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Sunday 21 July 2013

अम्बेडकर का सपना

अम्बेडकर का सपना
 
मुकेश मानस
 

सपने देखना मनुष्य का प्राकृतिक स्वाभाव है। बंद आंखों से तो सभी सपना देखते हैं मगर बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं जो पूरी जाग्रतावस्था में या पूरे होशोहवास के साथ सपना देखते हैं। पूरे होशोहवास में सपना देखने वालों में बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जिनके सपने व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की बजाय संपूर्ण समाज की महत्वाकांक्षाओं से संबंधित होते हैं। विरले ही होते हैं वे लोग जो इन सपनों को महज सपना ही नहीं रहने देते हैं। वे इन सपनों को हकीकत में बदलने की पूरी कोशिश करते हैं। ऐसे लोग ही किसी भी देश या समाज के इतिहास और वर्तमान के सच्चे नायक होते हैं। अम्बेडकर भी ऐसे ही नायकों में से एक हैं।

 

 

अम्बेडकर को जानने की एक नई तरह

 

अम्बेडकर को एक ‘तरह’ से हम सब जानते हैं। लेकिन जिस ‘तरह’ से हम अम्बेडकर को जानते हैं वह वो अम्बेडकर है जो अम्बेडकर खुद नहीं थे। जैसे गौतम बुद्ध को जिस तरह हम जानते हैं वैसे गौतम खुद कभी नहीं थेईश्वर को न मानने वाले ईश्वर हो गए गौतम बुद्ध। अम्बेडकर को उनके मरने के बाद लगातार वैसा बनाया गया जैसे वो खुद कभी नहीं थे। आज भी अम्बेडकर को एक जाति, एक समुदाय के मसीहा के रूप में जाना जाता है। उस जाति, उस समुदाय ने तो बाकायदा अम्बेडकर की पूजा तक शुरू कर दी है। उनकी तस्वीरों और मूर्तियों की पूजा की जा रही है जबकि अपने आखिरी पड़ाव में अम्बेडकर इस पूजा प्रणाली के खिलाफ़ थे। कहा जाता है कि अगर किसी महान व्यक्ति का महत्व खत्म करना हो तो उसकी पूजा शुरु कर दो। अम्बेडकर एक विशेष जाति, समुदाय में जन्मे जरूर, उन्होंने अपने संघर्ष की शुरूआत भी उसी जाति और समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने से की मगर वो कभी भी वहीं तक सीमित नहीं रहे।

 

अम्बेडकर ने विश्व आलोड़न के ऐसे दौर में सोचना, समझना और सक्रिय होना शुरू किया जिसमें स्तालिन, माओ, हो ची मिन्ह आदि समाज और दुनिया को बदलने और उसे ज्यादा मानवीय, गरिमामयी, सांस्कृतिक और तर्कशील बनाने का मोर्चा  संभाले हुए थे या संभाल रहे थे। अम्बेडकर की शुरूआत काफ़ी मुश्किल और कठिन थी। मगर वो धीरे-धीरे अपने दौर के सभी चिंतकों और नेताओं से आगे निकल गए। अपने संघर्ष में मंदिर प्रवेश की माँग से वो पानी की माँग  तक पहुँचे। जाति उन्मूलन से सामाजिक बराबरी तक पहुँचे। असमानता और शोषण की बुनियाद पर टिके धर्म से समता, स्वतंत्रता और बधुत्व से परिपूर्ण धम्म तक पहुँचे। एक जाति समुदाय के विकास के लिए संघर्ष से अखिल भारत के चहुँमुखी विकास की अवधारणा तक पहुँचे। एक देश से पूरे विश्व के लिए समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व तक पहुँचे। शायद यही वो ‘तरह’ है जिस ‘तरह’ से हम लोग अम्बेडकर को कम जानते हैं।

 

राष्ट्रपिता अम्बेडकर

 

देश निर्माण का काम करने वाले महापुरुष को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है। देश निर्माण का काम दो स्तर पर किया जा सकता है-चिंतन के स्तर पर और क्रियान्वयन के स्तर पर। सपने सभी देखते हैं। मगर सपने देखना ही काफी नहीं है। देखे गए सपनों को अपने ज्ञान और कार्यकुशलता के बल पर क्रियान्वित करना भी जरूरी है। आज़ाद भारत कैसा हो जब मैं ये सोचता हूँ तो तीन महापुरुष मुझे याद आते हैं। भगत सिंह, महात्मा गांधी और अम्बेडकर। भगत सिंह ने पूर्ण आज़ादी का सपना देखा और उसका खाका खींचा। देश और देशवासियों को यही उनका मह्त्वपूर्ण योगदान है कि उन्होंने वास्तविक आज़ादी का सपना दिखाया। मगर वो उसकी क्रियान्विति में कुछ योगदान कर पाने से पहले ही शहीद हो गये और युवा मन की अद्वितीय शक्ति की मिसाल छोड़ गए। महान राजनीतिज्ञ हो सकने वाले गांधी महात्मा हो गए। मगर अम्बेडकर ने जो सपना देखा। अपने जीवन के आखिरी क्षण तक उसको क्रियान्वित करने में लगे रहे। उन्होंने समस्त जनता के हक में राष्ट्र निर्माण और प्रबंधन की वो मिसाल छोड़ी है कि वो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। वो अमीर, विलासी, भ्रष्ट, अमानवीय और शोषणकारी ‘इंडिया’ के लिए नही बल्कि गरीब, शोषित और वंचित भारत के निर्माण के कुशल प्रबंधक साबित हुए। इस मायने में अगर भारत का राष्ट्र पिता कहलाने का आज किसी को ह्क है तो वो सिर्फ़ और सिर्फ़ अम्बेडकर को ही है।

