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Sunday 21 July 2013

संजीव का ढ़ाबा : कैलाश चंद चौहान की कहानियां पढ़ने के बाद्………


मुकेश मानस

बड़ी अजीब बात है कि कैलाश चंद चौहन की कहानियां पढ़ते हुए ऐसा कहीं लगा ही नहीं कि ये किसी नए कहानिकार की कहानियां हैं। एक दो कहानियों को छोड़कर बाकी कहानियों का कहानीपन, उनका ग़ठन, उनमें निहित ट्रीटमेंट और ‘काम्पलेक्सिटीज’ यह सब बहुत ही शानदार रूप में यह साबित करता है कि कैलाश चंद चौहान नाम का यह शख्स एक बेहद मंझा हुआ, परिपक्व और अथाह संभावनाओं से भरा हुआ कहानीकार है।

कैलाश चंद चौहान की कहानियां पढ़ते हुए जिस बात ने मुझे फौरन अपनी गिरफ़्त में लिया वो है कैलाश की कहानियों की बुनावट का सहज और सरल ‘कहानीपन’। और ये कहानीपन कुछ ऐसा है कि कहानी पढ़ते हुए कहीं ऐसा नहीं लगता कि कहानीकार ने कहानी को ज्यादा खींचने की या उसे महीन बुनने की या उसे बनाने की कोशिश की है। बहुत सहज सरल ढ़ंग से लिखी गई ये कहानियां हमें बड़ी आसानी से अपनी से अपनी भीतरी दुनिया में ले जाती हैं। किसी कवि की शुरुआती  मानवीय संवेदना का सरल रूपांतरण सी लगती हैं ये कहानिया। मेरा मानना है कि एक अच्छी कविता वो होती है जो अपनी परिणति में  एक  विचार को जन्म देती है और एक अच्छी कहानी वो होती है जो अपने अंत मे एक भाव को पैदा करती है यानी वो हमें भावनत्मक स्तर पर पर प्रभावित करती है। हृदय का बदलना सबसे सशक्त परिवर्तन होता है। कैलाश चद चौहान की ज्यादातर कहानियां ऐसी ही है। वे हमें हृदय के स्तर पर ज्यादा प्रभावित करतीं हैं। कैलाश की कहनी हमें जितना विचार देती है उससे कहीं ज्यादा गहरे वो हमें भावनात्मक स्तर पर प्रभावित करती है जिसके बाद विचार और ज्यादा मजबूत हो जाता है।

सभी कहानियों को पढ़ लेने के बाद ये लगता है कि ये कहानियां विषय के स्तर पर बेहद एकांगी कहानियां है।घूम फिर कर सब की सब कहानियां एक ही धुरी पर लौट आती हैं । लगता है सारी कहानियां और उनके पात्र एक ही कमरे में चक्कर काट रहे हैं। ये धुरी और ये कमरा है दलित समाज और उसकी दुनिया।  मगर यही इन कहानियों की धार है, सान है और प्राण भी है।कैलाश चद चौहान की ये कहानियां एकल विषयी कहानियां जरूर हैं मगर इसमे कोई शक नही कि ये कहानियां एकांगी कहानियां नहीं हैं। इस कहानीकार के पास एक आंख है। मगर उस एक आंख में कितनी आंखें हैं। इन कहानियों का एक ही विषय है मगर वो यहाँ इतने रूपों, इतने आयामों और इतने अंदाजों  में है कि कहानीकर कैलाश चंद चौहान की ओब्ज़र्वेशन की गहराई और विविधता की अनगिनत शेड्स अपनी ‘यूनीकनेस’ का पता खुद ब खुद  दे देते हैं। और ये सारे ओबज़ेर्वेशन और उनका एक्स्प्रेशन भारतीय समाज और उसके भीतर दलित समाज और दलित समाज की ओब्जेक्टिब रीयलटीज़ का बेहद वास्तविक और मार्मिक यथार्थ हैं। भारतीय समाज में जाति की मानसिकता जिस तरह से, जितने रूपों में और जिस प्रकार अन्तर्निहित है वो जगज़ाहिर है। कैलाश ने सिर्फ़ इन वस्तुगत सच्च्चाईयों की विविधताओं का बेहद मार्मिक बयानगी भरकी है। ‘योर्कर बाल’ जाति चुपाकर रहने वालों की परीणति, ‘मेरा भी एक घर हो’ रात की रानी’ में दलितों में दलित स्त्री को मिलने वाला ट्रीटमेंट,  ‘बारिश की वो रात’, हाईवे पर संजीव का ढ़ाबा, भंगनिया, सफ़र की बात, भंगनिया, ‘बन्जर ज़मीन’आदि ऐसी कहानियां हैं जो भारतीय समाज की ब्राह्णावादी, जातिवादी और पितृसत्तावादी मानसिकता की हकीकतों को अलग-अलग ऐंगल से हमारे सामने लाती हैं । जातिके बिन्दुओं का अलग –अलग बिन्दुओं से आना हमारे अनुभव को गहराई और व्यापकता प्रदान करता है

