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Sunday 21 July 2013

मूलनिवासी की अवधारणा और उसकी प्रासंगिकता*

मुकेश मानस

 

जय मूलनिवासी का नारा अपने आप में एक अदभुत नारा है। जब मै आप लोगों के साथ इस नारे को लगा रहा था तो मैं अपने भीतर एक आत्मविश्वास और सम्मान को बढ़ता हुआ महसूस कर रहा था। जय मूलनिवासी का नारा आत्मविश्वास और सम्मान का नारा है। इस नारे को लगाते हुए एक गौरव की अनुभूति होती है, एक साहस की अनुभूति होती है। इस नारे को लगाते हुए मुझे महसूस होता है कि मै किसी गौरवपूर्ण ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हूँ। यह नारा लगाते वक्त मैं उससे जुड़ाव की अनुभूति करता हूँ।

 

आज हम सब जानते है कि आर्यों के भारत में आने से पहले यहां एक विश्वस्तरीय मानवीय सभ्यता और संस्कृति मौजूद थी जिसे आर्यों ने नष्ट किया। वे नष्ट कर सके क्योंकि वे हिंसक थे। उनके पास तेज दौड़ने वाले घोड़े और दूर से मार करने वाले हथियार थे। और थी उनके पास एक सैन्य रणनीति। यहां के लोग एकदम शांति पसन्द  और कलाकार किस्म के लोग थे। जीवन को ज्यादा से ज्यादा मानवीय ढ़ंग से जी लेना उनके लिए मह्त्वपूर्ण था। यहां शोषण और हिंसा की संस्कृति नहीं थी जैसी आर्यों के यहां थी। आर्यों ने हमें जीत तो लिया लेकिन वे हमारे ज्ञान, हमारे कौशल से आतंकित थे। सबसे पहले यही उन्होंने हमसे छीना। छूआछूत और भेदभाव की नीति पुस्तक ‘मनुस्मृति’ बनाकर। वर्णों के लचीलेपन को समाप्त करके उसे कठोर बना दिया और तब अस्तित्व में आई भारत की आज तक की सबसे घृणित प्रथा-जाति प्रथा। इसके जरिये हमें गरीबी, असमानता और अवमानना का शिकार बनाया और हमको हजारों जातियों में बांटकर बिखरा दिया।

 

मूलनिवासी की भावना मुझे इसी बंटवारे का प्रतिकार लगती है। मूलनिवासी की धारणा में मुझे एकता की भावना दिखाई देती है। यह हमें एक बंधन में जोड़ देती है। इसी बंधन से मुझे ताकत महसूस होती है मेरी हिम्मत बढ़ती है। मुझमें शोषन और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करने की भावना आती है।

 

लेकिन क्या इस धारणा का विस्तार किया जा सकता है। मुझे लगता है कि किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए। हमारा मानना है कि धरती के इस हिस्से को हमीं ने आबाद किया है। हमीं ने इसका निर्माण किया हैअम इस धरती के इस हिस्से की भव्यता के उत्पादक हैं। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि यहां कुछ तबके और भी हैं । मैं आदिवासी और पिछ्ड़ों की बात नहीं कर रहा हूँ वे तो हम में शामिल हैं हीं। मैं इस देश के मजदूरों और किसानों की बात कर रहा हूँ। जो आज के समाज की बड़ी सच्चाई हैं। मैं उन किसानों और मजदूरों की बात कर रह हूँ जो जाति से दलित नहीं हैं।वे भी हमारी ही तरह उत्पादक और शोषित हैं। वे इस धरती के कमाऊ पूत हैं और कई मामलों में हमारे भाई और संगी हैं। क्या हम उन्हें भी इस धारणा में समाहित कर सकते हैं? सवाल का जवाब मैं आप पर छोड़ता हूँ।

 

इतिहास में अपना चेहरा खोजने की, अपनी पहचान खोजने की अपनी अस्मिता और परम्परा खोजने की कवायद है ये अवधारणा। हर शोषित समुदाय और जाति की पहली कवायद यही होती है। इअतिहास में खुद का पुनर्सृजन और पुनर्स्थापन्। यह एक सहज औए स्वाभाविक बात है। यह एक तरीके से नया इतिहास लिखना और पुराने का प्रतिकार करने जैसा है। लेकिन हम अतीत नहीं हैं और न ही अतीत की लड़ाई अतीत में जाकर लड़ी जा सकती है।

 