 

अपने समूचे जीवन में बाबा साहब अम्बेडकर ने कई ऐसे सपने देखे जो दरअसल इस देश की बहुसंख्यक आबादी के सपने थे। वे इस देश के दलितों, शोषतों, बच्चों, युवाओं, कामगारों, महिलाओं की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने वाले सपने थे। वे इस भारत देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास से जुड़े सपने थे। यह दीगर बात है कि उन्होंने इ सपनों को हकीकत में बदलने के लिए अपने जीवन के आखिरी क्षण तक बहुत प्रयास किए। कहना चाहिए कि उन्होंने इन सपनों को पूरा करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। आज हम कह सकते हैं कि उन्होंने दरअसल एक ही सपना देखा था-इस देश के शोषित और दलित समाज की संपूर्ण मुक्ति का सपना और वो जीवन भर इसी सपने को साकार करने की कोशिश में लगे रहे।

 

संविधान का निर्माण

 

जो लोग संविधान निर्माण तक ही अम्बेडकर के विचारों और उनके कामों की इति मानते हैं वो लोग अम्बेडकर को सीमित करने के दोषी हैं। ऐसे लोग अम्बेडकर के संबंध में एक समझी-बूझी तंगनज़री के शिकार हैं। दलित समाज के भीतर भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है। अम्बेडकर और उनके विचारों की र्जा को संविधान के वृत्त के भीतर कैद नहीं किया जा सकता। संविधान का निर्माण अम्बेडकर के विचारों और सोच का एक पड़ाव मात्र है।

 

भारतीय संविधान का पहला प्रारूप एक मायने में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा अपने मतलब के लिए बनाए गए गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, १९३५ की नकल में अपनी जरूरतों के हिसाब से किया गया संशोधन भर ही था। दूसरे, संविधान निर्माण समिति में भेजे गए ज्यादातर सदस्य तत्कालीन राजे-रजवाड़ों के प्रतिनिधि ही थे जिनका उद्देश्य अपने-अपने मतलब पूरा करने वाला संविधान बनाना ही था। इसके बावजूद अम्बेडकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने न तो संविधान को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, १९३५ की नकल भर रहने दिया और न ही उसे राजे-रजवाड़ों के प्रतिनिधियों के उद्देश्यों को पूरा करने वाला माध्यम ही बनने दिया।

 

उन्होंने दिन-रात एक करके, संविधान सभा के तमाम सदस्यों से बहस चलाते हुए भारत के संविधान को भारत की जनता का संविधान बना दिया। भारत की आज़ादी की लड़ाई में किए गये भारत की जनता के योगदान के लिए भारत की जनता को अम्बेडकर की तरफ से तोहफा था यह संविधान।

 

आज भारतीय संविधान भारत गणराज्य के क्रियान्वयन का बुनियादी आधार है। भारतीय राज्य अगर आज किसी हद तक लोकतांत्रिक और आधुनिक दिखाई पड़ता है तो वह अम्बेडकर के संविधान सभा में किए गए सतत् वैचारिक संघर्ष और उनके व्यापक दृष्टिकोण का ही प्रतिफल है जो उनकी देख-रेख में बनाए गए संविधान में क्रियान्वित हुआ है। लेकिन फिर भी संविधान वैसा नहीं बन पाया जैसा अम्बेडकर चाहते थे। इसीलिए वह इस संविधान से खुश नहीं थे।

 

आखिर अम्बेडकर आज़ाद भारत के लिए कैसा संविधान चाहते थे? और वो कौन-सी ऐसी बातें थीं जिन्हें संविधान में देखना चाहते थे जो या तो आधी-अधूरी ही आ पाईं, या सही स्थान पर नहीं आ पाईं या जो संविधान में आ ही नहीं पाईं । आखिर अम्बेडकर कैसा आज़ाद भारत देखना चाहते थे? इसके लिए अम्बेडकर की कुछ रचनाओं जाति-उन्मूलन’, ‘राज्य और अल्पसंख्यक’, ‘हिन्दू कोड बिलआदि को पढ़ा जाना चाहिए और उन्हें एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। इसके अलावा संविधान के प्रारूप पर होने वाली बहसों और उन पर अम्बेडकर की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन भी किया जाना चाहिए। इन सब चीजों में ही उपरोक्त सवालों के जवाब छुपे पड़े हैं। इन्हीं सब जवाबों में छुपी हैं - अम्बेडकर और उनके विचारों की व्यापकता और प्रासंगिकता।

 

शिक्षा, रोज़गार और आरक्षण

 