कैलाश की कुछ कहानियां ऐसी है जो विषय के आधार पर आधुनिक बनते भारतीय समाज के जाति के अलावा अन्य अन्तर्विरोधों को बेहद तल्खी और गहराई के साथ लाते है……कम से कम दो कहानिया ऐसी हैं जो कैलाश चंद को तथाकथित मेन स्ट्रीम लेखकों की श्रेणी में ला खड़ा करती हैं ये कहानियां हैं ‘प्रेम की उमंग’ और ‘बुखार फिर चढ़ जाये’। प्रेम की उमंग स्त्री और प्रेम के अन्तरविरोध को दर्शाती छोटी सी कहानी है। मनुष्य के लिए सबसे बड़ा होता है प्रेम, सबसे बड़ीऔर गहरी उर्जा और परिवर्तन की शक्ति होता है प्रेम। शहरी मध्यवर्गीय सामाजिक-पारिवारिक परिस्तिथियों में बोर और एक रुटीन बन चुके स्त्री के जीवन में प्रेम का अहसास बसंत के एक झोके की तरह आता है जिससे जीवन महक उठता है। ये कहानी बताती है कि विकास के तमाम आख्यानों के वाबजूद स्त्री से नैतिकता और शुद्धता की मांग और उसका इतना ज्यादा है कि उसे उस प्रेम को जो उसके जीवन में बदलाव लेकर आअ रह है उसे स्वीकार भी नहीं कर सकती। एक और ऐसी ही कहानी है जिसकी चर्चा करने से मैं अपने आपको रोक नहीं सकता।वो कहानी है ‘फिर बुखार चढ़ जाए’। ज़बर्दस्त कहानी है पति-पत्नी दोनों के नौकरी पेशा होने के कारण बच्चे उनके प्यार से महरूम होते हैं। बीमार बच्चे को जब माता-पिता दोनों की अटेंशन और प्यार मिलता है तो वो सोचता है कि बुखार की वज़ह से ऐसा हुआ तो उसे बुखार फिर से चढ जाए। ये दोनों कहानियां कैलाश के पाठकों को एक वृहत्तर समाज में ले जाती हैं और कहानीकार को।

एक और बात है जिसने मुझे कहानीकार कैलाश का मुरीद बना दिया है…और वो है उनकी कहनियों में रिफलेक्ट होने वाला ट्रीटमेंट्। कैलाश की कहानियों में ट्रीटमेंट के ढ़ंग ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। कहीं-कहीं कुछ हल्का है लेकिन एक दो कहानियों में तो यह इतना गहरा और ज़बरदस्त है कि लगातार वाह-वाह करते रहने को मन करता है। केवल मंझे हुए कहानीकारों की कहानियों में ही ऐसा ट्रीटमेंट देखने को मिलता है। इस संग्रह की पहली ही कहानी ’योर्कर बाल’ इस दृष्टि से अद्वितीय है। बात वही है जो बाकी कहानियों में है लेकिन इस कहानी उसे जिस ढ़ंग से, जिस तरह से और जिस शैली में कहा गया है वह लाजवाब है। मेरा ख्याल है कि यह पहली कहानी है जिसमें इस तरह का ट्रीटमेंट देखने को मिला है।

और अंत में……मैं इस बेहद सवेदनशील और संभावनाशील कहानीकार कैलाश चंद चौहान का साहित्य की दुनिया में दिल खोलकर स्वागत करता हूँ।
मार्च,२०१२

 

 

 

 

 

 

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