हम वर्तमान में खड़े हैं और हमें भविष्य में जाना है। हमें इतिहास में नहीं लौटना है। भविष्य हमारी मंजिल है। भविष्य में हमारी जगह क्या हो? ये हमें सुनिश्चित करना है। भविष्य में हमें खुद को खड़ा करना है और पूरे सम्मान, पूरी समृद्धि और पूरी मानवीयता के साथ खड़ा करना है। इस बारे में हमें सोचना है। सिर्फ़ सोचना ही नहीं है इस बारे में जितनी जल्दी हो सके कोई परियोजना बना लेनी चाहिए।  

 25/03/2007
*(मूलनिवासी विचार मंच, शाहजहां पुर में बोलने के लिए कुछ बिन्दु)

1 comment:

  1. आर्य जाती और आर्यों का आक्रमण दोनों ही कोरी कल्पना है जिसमे कोई सत्यता नहीं , ये अंग्रेजो द्वारा गढ़ा गया मिथक है जो उन्होंने अपना स्वार्थ साधने के लिए किया था| आज भी कुछ भारतीय इसी आर्य -द्रविण सिद्धांत के मिथक को जीवित रखना चाहते है ताकि उनका निजी स्वार्थ सिद्ध हो और भारत फिर से विभाजित हो सके |

    आर्य आक्रमण सिद्धांत की सबसे पहली कल्पना ये कहती है की सिन्धु घटी सभ्यता आर्यों से पहले की सभ्यता है आर्यों 1500 ईसा पूर्व उसे आक्रमण करके नष्ट कर दिया था परन्तु आर्यों के इस काल्पनिक आक्रमण के काल और सिन्धु घाटी सभ्यता (जो की वास्तव में सिन्धु सरस्वती सभ्यता है) के अंत के बीच में 250 वर्षों का अंतर है | इसके अतिरिक्त सिन्धु घाटी के अवशेषों में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं मिला है जो की ये सिद्ध करे की इसका अंत किसी आक्रमण के कारण हुआ था | वहां जो भी मानव अस्थि अवशेष मिले हैं वो सभ्यता के मध्य काल के हैं ना की अंत काल के इसके अतिरिक्त उन पर ऐसे कोई निशान नहीं जिससे पता लगे की उनकी हत्या हुई थी |
    इस सिद्धांत का दूसरा तथ्य ये कहता है की आर्य श्वेत वर्णी थे परन्तु क्या आप बता सकते हैं की आर्य श्रेष्ठ राम और कृष्ण काले क्यों थे?

    अगर वेदों के रचनाकार ऋषि श्वेत वर्णी होते तो कम से कम उनके अन्दर श्वेत वर्ण के प्रति आकर्षण तो होना चाहिए था परन्तु ऋग्वेद ११-३-९ में कहते हैं "त्वाष्ट्र के आशीर्वाद से हमारी संतान पिशंग अर्थात गेहूं के रंग के पीले भूरे हों "

    इसी तरह से एक तर्क ये भी है की आर्य मूर्ती पूजा के विरोधी थे और केवल यज्ञ करते थे जब की सिन्धु घाटी के निवासी केवल मूर्ती पूजा करते थे |परन्तु सिन्धु घटी के नगरों में भी यज्ञ शालाएं मिली हैं|

    भारतीय भाषाओ को आर्य-द्रविण के आधार पर विभाजित कर दिया गया है परन्तु संस्कृत , हिंदी,मराठी, तमिल भाषाओ का समावेश है|
    वेदों में सर्वत्र भारत भूमि का ही वर्णन आया है इससे ये सिद्ध होता है वेद भारत भूमि में ही रचे गए हैं परन्तु वेदों में कपास का वर्णन नहीं हैं जबकी इसका उपयोग सिन्धु घटी सभ्यता में होता था अतः यह स्वयं सिद्ध है की वेद सिन्धु घटी सभ्यता से अत्यंत प्राचीन हैं और इससे यह निष्कर्ष निकला जा सकता है की वेदों के रचनाकार ऋषि कथित आर्य आक्रमण से कहीं पूर्व में भारत में ही थे |

    वास्तव में आर्य कोई जाती समूह नहीं था और ना ही कोई नस्लीय समूह आर्य का वही अर्थ है जो की आज "सभ्य" शब्द का था और सिन्धु घटी सभ्यता वास्तव में आर्यों की ही सभ्यता थी और वेद भी उनकी ही कृति थे |आर्य ना तो घुमक्कड़ थे और ना ही आक्रान्ता आपितु वो कृषि कर्म करने वाले और भारत की भूमि के ही निवासी थे और आज भी उनके ही वंशज यहाँ रह रहे हैं , और आर्य -द्रविण सिद्धांत एक मिथक है जिसे अगर न रोका गया तो भारत एक बार फिर से विभाजन के द्वार पर खड़ा होगा|

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