे विस्थापन या आवास का; हम सबके बारे में उतने ही संवेदनशील हैं जितने एडस के मुद्दे पर। ग्रुप सदस्य हर बुधवार को कनाट प्लेस, मोहन सिंह प्लेस में सिथत इंडियन काफी हाउस में शाम के 6:30 से 9:00 बजे तक मिलते हैं। हमारे पास एक पोस्ट बाक्स न. भी हैं।

ए. बी. वी. ए. एडस के मसले पर दिल्ली में 1 जुलार्इ 1988 से लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहा है। 1988 से ग्रुप सदस्य लगातार जी. बी. रोड़ की बहनों से मिलते रहे और उनकी दिक्कतों को समझने का प्रयास करते रहे। जी. बी. रोड़ की बहनों की स्थास्थ्य सम्बंधी दिक्कतों को समझते हुए सीमित साधनों के साथ एक छोटी सी डिस्पेंसरी शुरू की। इस डिस्पेंसरी में होने वाले खर्च के लिए ग्रुप सदस्यों ने 50 रु. प्रतिमाह अपनी जेब से देने का निर्णय लिया। ग्रुप के दो साथी लगातार इस डिस्पेंसरी को चलाने में अपना वक्त लगाने लगे।

ए. बी. वी. ए. संगठन ने अपने अनुभव से जाना कि जिस तरह से भारत में 'एडस’ नामक बीमारी का बढ़ा-चढ़ाकर और गलत तरीके से प्रचार किया जा रहा है उसके पीछे सरकार की अपनी एक राजनीति है। एक तरफ तो, सरकार एडस नामक बीमारी के लिए जबरदस्ती वेश्यावृत्ति में धकेली गर्इ इन बहनों को ही दोषी ठहराती है जो कि हमारी सोच और अनुभव के हिसाब से काफी एक तरफा और गलत समझ है। दूसरी तरफ ग्रुप सदस्यों ने देखा कि सरकार उन्हें स्वास्थ्य की प्राथमिक सुविधाएँ ठीक तरीके से मुहैय्या नहीं करवा पा रही है। उन्हें लगतार घटिया कन्डोम इस्तेमाल करने के लिए दिए जाते रहे हैं। इसके अतिरिक्त सरकार ने इन बहनों की सामाजिक जिन्दगी का उचित पुनर्वास करने के लिए आज तक कोर्इ नीति नहीं बनार्इ है।

महीने में दो बार की औसत से ग्रुप सदस्यों ने जैसे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक, उपसचिव, दिल्ली प्रशासन के स्वास्थ्य सचिव, समाज सेवा निदेशालय के निदेशक, दिल्ली पुलिस शाखा के उपायुक्त मौलाना आजाद मेडिकल कालेज में स्त्री रोग एवं प्रसूति विभाग की प्रोफेसर और कई सरकारी अफसरों से मिलकर जी. बी. रोड की इन बहनों की समस्याओं को उनके सामने रखा तथा एच. आर्इ. वी. पाजिटिव व्यक्तियों के बारे में जो सही कदम उठाये जाने चाहिए उसके बारे में एक मीमो बनाकर उन्हें सुझाव दिए। जी. बी. रोड़ की महिलाएँ भी कर्इ मीटिगों में हमारे साथ गईं।

 

1989 में ग्रुप को पता चला कि आल इंडिया इन्स्टीटयूट आफ मेडिकल साइंसिस और इंडियन काऊसिल आफ मेडिकल रिसर्च के डाक्टरों ने 15 मार्च 1990 को दिल्ली के रेड लार्इट एरिया जी. बी. रोड की वेश्यावृत्ति के पेशे में धकेली गर्इ बहनों के साथ पुलिस की मदद से ज़बरन एच. आर्इ. वी. (एडस) की जाँच करने की कोशिश की थी। ग्रुप ने डाक्टरों और पुलिस के इस कृत्य का विरोध किया और माँग की कि किसी भी सरकार को इस तरह की जाँच करने से पहले उनकी सहमति लेनी चाहिए। ग्रुप का ये मानना है कि सरकार को पहले इनके पुनर्वास के लिए एक सही नीति बनानी चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती है तो उसे इनके जैसे किसी भी व्यक्ति की जबरदस्ती किसी भी तरह की जाँच करने का कोर्इ अधिकार नहीं है। अगर कोर्इ सरकारी अफसर ऐसा करता है तो उसे दंडित किया जाना चाहिए।

इसी दौरान सरकार ने 18 अगस्त 1989 को राज्य सभा में चुपके से एडस बिल(ऐड्स प्रीवेंशन एक्ट)  प्रस्तुत किया जो कि हर तरफ से भ्प्ट और एडस से पीडि़त साथियों के लिए पूरी तरह अमानवीय था।  ए. बी. वी. ए. ग्रुप के साथियों ने लगातार धरने और जुलूस आयोजित करके घ्रणित एडस बिल को वापिस लेने की माँग की। ग्रुप ने लगातार प्रैस में बयान दिए कि क्यों ये कानून काला और अमानवीय है। हमारा ये मानना था कि अगर यह बिल पास हो जाता तो यह एडस के पीडि़त व्यकितयों की दशा और खराब ही करता। इस बिल के पास हो जाने से सरकार और पुलिस को एडस से पीडि़त रोगियों को समाज से अलग करने, उन्हें मनमर्जी जेल में डालने, तथा अमानवीयता की हद तक पीटने का अधिकार मिल जाता। इस कानून की एक धारा में डाक्टरों को जबरन एडस की जाँच करने का अधिकार दिया गया था।

