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Sunday 21 July 2013

तिनका-तिनका आग: दलित मन की व्यापक संवेदनाएं

मुकेश मानस

 

 

हारते हैं वे

जो हारते हैं हिम्मत

 

एक लम्बी दुष्चक्रीय और यंत्राणापूर्ण ज़द्दोजहद को झेलने और उससे लगातार उबरने की जिजीविषा ही शायद वो चीज है जिसने सदियों से अभिशप्त दलितों को इस मुकाम तक पहुंचाया कि वे अपनी उपेक्षा, यंत्रणा और बहुआयामी शोषण के बुनियादी रहस्यों को समझ पाए। उनमें अपने शोषण के खिलाफ संगठित विरोध का साहस पैदा हुआ। पिछली सदी के आखिरी दो-तीन दशकों में उठी दलित चेतना ने दलित समाज में वो कूबत पैदा की कि समूची भारतीय संस्था के द्वारा किए जाने वाले अपने शोषण के विरोध में साहस की भावना उनका बुनियादी हथियार बन गई। विरोध के साहस की इस भावना को दलित समाज ने कई रूपों में अभिव्यक्त किया है। दलित साहित्य का ज्वार इन रूपों में एक महत्वपूर्ण रूप है। मगर विरोध की अभिव्यक्ति ही दलित साहित्य नहीं है। परंपरागत जीवन मूल्यों और व्यवहार के समांतर व्यापक जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति ही दलित साहित्य का मूलाधार है। जयप्रकाश कर्दम का समूचा जीवनानुभव और सृजनात्मक लेखन इस मायने में काफी महत्वपूर्ण है।

 

हिन्दी पटटी में दलित साहित्य को सामने लाने, उसको स्थापित करने और परंपरागत हिन्दी साहित्य के समांतर दलित साहित्य के बुनियादी सरोकारों को उजागर करने में जिन दलित साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान है उन दलित साहित्यकारों में डा. जयप्रकाश कर्दम एक जाना-पहचाना नाम है। वह दलित साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं और अपने व्यक्तित्व, सृजनकर्म के बूते अपने समकालीनों में काफी चर्चित और समादृत हैं। डा. जय प्रकाश कर्दम एक बहुआयामी प्रतिभावाले साहित्यकार और चिंतक हैं। कविता, कहानी और उपन्यास लिखने के अलावा दलित समाज की वस्तुगत सच्चाइयों को सामने लानेवाली अनेक निबंध व शोध पुस्तकों की रचना व संपादन भी उन्होंने किया है। उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान है- उनके संपादन में प्रतिवर्ष निकलने वाली दलित साहित्य वार्षिकी। उनके अथक प्रयासों के चलते दलित साहित्य वार्षिकी, दलित साहित्य में दलित सोच और सृजन का एक बुनियादी आधार बन गई है।

 

तिनका-तिनका आगडा. जय प्रकाश कर्दम का दूसरा कविता संग्रह है। काफी लंबे अंतराल के बाद उनका यह दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है। अपने पहले कविता संग्रह गूंगा नहीं था मैंके साथ उन्होंने दलित कविता के क्षेत्र में पदार्पण किया था। तिनका-तिनका आगकी कविताओं को पढ़ने के बाद पता चलता है कि इस दौरान इस कवि के काव्यगत रचनात्मक विवेक और सृजन कौशल क्षमता ने एक लंबा सफर तय किया है। पहले कविता संग्रह के बाद से न केवल उसकी सृजनात्मक क्षमता में परिपक्वता आई है बल्कि उसकी सोच का फलक भी और व्यापक व विस्तृत हुआ है। पहले कविता संग्रह में जहां कवि में हम शुरुआती द्वन्द्वों और आक्रोश को स्पष्ट स्वर न दे पाने की उसकी विवशता को महसूस करते हैं वहीं दूसरे कविता संग्रह में हम देखते हैं कि कवि का स्वर पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट, गंभीर और सृजनात्मक हुआ है। यह एक स्वाभाविक-सी बात है कि कवि जिस समाज से, समाज की जिन वस्तुगत सच्चाइयों से रूबरू होकर सामने आ रहा है उसकी कविता में उन्हीं वस्तुगत सच्चाइयों की अभिव्यक्ति देखने को मिलेगी। विकास की अनेकानेक ऊंचाइयों को छूने वाले समाज में दलित व्यक्ति और उसका समाज अभी विभिन्न मामलों में अपनी तल्ख सच्चाइयों के साथ निचले पायदान पर खड़ा है जहां उसका लहू सबसे सस्ता है।

 

ठाकुर के खेत से

सेठ की तिजोरी तक

मेरा ही लहू बहता है

वही सबसे सस्ता है।

 