बाबासाहब चाहते थे कि इस देश के हर बच्चे को एक समान, अनिवार्य और मुफ्त आरम्भिक शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग का क्यों न हो। शुरू से ही अम्बेडकर मानते थे कि किसी भी देश अथवा समुदाय की वास्तविक प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि उसके सभी नागरिक शिक्षित हों। उनका मानना था कि शिक्षा ही वो एकमात्र ताकत है जो सभी बेड़ियों को काट सकती है। उन्हें शिक्षा पर इतना विश्वास था कि उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध नारे ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित रहो  में शिक्षा को प्रथम स्थान दिया था।

 

संविधान में वह शिक्षा को मौलिक  अधिकार बनवाना चाहते थे। इस संबंध में उनका प्रस्ताव यह था कि देश के 6 से 14 साल के समस्त बच्चों को ‘मुफ़्त, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण अनिवार्य आरंभिक शिक्षा’ प्रदान करना राष्ट्र का अनिवार्य कर्तव्य हो। लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। शिक्षा के मामले को संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में डाल दिया गया। नतीजा आज सबके सामने है।

 

आरंभ में शिक्षा के काम में कांग्रेसी सरकारों ने थोड़ी बहुत दिलचस्पी दिखाई भी मगर बाद की सरकारें इस काम से अपना हाथ खींचने लगीं। प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत आज किसी से छुपी नहीं है। आज शिक्षा एक ऐसी रेल बन गई है जिसमें केवल सुविधासंपन्न परिवारों के बच्चे ही बैठ सकते हैं। अमीरों के बच्चों के लिए तो बड़े-बड़े पब्लिक स्कूल हैं मगर गरीबों के बच्चे कहां जाएं? देश के आधे से ज्यादा बच्चों को आज भी स्कूल नसीब नहीं होता है। जिनको नसीब होता है उनमें से ज्यादातर ऊपर की कक्षाओं  तक पहुंचते-पहुंचते स्कूलों से बाहर ठेल दिए जाते हैं। नतीजतन हम चार-पांच करोड़ से भी ज्यादा बच्चों को बाल-मजदूरी की अंतहीन गुफा में अभिशप्त पाते हैं।

 

इस देश की आधी से ज्यादा आबादी अभी भी बेरोजगारी या अर्ध-बेरोजगारी के चक्रव्यूह में फंसी है। यह आबादी लगातार बदहाली, गरीबी और भुखमरी की रेखा पर अमानवीय और असांस्कृतिक जीवन जीने को अभिशप्त है। इस आबादी की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही अम्बेडकर ने रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की वकालत की थी। उनके तमाम लेखों और रचनाओं में यह चिंता बारंबार दिखाई पड़ती है।

 

रोजगार के अधिकार को संविधान में मौलिक अधिकार न बनने दिया जाना तत्कालीन सत्तासीन वर्ग की समझी बूझी साजिश थी। नतीजा आज हमारे सामने है। आज देश में 18 करोड़ से भी ज्यादा लोग बेरोजगारी या अर्ध-बेरोगारी की मार झेल रहे हैं। देश की बहुतायत आबादी अभी भी जीवन यापन की निम्नतम जरूरतों से जूझ रही हैं।

 

बाबा साहब ने दलित वर्ग के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिए जाने की वकालत की थी ताकि भारतीय समाज में अन्य वर्गों की तरह उन्हें भी प्रगति के बराबर मौके मिल सकें। अगर शिक्षा, रोजगार और आवास को मौलिक अधिकार बना दिया जाता तो उन्हें आरक्षण की वकालत करने की शायद जरूरत ही न पड़ती। ये भी तय बात है कि अगर दलितों को आरक्षण का सुरक्षा कवच न मिलता तो इनकी हालत आज और भी बदतर होती। फिर भी कुछ अपवादों को छोड़कर आरक्षण संपूर्ण दलित समाज की संपूर्ण प्रगति का सुरक्षा कवच बन पाने में नाकामयाब ही रहा है

 

आरक्षण का शुरू से ही ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी ताकतों द्वारा लगातार विरोध किया जाता रहा है। सत्ता और प्रशासन में इन्हीं वर्गों का वर्चस्व रहा है। इसलिए इन्होंने आरक्षण को कभी भी सही ढंग से क्रियान्वित होने ही नहीं दिया। लगातार ऐसी नीतियां लाई गईं जिनकी मूल प्रकृति आरक्षण विरोधी ही थी। वर्तमान सरकारें नई आर्थिक नीति, उदारीकरण, व्यवसायीकरण (निजीकरण) का पुरजोर समर्थन कर रही हैं। नई आर्थिक नीतियों के तहत सरकारी नौकरियां लगातार कम की जा रही हैं। सारे सार्वजनिक उद्योग बीमार घोषित करके बंद किए जा रहे हैं या फिर से पूंजीपतियों के हाथों में सौंपे जा रहे हैं। ऐसे हालात में आरक्षण का सुरक्षा कवच लगातार बेमानी होता जा रहा है।

स्त्री अधिकार और हिन्दू कोड बिल

 