 

इस बिल में एडस रोगियों के इलाज व उनके उचित पुनर्वास की बात कहीं नहीं थी। याद कीजिए कि आज से 100 साल पहले अंग्रेज सरकार भी भारत में इसी तरह का एक बिल(एन्टी लेपर बिल) 1898 में लेकर आर्इ थी। उस बिल में कुष्ठ रोगियों के रोग के उन्मूलन की बात न होकर उनको समाज से अलग रखने यानि उन्हीं के उन्मूलन की बात थी। इसी बिल के तरह आज भी कुष्ठ रोगियों के प्रति भेद-भाव वाला नज़रिया बरता जा रहा है। आज भी कर्इ अस्पतालों में उनका इलाज करने से इन्कार कर दिया जाता है। इसी के चलते आज भी वे शहरों में अलग बस्तियाँ बनाकर रहते है।

अगर यह एडस बिल पास हो जाता तो एडस रोगियों की भी यही हालत होती और समाज से उनका पूर्ण बहिष्कार किया जा सकता था। इस बिल के पास हो जाने से एडस से पीडि़त हजारों साथियों के भाग्यों पर ताला लग सकता था।

 

‘विमेंन एंड एडस’ और 'एडस और मानव अधिकारों का संकट’

पहले ग्रुप का ये मानना था कि हमें बस काम में लगातार सक्रिय रहना चाहिए और जहाँ भी मौका मिले एडस के मसले पर हल्ला करना चाहिए। पहले हम किसी भी तरह की रिपोर्ट निकालने के बारे में सोचते थे। किन्तु बाद में लगातार काम करते हुए हमें लगा कि रिपोर्ट निकालना हमारे लिए कानूनी और राजनैतिक लड़ार्इ लड़ने में काफी सहायक हो सकता है। रिपोर्ट के ज़रिए एडस के अलग-अलग बिन्दुओं पर हम जो लगातार आवाज उठा रहे है, धरने जुलूस कर रहे है उसको जन साधारण और प्रभुद्ध नागरिकों और सरकारी अफसरों तक पहुँचा सकते है और प्रबुद्ध नागरिकों और सरकारी अफसरों तक पहुँचा सकते हैं। यही सोच कर ग्रुप ने अप्रैल 1991 में ‘विमेंन एंड एडस’ और 'एडस और मानव अधिकारों का संकट’ शीर्षक से अंग्रेजी और हिन्दी में पहली रिपोर्ट निकाली। इस रिपोर्ट को निकालने के पीछे वजह ये थी कि ग्रुप सदस्यों ने महसूस किया था कि जी.बी. रोड़ की महिलाएँ और एच. आर्इ. वी. पाजिटिव साथी एडृस के बारे में थोड़ी कम जानकारी रखते हैं। और उनको सरकारी एडस नीति के बारे में भी ज्यादा मालूमात नहीं है।

 

इस रिपोर्ट में पूरी जानकारी को दो हिस्सों में बांटा गया था एक हिस्से में एडस और सरकारी एडस नीति के बारे में जानकारी रखी गर्इ थी और दूसरे हिस्से में वेश्यावृत्ति में èाकेली गर्इ महिलाओं की खराब सिथति पर प्रयास डाला गया था। इसमें इस बात की स्पष्टता पर भी जोर दिया गया था कि कैसे सरकारी एडस नीति इन महिलाओं के मानव अधिकारों का हनन करती है। ग्रुप ने यह आशा की थी कि इस रिपोर्ट से एच. आर्इ. वी. और एडस के बारे में चेतना जागृत होगी और सरकार की जन विरोधी एडस नीति के विरोध में आवाज उठेगी। 

 

ब्लड आफ प्रोफेशनल्स

            1991 में ग्रुप सदस्य जगदीश भारद्वाज की मदद से ग्रुप ने पेशेवर रक्तदाताओं की सिथति पर प्रकाश डालने के लिए ‘ब्लड आफ प्रोफेशनल्स’ शीर्षक से निकाली। इस रिपोर्ट में साथी जगदीश भारद्वाज ने अपने पेशेवर रक्तदाता बनने की कहानी बताते हुए, भारत में रक्त बैंकों के प्रारम्भ और आज तक का उनका इतिहास बताया है। उन्होंने बताया है कि किस तरह ये बैंक आज अमीरों के रक्षक और गरीबों के शोषक और भक्षक बन गए है। आज भी इन बैंकों में से अधिकतर बैंक गैर लाइसेन्सी हैं। इनमें रक्तदाताओं से रक्त की दो यूनिट लेकर एक यूनिट के ही पैसे दिए जाते है। इन अस्पतालों मे रक्त निकालने के लिए अपर्याप्त साधनों का उपयोग किया जाता है जिसके कारण इन पेशेवर रक्तदाताओं में एच आई वी और एडस होने का खतरा बढ़ा है। सरकारों ने आज तक इन मानव जीवन रक्षकों के उचित पुनर्वास क विषय में भी नहीं सोचा है। ग्रुप साथी जगदीश भारद्वाज ने दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में पेशेवर रक्तदाताओं की सुरक्षा और उचित पुनर्वास की माँगों को लेकर केस डाला हुआ है जो अभी तक चल रहा है।