भारतीय इतिहास में अम्बेडकर ही एकमात्र पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इस देश की स्त्रियों की वस्तुगत स्थिति और उनके शोषण के आधारों को इस तरह से समझा जिस तरह से किसी ने नहीं समझा था। यह भारतीय समाज के उनके गहन अध्ययन और उनकी पैनी नज़र का ही नतीजा था कि उन्होंने स्त्री समस्या और स्त्री-पुरुष संबंधों की असमानता के मूल कारण को खोज निकाला। उन्होंने माना कि इस देश की स्त्रियों की समस्या का मूल कारण है-ज्ञान और संपत्ति पर स्त्रियों का कोई अधिकार न होना। मनुस्मृति के दौर से ही भारतीय स्त्री को ज्ञान और संपत्ति के अधिकार से वंचित करके एक बेगार गुलाम की स्थिति में पहुंचा दिया जाता था। उन्होंने लगातार स्त्री शिक्षा की वकालत की और उसके शिक्षित होने को देश के आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण माना।

 

महिलाओं में अधिकार चेतना जगाने और उनका सशक्तिकरण करने के लिहाज से अम्बेडकर ने महिलाओं के कई सामाजिक और शैक्षिक संगठनों की स्थापना की। भारत के इतिहास में अम्बेडकर ने ही पहली बार महिला कामगारों के प्रसूति अवकाश का मामला उठाया। उनका मानना था कि महिलाओं को प्रसूति अवकाश देना और पूरा वेतन प्रदान करना राष्ट्रीय हित में उठाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।    

आधुनिक भारत में स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार तो मिला मगर संपत्ति के अधिकार से उन्हें फिर भी वंचित रखा गया। अम्बेडकर इस बात को अच्छी तरह से समझ गए थे कि स्त्रियों का संपत्तिविहीन होना ही उनके साथ होने वाले असमान व्यवहार और शोषण का कारण है। उनका मानना था कि जब तक स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार नहीं मिलेगा तब तक उनकी स्थिति में कोई खास बदलाव आने वाला नहीं है। इसलिए उन्होंने हिंदू कोड बिलमें स्त्रियों को ‘सीधे और बराबर अधिकार’(equal and direct right) देने की वकालत करके इस मामले में एक ऐतिहासिक पहलकदमी की थी। उन्होंने लड़कियों के दत्तक अधिकार का मसला भी हिन्दू कोड बिल में उठाया है। इसके अलावा उन्होंने हिन्दू कोड बिल में स्त्रियों के लिए विवाह की आज़ादी, तलाक भरण-पोषण के अधिकारों की वकालत की थी। और सब नागरिकों के लिए इन सब मामलों को एक तरह से क्रियान्वित किए जाने के संबंध में उन्होंने एक समान कोड की प्रस्तावना भी की थी।

कहने की जरूरत नहीं कि भारत में वास्तविक नारीवाद की नींव अम्बेडकर ने ही डाली थी। स्त्री विकास से जुड़े अनेक मामलों के अलावा हिन्दू कोड बिल में महिला आरक्षण की भी वकालत की गई थी। भारतीय इतिहास में हिन्दू कोड बिल ही एक मात्र ऐसा बिल है जो आजादी प्राप्त होने के बाद से आज तक अपनी समग्रता में नहीं बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पास होता आया है। हिन्दू कोड बिल से स्त्रियों को समान संपत्ति अधिकार दिए जाने के मामले को दरकिनार किए जाने पर ही उन्होंने तत्कालीन नेहरू केबिनेट के विधि मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका यह कदम दर्शाता है कि वह इस मामले में कितने गंभीर थे। मगर खेद की बात है कि हमारा नारीवादी आंदोलन यूरोप के नारीवादियों में या मार्क्सवाद में तो  अपना आधार देखता है मगर अम्बेडकर की अनदेखी करता है।

 
 

जाति उन्मूलन और विकास

 

अम्बेडकर ने जातिप्रथा को केवल दलितों की ही नहीं, पूरे भारतीय समाज के विकास की सबसे बड़ी और गहरी समस्या के रूप में रेखांकित किया था। जाति प्रथा संबंधी अपने गहन अध्ययन में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज के आर्थिक और सामाजिक विकास के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है। इसकी वजह से देश की बहुत बड़ी आबादी के श्रम का देश की आर्थिक क्रियाओं में इस्तेमाल ही नहीं हो पाता है। अम्बेडकर का मानना था कि जाति का स्वभाव विघटनकारी है। इस वज़ह से यह भारतीय समाज को एक इकाई नहीं बनने देती। यह समाज को विभिन्न घटकों में तोड़ कर बिखरा देती है। उनका मानना था कि जाति केवल दलितों को ही नहीं, गैर-दलितों को भी तोड़ती है। जाति आधारित भेद-भाव के कारण ही दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है और इस अमानवीय व्यवहार की पूरी प्रक्रिया में गैर-दलितों का भी अमानवीयकरण होता गया है। इसलिए जाति की इस घृणित प्रथा से दलितों को ही नहीं, गैर-दलितों को भी मुक्त होना है।

 

अम्बेडकर बार-बार इस बात पर बल देते थे कि जाति का खात्मा किए बिना भारतीय समाज का भला होने वाला नहीं है। वह मानते थे कि भारतीय समाज में हर प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषमता का प्रथम बुनियादी कारण जाति प्रथा ही है। इसलिए इसे नेस्तनाबूद किए बिना यहां किसी प्रकार की वास्तविक समानता, विकास और बदलाव की बात करना बेबुनियाद है। जातिप्रथा के खात्मे के संबंध में उन्होंने बहुत से उपाय सुझाए थे-मसलन, अंतर-जातीय विवाह, अंतरजातीय-भोज और हिंदू धर्म से मुक्ति। वह मानते थे कि जाति प्रथा के खात्मे के बाद ही वह वास्तविक भारतीय समाज  अस्तित्व में आ सकेगा जो समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व की भावना पर आधारित होगा।