            2 जनवरी 1999 को एम्स में एक अफ्रीकी दूत को भर्ती किया गया जिनका 15 जनवरी को बार्इ पास सर्जरी होनी थी जो उनकी जान बचाने के लिए बहुत ही जरूरी था। मगर डाक्टरों ने उसको एडस होने के कारण यह आपरेशन करने से इन्कार कर दिया। परिणामस्वरूप 29 जनवरी 1999 को उनकी मृत्यु हो गर्इ।

            28 फरवरी 1999 को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर ग्रुप ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिल्ली हेडक्वार्टर पर एक एडस से पीडि़त अफ्रीकन दूत को एम्स के डाक्टरों द्वारा आपरेशन न किए जाने तथा उनको चिकित्सा की प्राथमिक सुविधाएँ भी मुहैय्या न करवाए जाने के विरोध में एक धरना दिया। ये धरना डाक्टरों द्वारा एडस के किसी भी मरीज के प्रति भेदभाव बरतने के विरोध में भी किया गया था। ग्रुप ने इस दिन को इसलिए चुना ताकि लोगों को बता सकें कि विज्ञान लोगों के फायदे के लिए है न कि उनको बरबाद करने के लिए। धरना लगभग चार घंटे चला और एम्स के डायरेक्टर जनरल को एक मीमो भी दिया गया। इसी क्रम में जिन डाक्टरों ने उस अफ्रीकन साथी का ट्रीटमेंट करने से इंकार कर दिया था और ऐसे डाक्टर जो किसी भी एडस मरीज के साथ भेदभाव का बर्ताव करते है; उनके नाम मेडिकल रजिस्टर के हटवाने से लिए 30 नवम्बर '90 को भारतीय चिकित्सा परिषद के मुख्यालय  पर धरना दिया। इस धरने के पीछे ग्रुप की सोच यह थी कि मेडिकल एथिक्स के हिसाब से डाक्टरों का यह फर्ज है कि मरीज चाहे कोर्इ भी हो और वह किसी भी रोग से पीडि़त हो उसे देखें। अगर वह इससे इंकार करते हैं तो यह भारतीय चिकित्सा के नैतिक मूल्यों के खिलाफ बात है। पाँच महीने बाद भारतीय चिकित्सा संघ ने पब्लिक में बयान देकर यह माना कि डाक्टरों का यह कदम-मेडिकल एथिक्स के खिलाफ था।

            इसी बीच दिल्ली में थैलिसिमिया नामक बीमारी से पीडि़त एक बच्चे का केस सामने आया जिसको खून चढ़ाने की प्रक्रिया में एच आई वी इन्फेक्शन हो गया था और जिसका नर्इ दिल्ली नगर पालिका मोती बाग के अस्पताल के डाक्टरों ने इलाज करने से इंकार कर दिया था। ग्रुप ने 18 मार्च 1991 को नर्इ दिल्ली नगर पालिका के मुख्यालय के आगे इसके खिलाफ धरना दिया और माँग रखी कि एडस के मरीजों से इस तरह का भेदभाव करने वाले  डाक्टरों की डिग्री छीन ली जाए। 7 अगस्त 1991 को दिल्ली के अलभग 500 साथियों ने ए.बी.वी.ए. के साथ मिलकर एम्स के बाहर धरना दिया। इस धरने को रखने का कारण था कि  एम्स के डाक्टरों ने एक एच आई वी पाजिटिव गर्भवती महिला की डिलीवरी करने से इंकार कर दिया था।

            ग्र्रुप ने यह पता लगाया कि एम्स में बीस लाख रुपए की लगात से एडस मरीजों के लिए कुछ खास उपकरणों वाला एक विशेष वार्ड बनाया गया था। मगर इसके होते हुए भी डाक्टरों ने उस अफ्रीकन राजनायिक की सर्जरी करने से इन्कार कर दिया था। एम्स में जो बहनें रैड लार्इट एरिया से आती थी उनके भी डाक्टरों ने पीले कार्ड बना दिए थे ताकि उनको अलग से वेश्या या एच आई वी पाजिटिव के रूप में पहचाना जा सके। इस तरह ग्रुप ने महसूस किया कि सरकार किस तरह से उनके साथ भेदभाव की नीति लागू कर रही थी। सरकार अगर रैड लार्इट एरिया की औरतों के इलाज में पैसा नहीं लगा रही है, एच आई वी साथियों को विशेष उपकरणों की सुविधा नहीं दे रही है तो ये पैसे, ये उपकरण किसके लिए इस्तेमाल हो रहे हैं?