 

श्रमिक अधिकारों के रक्षक

 

अम्बेडकर के इस पहलू को हमारे भारतीय इतिहासकार और मजदूरों के समर्थक लोग न जाने क्यों दरकिनार करते आये हैं जबकी मज़दूर वर्ग के लिए की गई उनकी कई पहलकदमियां भारत के मजदूर आंदोलन के लिए बेमिसाल हैं। विदेश से अपनी पढ़ाई करके आने के बाद उन्होंने अपने काम की शुरुआत मजदूरों के लिए काम करने से की। अम्बेडकर ने 1936 में ‘इंडिपेन्डेंट लेबर पार्टी’ की स्थापना की। इस पार्टी का उदघोषणा पत्र  मजदूरों, किसानों, दलितों और निम्न मध्य वर्ग के अधिकारों की हिमायत करने वाला घोषणापत्र है।

 

अम्बेडकर का मानना था कि भारत में मजदूर वर्ग में दलित एक बड़ी तादात में शामिल हैं। इस वजह से मजदूरों के बीच भेद-भाव की खाई मौजूद है। मजदूर वर्ग के संघर्ष और जाति के खात्मे के संबंध में जाति आधारित भारतीय समाज की संरचना के बारे में उन्होंने कहा था कि वर्ण व्यवस्था केवल श्रम का ही विभाजन नहीं है यह श्रमिकों का भी विभाजन है। उनका मानना था कि दलितों को भी मजदूर वर्ग के रूप में एकत्रित होना चाहिए। मगर ये एकता मजदूरों के बीच मौजूद जाति की खाई को मिटा कर ही हो सकती है। जाति और वर्ग के सामंजस्य के सम्बन्ध में बाबा साहब की यह सोच बेहद क्रांतिकारी है क्योंकि यह भारतीय समाज की सामाजिक संरचना की सही और वास्तविक समझ की ओर ले जाने वाली कोशिश है।

 

अम्बेडकर का मानना था कि भारत में मजदूरों के दो बड़े दुशमन हैं-पहला ब्राह्मणवाद और दूसरा पूंजीवाद। ब्रह्मणवाद से उनका तात्पर्य स्वतंत्रता, समता और भाईचारे  की भावना को नकारने वाली विचारधारा से है। इस अर्थ में यह अकेले ब्राह्मणों तक ही सीमित नहीं है अपितु यह सर्वव्यापी और सभी वर्गों मैं मौजूद है हालांकि ब्राह्मण ही इसके जनक हैं। उनके अनुसार यदि मजदूर एक होना चाहते हैं और पूंजीवाद को मिटाना चाहते हैं तो पहले उन्हें ब्राह्मणवाद को मिटाना होगा।

 

बाबा साहब ट्रेड यूनियन के घनघोर समर्थक थे। उनकी राय में भारत में ट्रेड यूनियन की सबसे ज्यादा जरूरत है मगर वे मानते थे कि भारत का ट्रेड यूनियन अपना मुख्य उद्देश्य खो चुका है। उनका मानना था की जब तक ट्रेड यूनियनवाद सरकार पर कब्जा करने को अपना लक्ष्य नहीं बनाता तब तक ट्रेड यूनियनें बहुत ही कम मज़दूरों का भला कर पाएंगी और ट्रेड यूनियन नेताओं की लगातार झगड़ेबाजी का अड्डा बनी रहेंगी।

 

अम्बेडकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मजदूरों के हड़ताल करने के अधिकार को स्वतंत्रता का अधिकार  माना और कहा कि मजदूरों को हड़ताल का अधिकार न देने का अर्थ है मजदूरों से उनकी इच्छा के विरुद्ध काम लेना और उन्हें गुलाम बना देना। 1938 में जब बम्बई प्रांत की कांग्रेसी सरकार मजदूरों के हड़ताल के अधिकार के विरूद्ध ट्रेड डिस्प्यूट बिल पास करना चाह रही थी तब बाबा साहेब ने खुलकर इसका विरोध किया। 1942 में तत्कालीन वायसराय ने अम्बेडकर को अपनी कार्यकारिणी के लिए नियुक्त किया और उन्हें श्रम विभाग का कार्य सौंपा गया।

 

अम्बेडकर ने 1946 में श्रम सदस्य की हैसियत से केंन्द्रीय असेम्बली में न्यूनतम मजदूरी निर्धारण सम्बन्धी एक बिल पेश किया जो 1948 में जाकर ‘न्यूनतम मजदूरी कानून’ बना। उन्होंने ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट में सशोधन करके सभी यूनियनों को मान्यता देने की आवश्यक्ता पर जोर दिया। 1946 में उन्होंने लेबर ब्यूरो की स्थापना भी की।

 