            इसी बीच अख़बारों के जरिए ग्रुप को पता चला कि विश्व बैंक 200 करोड़ का एक सामान्य शतो± वाला ऋण भारत सरकार को एडस उन्मूलन के लिए दे रहा है। सरकार द्वारा एडस के नाम पर लिए जाने वाले धन के दुरूपयोग की बात को सामने लाने और विश्व बैंक द्वारा उसे इतनी बड़ी रकम का ऋण देने के खिलाफ 6 दिसम्बर 1991 को ग्रुप ने अन्य साथी संगठनों के साथ मिलकर विश्व बैंक के दिल्ली स्थित मुख्यालय पर धरना दिया और माँग रखी कि विश्व बैंक द्वारा भारत सरकार को दिए जाने वाला यह ऋण वापस लिया जाना चाहिए। ग्रुप के सदस्य ये मानते हैं कि एच आई वी पाजिटिव व्यक्तियों के संदर्भ में कोर्इ भी ऐसा कार्यक्रम जिसके प्रबंधन और क्रियान्वयन में एच आई वी पाजिटिव साथियों की कोर्इ हिस्सेदारी न हो, उसे सरकार द्वारा या कहीं से भी धन नहीं दिया जाना चाहिए। विश्व बैंक के एक प्रतिनिधी मंडल ने ग्रुप सदस्यों को आश्वासन दिया कि हमारी माँग के मुताबिक ऋण में संभावित दृषिटकोण रखा जाएगा। यदि पता चलता है कि सरकार इस पैसे का दुरूपयोग कर रही है तो इस पर यथासंभव कार्यवाही की जा सकती है।

            इसी बीच एडस बिल पुनरावलोकन के लिए ज्वाइंट पार्लिमेंटरी कमेटी  आगे रखा गया इस कमेटी के अèयक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे। ग्रुप के छ: सदस्यों को जे. पी. सी. से सवाल-जवाब करने के संबंध में निमंत्रण पत्र भी मिले। आपकों जानकर खुशी होगी कि ग्रुप के प्रयासों के चलते अंतत: यूनियन केबिनेट ने अक्टूबर-नवम्बर '91 में एडस बिल वापिस ले लिया।

 

लैस दे गे 

            ग्रुप ने नवम्बर-दिसम्बर '91 में 'लैस दैन गे’ शीर्षक से तीसरी रिपोर्ट प्रकाशित की। भारत में अèािकतर लोग इस बात से इंकार करते है कि यहाँ समलैंगिकता जैसी कोर्इ चीज़ भी उपसिथत है। जो लोग मानते है कि भारतीयों के बीच में समलैंगिकता है तो उनका सोचना है कि यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसे ठीक किया जाना चाहिए। वे इसे एक ऐसे अपराध के रूप में देखते हैं जिसके लिए सज़ा मिलनी चाहिए। वे इसे ऐसे रोग के रूप में देखते हैं जिसका इलाज होना चाहिए। एक हजार में एक दो लोग ही ऐसे मिलेंगे जो यह मानते है कि मनुष्यों में समलैंगिकता का पाया जाना एक स्वभाविक चीज़ है जैसे एक आदमी एक औरत से शारीरिक संतुषिट की इच्छा रख सकता है। 

            भारत में एडस की बीमारी की उपसिथति ने अब इन समलिंगी व्यकितयों के इस भीतरी रिश्ते को 'ओपन कर दिया। सरकारी व्यवस्था इन समलैंगिकों को भी एडस की बीमारी का एक कारण बताती है। जैसे वेश्यावृत्ति में जबरन धकेली गर्इ बहनों, पेशेवर रक्तदाताओं के लिए भारतीय कानून में कोर्इ सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए हैं बल्कि इनके मानव अधिकारों को खत्म ही किया हैं उसी तरह से इन समलिंगी व्यकितयों को भी गलत नज़र से देखा गया है। समलिंगी व्यकितयों के बीच के भावनात्मक रिश्ते को एक स्वाभाविक चीज़ न मानकर भारतीय कानून इसे एक अपराध की तरह देखता है और इसके लिए उसने सज़ा के प्रावधान भी बना रखे हैं ग्रुप ने आम प्रबुद्ध नागरिकों के लिए इन समलिंगी व्यकितयों के जीवन और भारत में समलैंगिकता के पूरे इतिहास पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से यह रिपोर्ट निकाली थी।

 

यह चीनी कड़वी है (दिस शुगर इज़ बिटर)

            ग्रुप ऐसे काफी लोगों से दिल्ली में लगातार मिलता-जुलता रहा है जिनको कुछ नशीली दवाइयों का नशा करने की लत पड़ चुकी है जो एक तरह नशीली दवाइयों के सेवन पर निर्भर हो गए हैं। भारत में लोग नशा करने की आदत को कोर्इ बीमारी या रोग के रूप में नहीं देखते हैं। बल्कि भारत में नशा या मदिरा सेवन का एक पुराना इतिहास है पुरानी परम्परा है। मगर भारत सरकार ने पिछले कर्इ दशकों में जिस तरह की नीतियाँ लागू की हैं उनके परिणाम स्वरूप लोगों में नशा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा ही मिलता रहा है। शराब और नशीली दवाइयों के विक्रय से भारत सरकार को एक बहुत बड़ी रकम की आमदनी होती है।