बहुत ही कम लोग इस बात को जानते हैं कि अम्बेडकर भारत में सफाई कामगारों के संगठित आंदोलन के जनक थे। उन्होंने बम्बई और दिल्ली में सफाई कर्मचारियों के कई संगठन स्थापित किए। बम्बई म्युनिसिपल कामगार यूनियन की स्थापना अम्बेडकर ने ही की थी जिसे बाद में जार्ज फर्नांडिस ने चलाया।

 

अम्बेडकर नए भारत के निर्माण में मजदूरों की महती भूमिका को स्वीकार करते थे। उनका मानना था कि भारत को स्वराज्य मिल जाना ही काफी नहीं है बल्कि यह स्वराज्य शोषितों, मजदूरों और पिछड़ों को मिलना चाहिए। इसके लिए मजदूरों को अपनी भूमिका निभानी होगी।  

 

 
 

निजी धर्म और धर्म की निजता की वकालत

 

भारतीय समाज एक धर्म ग्रसित समाज है। राजनीति, अर्थतंत्र, समाज व्यवस्था, संस्कृति जैसी बहुत सी बातों के लिए यहाँ धर्म ही आधार रहा है। और आज भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। भारत में जाति, लेंगिक शोषण और साम्प्रदायिक दंगे ऐसी चीजें हैं जो इस धर्म की ही देन हैं।

 

धर्म व्यक्ति का परिष्कार करता है और यह उसका निजी मामला है। लेकिन सदियों से धर्म व्यक्तियों, सामुदायों, जातियों और वर्गों के स्वार्थों का आधार बनता रहा है। अम्बेडकर ने धर्म के इसी रूप की लगातार आलोचना की। उनका मानना था कि धर्म को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का आधार बनना चाहिए। धर्म ऐसा होना चाहिए जो मनुष्य और समाज का परिष्कार करे, जो समाज को मानवीय और गरिमामयी बनाए, जो समाज के विभिन्न घटकों को जोड़े, तोड़े नहीं। केवल इसी मायने में कोई धर्म कल्याणकारी हो सकता है। इस दृष्टि से उन्होंने हिन्दू धर्म का विश्लेषण किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि हिन्दू धर्म से मुक्ति पाये बिना भारतीय समाज से जात-पात को खत्म नहीं किया जा सकता है क्योंकि हिन्दू धर्म अपनी बुनियादी प्रकृति में ही असमानता और शोषण को बढ़ावा देने वाला है।

 

जाति व्यवस्था के खिलाफ़ अपनी बहुस्तरीय लड़ाई में अम्बेडकर लगातार एक ऐसे धर्म की खोज में लगे रहे जो सिद्धांत और व्यवहार दोंनो रूपों में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देने वाला हो और अपने संपूर्ण रूप में मानवीय हो। उन्होंने अपने समय के सभी प्रचलित धर्मों का बहुत गहराई से अध्ययन किया। अंतत: बुद्ध धम्म पर जाकर उनकी तलाश समाप्त। उन्होंने बुद्ध धम्म में वो सब कुछ पाया जिसकी किसी धर्म में उन्हें तलाश थी। बुद्ध धम्म संबंधी अपने अध्ययन से वह इस नतीजे पर पहुँचे कि सिर्फ़ बुद्ध धम्म ही दलित और भारतीय समाज का सांस्कृतिक उत्थान कर सकता है। 

 

 

भारत के समग्र आर्थिक विकास का आधार : राजकीय समाजवाद

 

अम्बेडकर के सपनों में सबसे हसीन सपना था-समतामूलक समाज का सपना, एक शोषण मुक्त समाज का सपना। दरअसल, आज उनका यही सपना सबसे ज्यादा प्रासंगिक है और इसी के कारण खुद अम्बेडकर भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक है। जीवन भर उन्होंने जो कुछ भी सोचा और किया, उसका एकमात्र उद्देश्य उनका यही सपना है। उनके समूचे जीवन और चिंतन के केंन्द्र में दरअसल यही सपना है। एक जातिविहीन, वर्गविहीन, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, लैंगिक और सांस्कृतिक विषमताओं से मुक्त समाज। यही अम्बेडकर की सोच और संघर्ष का सार है।

 

अपने जीवन के आखिरी दौर में अपनी समूची सोच और संघर्ष के निचोड़ के रूप में अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जब तक आर्थिक विषमता का खात्मा नहीं होगा, शेष सभी विषमताएं ज्यों की त्यों बनी रहेगी। स्वतंत्रता-संग्राम के दौर में उन्होंने कहा था कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भूलकर उनमें सामाजिक बराबरी और भ्रातृत्व को स्थान दिया जाएगा। लेकिन उन्हें इस बात का पूरा अहसास हो चला था कि जब तक अमीर-गरीब बने रहेंगे और दलित, गरीब और शोषित की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं की जाएगी तब तक समाज में आर्थिक विषमता बनी रहेगी और बिना आर्थिक विषमता को दूर किए किसी प्रकार की सामाजिक राजनीतिक समता की बात बेमानी रहेगी। संविधान के निर्माण और एक व्यक्ति, एक वोट के अधिकार को मान्यता मिल जाने के बाद उन्होंने कहा था कि भारत में राजनीतिक समानता की व्यवस्था तो हो गई है किंतु अभी सामाजिक और आर्थिक विषमताएं शेष हैं। बाद में यही विषमतायें खास तौर पर आर्थिक विषमता उनके संघर्ष के केंद्र में आ गई थी।