ए. बी. वी. ए. ग्रुप देश में हर व्यक्ति के मानवाधिकारों की बात सोचता है। उसके सदस्यों को 1991-92 में अख़बारों के ज़रिए अनेकों खबरों को पढ़कर आश्चर्य हुआ कि भारत सरकार ने मनीपुर राज्य में सैकड़ों नशीली दवार्इयों का सेवन करने वाले व्यक्तियों को जेल में बंद कर दिया गया है। आश्चर्य की बात है कि ऐसा कदम भारतीय सरकार ने सिर्फ मनीपुर में ही उठाया है। ए. बी. वी. ए. के सदस्यों को लगता है कि इसके पीछे राजनीतिक व्यवस्था की एक समझी-बूझी साजि़श काम कर रही है।     ए. बी. वी. ए. के दो सदस्य 1992 में मनीपुर में इस सिथति की असलियत की जानकारी लेने के लिए मनीपुर गए और अनेकों ऐसे व्यकितयों से मिले जिनको मनीपुर सरकार ने केन्द्रीय सरकार की शह पर जेल में डाल दिया गया था। क्या नशीली दवाइयों का सेवन करने वाले व्यकितयों को जेल में डाल देने से वे सेवन करना बंद कर देंगे।

            नशीली दवाइयों के सेवन की इस लत के कारण भारतीय राजनीति और समाज व्यवस्था के ढाँचे तलाश करने चाहिए। अगर व्यकित इस तरह की नशीली दवाइयों को सेवन करने की अवस्था तक पहुँचते हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ सामाजिक राजनीतिक कारण होते है। आखिर इतनी संख्या में उनको ये नशीली दवाइयाँ कौन उपलब्ध करवाता है? आज ये बात एकदम खुलकर सामने आ चुकी है कि पीछे भारतीय सरकार का कितना बड़ा हाथ है? पिछले कर्इ सालों में इन नशीली दवाइयों का उत्पादन घटने की बजाए बढ़ा ही है। और भारत सरकार ने दवार्इ निर्माताओं को लगातार पूरी मदद और खुली छूट दी है। इसके पीछे का एक साधारण सा कारण ये है कि सरकार को इन दवाइयों के उत्पादन और विक्रय से टैक्स के रूप में भारी कमार्इ होती है। दूसरे नशीली दवाइयाँ अगर देश के किसी भी कोने में खुले रूप से बेची जाती हैं तो उसमें निशिचत रूप से सरकार और पुलिस का पूरा हाथ रहता है।

            मनीपुर में गए साथियों ने अपने अनुभव, और जानकारी के हिसाब से इस सिथति पर प्रकाश डालने के लिए बाकी साथियों के साथ मिलकर 'यह चीनी कड़वी है’ शीर्षक से मर्इ '92 में रिपोर्ट प्रकाशित की। मनीपुर में नशीली दवाइयों का सेवन करने वाले व्यक्तियों की जि़न्दगी, उनकी सोच और नशीली दवाइयों की लत के बारे में इस रिपोर्ट में काफी जानकारी एकत्रित की गर्इ है। अधिकतर युवा साथियों ने जिनको नशीली दवाइयों की लत की वजह से जेल में डाला गया था, और अनेक बातों के अलावा एक बड़ी महत्वपूर्ण बात बतार्इ जो भारतीय केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था के एक पक्षपात पूर्ण चरित्रा का खुलासा करती है। उन्होंने बताया कि मनीपुर में रहने वाला एक बड़ा तबका लगातार अपनी असिमता और जाति की स्वास्यत्ता के लिए केन्द्रीय राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। उस आवाज़ को दबाने के उद्देश्य से पहले सरकार ने नौजवान साथियों में नशे की आदत डाली और आंदोलन को तोड़ा फिर उन पर नशीली दवार्इयों के सेवन का आरोप लगाकर उन्हें जेलों में बद कर दिया।

            सरकार ये मानती है कि मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यकित ही एडस फैलाते हैं और जिसके चलते सरकार ने उन्हें जेल में बंद कर दिया। ग्रुप ने मनीपुर में जेल वार्डन, राजनेताओं और सरकारी अफसरों से मिलकर इस संबंध में उचित कदम उठाने की माँग रखी। चार साल बाद मनीपुर सरकार ने राज्य में एडस को फैलाने से रोकने के लिए नशा करने वाले व्यकितयों को ैलतपदहमे और सुर्इ मुफ्त मुहैय्या करवाना शुरू कर दिया है। विकासशील देशों में एडस की दवार्इ को एडस रोगियों पर जाँच कर देखने की विकसित देशों की योजना के खिलाफ ग्रुप ने 6 अगस्त 1992 को विश्व स्वास्थ्य दिवस की पूर्व बेला पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिल्ली हेडक्वार्टर के सामने धरना आयोजित किया जिसमें गए सदस्यों के अलावा 37 जागरूक संगठनों ने भी हिस्सा लिया।

            इसी बीच दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क से बिल्कुल गैर कानूनी तरीके से, बिना वारंट जारी किए 18 तथाकथित समलैंगिक व्यकितयों को गिरफ्तार कर लिया उनकी इस गैर कानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ ग्रुप सदस्यों ने 11 अगस्त '92 को दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना दिया।

            25 सितम्बर 1992 को ग्रुप ने भारतीय सामाजिक संस्थान में हाल किराये पर लेकर यौनिकता की राजनीति विषय पर सेमिनार का आयोजन किया। जिसमें दिल्ली के अनेक गैर-सरकारी संगठनों, समलैंगिक व्यक्तियों, पेशेवर रक्तादाओं, जी. बी. रोड़ की बहनों ने हिस्सा लिया और इस विषय पर अपने विचार रखें।

            नवम्बर 92 में दूसरी एशिया पेसिफिक कांग्रेस हुर्इ जिसमें शामिल होने के लिए ग्रुप को भी बुलाया गया था। भारत सरकार द्वारा एच आई वी व्यक्तियों और एडस मरीजों के खिलाफ अपनार्इ जा रही जन विरोधी नीतियों को सामने लाने का यह अच्छा अवसर था। ग्रुप के कुछ सदस्यों ने कांग्रेस में शामिल होकर पर्चे बाँटे और नारे लगाए। इसके बार चार दिन तक लगातार बाहर खड़े होकर कांग्रेस के विरोध में धरना दिया।

            दिसम्बर '92 में देश में जो शर्मनाक हादसा घटिया हुआ उसके विषय में आज शायद सब जानते हैं। मस्जिद के टूटने के बाद देश भर में दंगे हुए। देश के सब छोटे-बड़े शहरों में इन दंगों ने खासकर मुसिलम इलाकों में जानो-माल की काफी बरबादी हुर्इ। दिसम्बर '92 से मर्इ '93 तक ए. बी. वी. ए. ने दिल्ली के दंगा पीडि़त क्षेत्रों में खासकर मुसिलम बहुल इलाके सीलमपुर में काम किया। मार्च '93 में ए. बी. वी. ए. ने ‘विकिटम्ज़ वर्ज़न’ शीर्षक से एक रिपोर्ट निकाली। इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे लोगों की केस हिस्ट्री संकलित की गर्इ थी जो बाबरी मसिजद टूटने के बाद इस इलाके में भड़क उठे दंगों में पुलिस की गोली से बुरी तरह जख्मी हुए थे। ग्रुप ने कर्इ अन्य साथी संगठनों जैसे अंकुर, भारतीय सामाजिक संस्थान, सदभाव मिशन, दि. वि. वि., जे. एन. यू., अल्लारिपू, प्रिया आदि के साथ मिलकर हताहत लोगों के लिए सहयोग के आधार पर चिकित्सा सुविधाएँ मुहैय्या करवार्इ।

            ए. बी. वी. ए. ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर वर्ष '93 के अप्रैल, मर्इ, जून माह में दिल्ली उपराज्यपाल के दफ्तर, राष्ट्रपति निवास और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के आगे तीन èारने आयोजित किए। और दंगा पीडि़त लोगों के लिए वित्तिए सहायता तथा इस कांड के अपराधियों के लिए सज़ा की मांग रखी। आज तक केस चल रहा है और अभी भी बहुत से लोगों को उचित मुआवजा नहीं मिला।

 

हार्ड टार्इम फार पाजिटिव ट्रेवल

एडस की बढ़ती बीमारी को रोकने के लिए भारत सरकार ने जो कदम उठाए उसके तहत उसने जिस तरह वेश्यावृत्ति में जबरन धकेली गर्इ महिलाओं, पेशेवर रक्तदाओं, समलैंगिक व्यक्तियों और नशीली दवाइयों का सेवन करने वाले व्यकितयों के मानव अधिकारों को छीना और उनके लिए सज़ा का प्रावधान निर्धारित किए उसी तरह उसने भारत में घूमने के शौक से आने वाले एडस से पीडि़त विदेशियों को रोकने के लिए कुछ कानून बनाए हैं। भारतीय सरकार यह मान बैठी है कि भारत में आने वाले एडस से पीडि़त विदेशी पर्यटक भी भारत में एडस फैलाते हैं। अत: इनको भारत में आने से रोका जाना चाहिए। और जो आ जाए और पता चले कि वो एडस से पीडि़त है तो उनको विदेश वापिस भिजवा देना चाहिए। इसके लिए सरकार ने जो नीति बनार्इ है उसका क्रियान्वयन बड़े गलत और अमानवीय तरीके से किया जाता रहा है।

            ए. बी. वी. ए. ने ऐसे केसों का पता लगाया जिनमें पाया गया कि अनेकों विदेशी पर्यटकों को जो कि एडस की बीमारी से किसी न किसी तरह पीडि़त थे उनके बारे में जानकारी मिलते ही उन्हें वापिस भेज दिया। उनको प्रारंभिक सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं करार्इ गईं। भारत में, जहाँ कि अतिथि देवो भव: का पाठ बच्चों को पढ़ाया जाता है वहाँ वास्तव में हालत ये हैं कि ऐसे विदेशी मेहमानों को जो हमारे देश में घूमने आते हैं और उनमें अगर कोर्इ एडस जैसी बीमारी से पीडि़त पाया जाता है तो उसका बिना इलाज की प्राथमिक सुविधाएँ दिए, उनके देश के लिए जबरदस्ती हवार्इ ज़हाज में चढ़ा दिया जाता है या उन्हें जल्दी से जल्दी चाहे उनकी कितनी भी बुरी हालत हो, उनके देश जाने के लिए मज़बूर कर दिया जाता है।

            ए. बी. वी. ए. ने एडस से पीडि़त-विदेशी साथियों के साथ भारत सरकार के इस तरह के पक्षापातपूर्ण रवैये का खुलासा करने के उद्देश्य से 'हार्ड टार्इम फार पाजिटिव ट्रेवल’ रिपोर्ट सितम्बर '93 में निकाली। इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे विदेशी साथियों के साथ, जो इस बीमारी से पीडि़त थे, भारत सरकार द्वारा बदसलूकी का बयान किया गया है। ग्रुप सदस्य महसूस करते है कि यह सिर्फ भारत सरकार की ही बात नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के देशों में एच आई वी व्यकितयों पर जिस तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है उससे पूरी दुनिया में उनके प्रति बरते जाने वाले भेदभाव का खुलासा होता है। ग्रुप सदस्यों ने दुनिया के अस्सी देशों की सरकारों और विभिन्न संगठनों को उनके देशों में एच आई वी व्यक्तियों की स्थिति का पता लगाने के लिए चिट्टियाँ लिखी।