 

दरअसल, आर्थिक विषमता और उसके उन्मूलन के बारे में उन्होंने बहुत पहले से ही सोचना शुरू कर दिया था। भारतीय समाज से आर्थिक विषमता के समाधान के लिए उन्होंने राजकीय समाजवाद की लगातार वकालत की। उनके हिसाब से आज़ाद भारत में राजकीय समाजवाद की स्थापना से ही आर्थिक और अन्य सभी विषमताओं का समाधान किया जा सकता है। अपनी किताब राज्य और अल्पसंख्यकमें उन्होंने राजकीय समाजवाद की विशद व्याख्या की है। संविधान में इसे शामिल करने के लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की है। आज़ाद भारत में भी वह लगातार इसकी आवश्यकता पर बल देते रहे।  

 

आज भारत का आर्थिक विकास कैसा है? असमान, विषमताओं को बढ़ाने वाला, अमीरी-गरीबी की खाई को चौड़ा करने वाला। दूरदर्शी अम्बेडकर ने यह पहले ही देख लिया था कि आज़ाद भारत के विकास का रास्ता यही होने वाला है। इसलिए उन्होंने शुरू से ही इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया था। हालांकि भूमि सुधार कार्यक्रम आजकल मार्क्सवादी पार्टियों के कार्यक्रम का मुख्य अजेंडा है लेकिन अम्बेडकर सही मायने में भूमि सुधार कार्यक्रम की परिकल्पना पेश करने वाले और उसकी अनिवार्यता पर बल देने वाले पहले व्यक्ति हैं। खेती के बारे में उनका कहना था कि खेती सारी ग्रामीण आबादी के विकास का मुख्य आधार है। इसलिए उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कृषि को राष्ट्रीय उद्योग का दर्जा दिया जाए और भूमि का नागरिकों के बीच समान वितरण किया जाए ताकि न कोई जमींदार रहे, न काश्तकार और भूमिहीन श्रमिक। उनका कहना था कि सामूहिक खेती की शुरुआत करके जातिगत भेद-भाव और अमीरी-गरीबी की खाई को पाटा जा सकता है। अम्बेडकर ने पहली बार उद्योगों और सेवाओं के राष्ट्रीयकरण का कार्यक्रम पेश किया। उनका कहना था कि प्रमुख उद्योगों पर राज्य का स्वामित्व होना चाहिए ताकि मेहनतकश तबके को पूंजीपतियों के शोषण से बचाया जा सके और उन्हें एक बेहतर जीवन जीने के बराबर मौके  मिल सकें। इसी संदर्भ में उन्होंने पब्लिक सेक्टर की स्थापना का सुझाव भी दिया। उनका कहना था कि पब्लिक सेक्टर शहरी आबादी के लिए रोजगार के समान अवसर मुहैया करायेगा।

 

आज बहुत कम लोग यह जानते हैं कि रिज़र्व बैंक की परिकल्पना और स्थापना में अम्बेडकर का कितना बड़ा योगदान है। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने निजी बैंकों की भूमिका को संदेह की नज़र से देखा और निजी बैंकों के सरकारीकरण की मांग उठाई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसानों, खेतिहर मजदूरों और आम जनता को साहूकारों और कर्ज़ के चंगुल से बचाने के लिए सरकारी बैंक खोले जाएं। उन्होंने सभी बैंकों की सभी तरह की व्यवसायिक गतिविधियों पर ‘चेक’ रखने के लिए  रिज़र्व बैंक की स्थापना का ठोस सुझाव दिया।

  

राजकीय समाजवाद की स्थापना के सवाल पर वह दलित संघर्ष को व्यापक संघर्ष से जोड़ देते हैं। वह राजकीय समाजवाद को भारत में समाजवाद लाने का एक पड़ाव मात्र मानते थे। लेकिन राजकीय समाजवाद स्थापित करने की रणनीति के सवाल पर वह अपने समकालीन वामपंथियों से भिन्न सोचते थे। वह राजकीय समाजवाद स्थापित करने के लिए किसी प्रकार की हिंसक कार्यवाही को अनिवार्य नहीं मानते थे। उनका मानना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मिले अधिकारों का प्रयोग करके राज्य के चरित्र को बदला जा सकता था। वह मानते थे कि राजकीय समाजवाद की स्थापना विधान मंडल की इच्छा पर निर्भर नहीं करेगी। राजकीय समाजवाद की स्थापना संवैधानिक विधि द्वारा होगी और इस प्रकार उसे विधायिका और कार्यपालिका के किसी कृत्य से बदला नहीं जा सकेगा। किंतु बाद में वह मानने लगे कि इसके लिए दलितों और शोषित जनता के व्यापक संघर्ष की कार्यवाही भी आवश्यक है जिसके परिणामस्वरूप ही सच्ची जनतांत्रिक व्यवस्था कायम की जा सकती है जो राजकीय समाजवाद के लिए आवश्यक आधार है।

 

 
रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया

 