            मार्च-अप्रैल '94 में एक गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन की मदद से बम्बर्इ में 10 एडस रोगियों पर एक भारतीय मूल के अमेरिका निवासी डा. भैरव भट्टाचार्य द्वारा विकसित की गर्इ दवा का परीक्षण किया गया। यह परीक्षण एकदम अनैतिक और अवैध तरीके से किया गया था क्योंकि इसके लिए न तो भारतीय स्वास्थ्य मंत्राालय और न ही भारतीय ड्रग कंट्रोलर से अनुमति ली गर्इ थी। इस परीक्षण के बाद रोगियों को अमानवीय सिथति में छोड़ दिया गया। न तो उनकी लगातार मेडिकल जांच की गर्इ, न उनको अन्य चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करार्इ गर्इ। इसी तरह का वैक्सीन परीक्षण कलकत्ता के सोनागाछी रेडलार्इट एरिया की चार औरतों पर भी किया गया। और उनको भी किसी प्रकार की चिकित्सा सुविधाएँ मुहैय्या नहीं करवार्इ गर्इ।

            ए. बी. वी. ए. ने इस तरह के अनैतिक और अवैध तरीके से किए गए वैक्सीन परीक्षण का विरोध प्रकट करने के लिए 26 सितम्बर और 30 नवम्बर '95 को जन्तर-मन्तर और निर्माण भवन के बाहर धरना दिया और अखबारों के जरिए आम लोगों तक इस घटना के बारे में अपने नज़रिए से जानकारी पहुँचार्इ। अक्टूबर '94 के दौरान विभिन्न अखबारों में कलकत्ता के कर्इ बड़े अस्पतालों में डाक्टरों द्वारा एडस की बीमारी से पीडि़त 28 वर्षीय दीपक विश्वास की उपेक्षा करने, उसको उचित प्रकार से चिकित्सा सुविधा न देने का मामला सामने आया। अंतत: दीपक विश्वास की मृत्यु हो गर्इ। ए. बी. वी. ए. ने डाक्टरों द्वारा दीपक विश्वास की उपेक्षा करने के विरोध में जंतर-मंतर पर नवम्बर '94 में एक धरना किया और सरकार से इस केस की छानबीन करने और अपराधी डाक्टरों को सजा देने की माँग रखी।

 

इसी बीच दिल्ली में प्लेग जैसे संक्रामक रोग का आक्रमण हुआ। अखबारों में प्लेग के बारे में काफी दहशत फैला देने वाली खबरें प्रकाशित हुर्इ। ग्रुप सदस्यों ने दिल्ली के कर्इ झुग्गी बसितयों ने महसूस किया कि डाक्टरों ने भी लोगों को सही राय व इलाज न देकर उनकी उपेक्षा ही की है। जिससे लोगों में दहशत को और बढ़ावा मिला। 10.11.94 को ग्रुप सदस्यों ने नागरिक महामारी जाँच समिति के साथ मिलकर राष्ट्रीय संक्रामक रोग संस्थान के आगे धरना दिया और देशभर में प्लेग की चपेट में आए हर नागरिक को स्वास्थ्य की पूरी सुविधाएँ मुहैय्या कराने की माँग रखी। ग्रुप सदस्यों के बाद में राष्ट्रीय संक्रामक रोग संस्थान के डायरेक्टर के. के. दत्ता को चिट्टी भी लिखी जिसमें दिल्ली की कुछ झुग्गी बसितयों के सफार्इ की खस्ता हालत, और अस्पतालों में इस बीमारी से पीडि़त रोगियों के लिए सुविधाओं के अभाव की बात रखी टी.वी. रेडियो, अखबार जिस तरह से इस संवेदनशील मुद्दे को खुलेआम बताकर लोगों में दहशत फैला रहे थे इसकी तरफ भी सरकार का èयान दिया गया। इसके बाद ग्रुप ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के बाहर और जंतर-मंतर पर भी धरने रखें तथाअखबारों के ज़रिए अपनी संदेश जनता और सरकार तक पहुँचाया।

            '94-95 में तिहाड़ जेल भारतीय चिकित्सा संघ के सर्वे के ज़रिए ग्रुप को जेल के अंदर कैदियों की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों का पता चला। अखबारों में इसी बावत कुछ खबरें भी छप गर्इ। ए. बी. वी. ए. इस मुíे पर भी सक्रिय हुआ। ग्रुप के कुछ साथी जेल महानिरीक्षक  किरन बेदी से जाकर मिले। जेल में कैदियों के बीच में समलैंगिकता और एडस को एक-दो खबरें अखबारों में छपी थीं मगर किरन बेदी ने इस विषय पर कुछ भी टिप्पणी देने से इंकार कर दिया।

            इसी बीच ए. बी. वी. ए. ने दिल्ली हार्इकोर्ट में एक याचिका आर्इ. पी. सी. की धारा 377 को खारिज करने के लिए मार्च 1994 से दर्ज की हुर्इ है। ये सेक्शन पूरी तरह से समलैंगिकता का विरोध करता है और उसे एक अपराध मानता है। ए. बी. वी. ए. इस सेक्शन का पूरी तरह से विरोध करता है। यह केस कोर्ट में अभी तक फाइनल आर्ग्युमैन्ट के लिए लगा हुआ है।

            ग्रुप को इस बीच पता चला कि रैडक्रास की बम्बर्इ शाखा में पिछले दो सालों के दौरान करीबन दो हजार लोगों में ऐसे खून को चढ़ा दिया गया जो न तो ठीक तरीके से कभी जाँचा गया था और न ही सुरक्षित तरीके से रखा गया था। इस तरह के खून से कुछ लोग संक्रामक रोगों के शिकार हो गए तो कुछ भ्प्ट और एडस रोगी हो गए। ग्रुप ने रैडक्रास के इस अनैतिक कदम और उसके द्वारा रोगियों की घोर उपेक्षा के विरोध में जंतर-मंतर पर 26 दिसम्बर '95 को एक धरना रखा और बाद में नेशनल एडस कंट्रोल आरगनार्इजेशन (नेको) के निदेशक को मीमो और माँग पत्र दिया। इसी मीमो में उन्हें बम्बर्इ में अनैतिक और गैर कानूनी ढंग से 10 व्यकितयों पर किए गए एडस वैक्सीन परीक्षण की बात भी रखी तथा इंडियन हैल्थ आरगेनार्इजेशन के डा. आर्इ. एस. गिलाडा को सजा दिलाने की माँग भी रखी। इस धरने में ग्रुप के अलावा 18 अन्य संगठनों ने हिस्सा लिया। इसके बाद छ।ब्व् के निर्देशक डा. भटनागर से नौ साथी मिलने गए और उनसे उपरोक्त सिथति पर बातचीत की। ग्रुप सदस्यों को उनसे कोर्इ खास सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि वो इस मुद्दे पर जाँच करवा रहे हैं।

            बम्बर्इ में जिस तरह से 10 साथियों पर एडस वैक्सीन परीक्षण हुआ था ग्रुप उसके विरोध में लगातार अपनी आवाज़ जनता तक पहुँचाने की कोशिश अलग-अलग तरीकों से कर रहा था। बम्बर्इ के दस साथियों में से एक-दो के साथ हमारा संपर्क था जब हमें पता लगा कि दो साथी बम्बर्इ आ रहे है तो हमने इस अवसर का फायदा उठाया और 9 नवम्बर को दिल्ली प्रैस क्लब में प्रैस कान्फ्रैंस बुलार्इ। कान्फ्रैंस में बम्बर्इ के साथियों ने गोपनीयता का विश्वास लेकर अपनी बातें कहीं और एडस वैक्सीन परीक्षण की कुछ असली बातों को उजागर किया। कान्फ्रैंस में ही ग्रुप के एक साथी वकील राजेश तलवार ने इस तरह के परीक्षणों से जुड़े कानूनों पर भी प्रकाश डाला। 28 नवम्बर '95 को भारतीय संसद में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता श्री सैफुद्दीन चौधरी ने एडस वैक्सीन परीक्षण की अवैधता और अनैतिकता पर सवाल उठाया। जवाब में स्वास्थ्य राज्य मंत्री ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में कहा कि इस मामले में जाँच ड्रग कंट्रोल अथारिटी बंगाल और महाराष्ट्र में करेगी। ग्रुप के एक राजनीतिक कार्यकर्ता श्री नरेन्द्र तंवर के प्रयासों से ही संसद में किसी मंत्री द्वारा ऐसा सवाल उठवाना संभव हो सका।

            30 नवम्बर को विश्व स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर ग्रु्प ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर निर्माण भवन के आगे दो घंटे का मूक धरना दिया और बम्बर्इ में हुए ‘ब्लड स्केंडल वर्सेस एडस वैक्सीन ट्रायल’ संबंध में आवश्यक कानूनी कार्यवाही करने की सरकार से माँग की। इस आशय का एक मांगपत्र और मीमो तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंतुली जी को भेजा गया। अखबार के संवाददाताओं के समक्ष भी इस बाबत बयान दिए गए। दिसम्बर '95 के दूसरे सप्ताह में भारतीय विधि संस्थान ने दिल्ली में ‘इन्टरनेशन कान्फ्रेंस आन ला, हुमेनिटी एंड एडस’ आयोजित की। 9 दिसम्बर के खुले सत्रा में ग्रुप सदस्यों ने भाग लिया और अनेक महत्वपूर्ण सवाल उठाए। ग्रुप सदस्यों ने वहाँ उपसिथत लोगों के बीच ''बम्बर्इ एडस वैक्सीन परीक्षण की वास्तविक सिथति पर जानकारी देने तथा इस तरह के परीक्षण के विरोध में पर्चे बाँटा। इसी तरह ‘रिपील सेक्शन 377 आईपीसी’ शीर्षक से भी एक पर्चा बाँटा।

           

एडस भेदभाव विरोधी आन्दोलन

पोस्ट बाक्स न. 5308, दिल्ली-110053(भारत)

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