समतामूलक समाज की स्थापना के लिए सत्ता प्राप्त करने के ख्याल से और दलित-मुक्ति संघर्ष को व्यापक संघर्ष बनाने के लिहाज से उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडियाबनाई। हालांकि वह इससे पहले भी कई संगठन और पार्टी बना चुके थे मगर अपने जीवन के आखिरी वर्षों में स्थापित की गई यह पार्टी उनके जीवन के समस्त अनुभव और वैचारिक परिपक्वता का प्रतिफल है। इस पार्टी का पहला उदघोषणा पत्र राजकीय समाजवाद की बात करता है और ऐसे समाज की स्थापना को अपना लक्ष्य बनाता है जो पूरी तरह से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचार और व्यवहार पर आधारित होगा। कहना न होगा कि इस पार्टी का यह कार्यक्रम पूरी तरह से भारतीय समाज की वस्तुगत परिस्थितियों के अनुरूप समाजवादी समाज बनाने का कार्यक्रम है।

 

‘रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडियाकी स्थापना के बाद वह ज्यादा देर तक न जी सके और उनका सपना अधूरा ही रह गया। बाबा साहब की मृत्यु के बाद इस पार्टी का जो हश्र हुआ, वह जगज़ाहिर है। उनके बाद के नेता और उनकी बहुरंगी पार्टियां उनके सपने को ही भुला बैठे।

 

व्यापक अम्बेडकर

 

इन सारी बातों पर विचार-विमर्श के बाद हम अम्बेडकर के जिस रूप से रूबरू होते हैं वह एक व्यापक अम्बेडकर का रूप है। वह अम्बेडकर के उस रूप से काफी भिन्न है जिस रूप को हम मात्र दलितों के मसीहा और मुक्तिदाता के रूप में समझते आए हैं। तमाम तरह की संर्कीणताओं, पूर्वाग्रहों और तुच्छ स्वार्थों से ग्रस्त गैर-दलितों ने लगातार ऐसा ही प्रचार किया। दलित समाज में भी इसी तरह की मान्यता चलती चली आई है। भारत के इतिहास में भी अम्बेडकर को लगातार छला गया और उन्हें एक महज़ जातिवादी नेता, बुद्धिजीवी और समाज सुधारक के रूप में सीमित किया जाता रहा। लेकिन तमाम तरह की संर्कीणताओं और पूर्वाग्रहों का यह कोहरा अम्बेडकर के क्रांतिकारी व्यक्तित्व की उष्मा को ढँक पाने में नाकामयाब रहा है। भारतीय समाज में व्याप्त सभी तरह की विषमताओं को अम्बेडकर ने समझा। उनके ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आधारों को स्पष्ट किया और उनको मिटाने के लिए तमाम तरह के रचनात्मक उपाय सुझाए।

 

कुल मिलाकर अम्बेडकर की चिंता केवल दलितों की मुक्ति के सवाल तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस देश के बच्चों, नौजवानों, कामगारों और महिलाओं और उनके विकास के सवाल भी उनकी चिंता के केन्द्र में है। उनकी बाद की रचनाओं में हम केवल दलित-मुक्ति को ही नहीं बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की मुक्ति की चिंताओं को पाते हैं। इसके लिए उन्होंने एक ऐसी नई व्यवस्था का सपना देखा जिसमें पूरे राष्ट्र की मुक्ति हो सके। यही अम्बेडकर की व्यापकता और प्रासंगिकता का मुख्य आधार है। अम्बेडकर की यही व्यापकता और प्रासंगिकता साबित करती है कि अम्बेडकर ही भारतीय इतिहास के वास्तविक और अप्रतिम नायक हैं।

 

आज अम्बेडकर इस देश की संघर्षशील और परिवर्तनकामी जनता के हर महत्त्वपूर्ण सवाल पर प्रासंगिक हो रहे हैं। आज अम्बेडकर महज दलित-मुक्ति के ही आधार स्रोत नहीं रह गए हैं बल्कि वह इस देश की वास्तविक और सम्पूर्ण आज़ादी और विकास के लिए संघर्ष के प्रेरणा स्रोत भी बन गए हैं। अम्बेडकर एक ऐसा फूल है जो किसी विशेष जाति, समुदाय और देश की बगिया में खिला जरूर मगर आज उसकी खुशबू जाति, समुदाय, धर्म और देश की सीमाओं को पार कर गई है। ये हमारी खुशनसीबी है कि ये फूल हमारे देश में खिला। मगर आज उसकी खुशबू तीसरी दुनिया के बहुत से देशों के शोषितों-वंचितों के संघर्ष को महका रही है। आज वो तीसरी दुनिया के संघर्षों के प्रेरणा स्रोत भी बनते जा रहे हैं।

 

आज देश और समाज में दलितों, शोषितों और आम आदमी की जो हालत है वह अम्बेडकर के सपने को पूरा करने की मांग कर रही है। अगर शहीद भगत सिंह के विचारों को थोड़ा बदलकर कहें तो कहना होगा कि देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि वे अम्बेडकरवादी और साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाजवादी समाज का निर्माण करें।

 

इस किताब के  श्रमिक अधिकारों के रक्षक वाले हिस्से से संबंधित कुछ  सामग्री अशोक भारती के लेख ‘अम्बेडकर और मजदूर आंदोलन’ से ली गई है। विस्तृत अध्ययन के लिए उनका लेख देखे। इस लेख का एक सक्षिप्त रूप अपेक्षा के जनवरी-मार्च 2006 के अंक में प्रकाशित हो चुका है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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