भारतीय सामाजिक-आर्थिक संस्था में दलित व्यक्ति आज भी विभिन्न रूपों में सबसे ज्यादा शोषित, प्रताड़ित और अपमानित हैं। आधुनिकता के छलावेपूर्ण आइने में वह अभी भी सबसे ज्यादा उपेक्षित और प्रताड़ित महसूस करता है।

 

सूरज की गर्मी से

नहीं झुलसता मेरा शरीर

उसे झुलसाता हैं

यंत्रणाओं का सूरज

 

विकास, समानता और स्वतंत्राता का दंभ भरते भारत के बीच वह अभी भी उपेक्षित भारत है और यह उपेक्षा उसके चारों ओर अनेकानेक रूपों में साकार है। उसको और उसके शब्दों को गरीबी, जहालत अवमानना, पिछड़ापन जैसे गिद्धों ने घेर रखा है। ये गिद्धभारतीय संस्था के विभिन्न शोषणकारी रूपों का सबसे स्पष्ट रूपक हैं जो कर्दम की कविता में अनेकानेक अनुभूतियों, अनुभवों में प्रतिफलित और अभिव्यक्त होता है।

 

सावधान मेरे शब्दो

तुम्हारे चारों ओर गिद्धों का घेरा है

जो तुम्हें नोंचने को आतुर हैं।

 

समाज में प्रगतिवादी और आधुनिक मूल्यों के पैरोकार समूहों का हाल ये है कि मानवाधिकारों की जी-जान से लड़ाई लड़ने वाले इन योद्धाओं को उसके और उसके समाज के मानवीय अधिकारों के शोषण की पुकार सुनाई नहीं देती।

 

करोड़ों दलित वंचित हैं

सदियों से

बहुत सारे मानवाधिकारों से

 

दलित समाज में व्याप्त भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी के अलावा जाति का दंश उसकी समूची प्रगति और विकास में बाधक है। तमाम संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारतीय संस्था के सांस्कृतिक मूल्य और जीवन संस्कार दलित व्यक्ति के जाति आधारित शोषण को बरकरार रखे हुए हैं। विडम्बना ये है कि भारतीय चिंतन की गाड़ी जाति आधारित शोषण के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक रूप को समझने और उसे दुरूस्त करने के लिए किसी भी स्टेशन पर रुकने को तैयार नहीं है।

 

सदियों से वे हमसे

गाली की भाषा में बोलते आ रहे हैं

यह उनकी संस्कृति है।

 

हालत ये हो गई है कि दलित व्यक्ति भूख से ज्यादा जातिगत अपमान, उपेक्षा और सांस्कृतिक शोषण से अधिक आहत है। वह अभी भी यही महसूस करता है कि भूख के गणित से ज्यादा जाति का व्याकरण ज्यादा दुरूह और गंभीर है।

 

कितना विकट होता है

भूख के गणित से

जाति का व्याकरण

 

जाति के व्याकरण को समझने और उसे सुलझाने की राह में कवि को एक ही दृष्टि दिखाई पड़ती हैं और वह है मानवीय सद~भाव, प्रेम और समानता के व्यवहार की दृष्टि। वह समूचे समाज को प्रेम का रास्ता दिखाना और बताना चाहता है। यही उसकी अपनी और समूचे समाज की मुक्ति का रास्ता हैं। मगर इस प्रेम के रास्ते में एकमात्र बाधा-जाति का व्याकरण ही है।

 

प्रेम की कविता का

बेतुका बंद

मनुष्यता की कमीज पर

जाति का पैबन्द

 

प्रेम कविता लिखने के रास्ते में परम्परागत कलम और उससे जुड़ी सोच भी रोड़ा बनकर खड़ी हैं। कलम के परम्परागत रूप पर आख्यान लिखते समय कवि कलम के जरिए होनेवाले और हो रहे दलित शोषण के इतिहास और वर्तमान पर निगाह डालता है। यहीं से उसके संघर्ष और सृजनात्मक संघर्ष का रूप सामने आता है। और यह रूप उनकी लगभग सभी कविताओं में व्यापक परिवर्तन की इच्छा और संघर्ष को रूपायित करता है। कवि चाहता है कि

 

टूटे जड़ता, सन्नाटा और

हलचल हो उनमें भी

जो रहते आए हैं चुप

 

परिवर्तन की इच्छा को साकार करने के लिए कवि न सिर्फ अपने भीतर बल्कि अपने समाज की जड़ता में हलचल की कामना करता है। वह अपने ओर अपने समाज के भीतर के साहस के अभिव्यक्त होने का आहवान करता है।

 

मैं दरिया हूं।

राह बनाना आता है मुझे।

 

इस जड़ता को तोड़ने के लिए वह कोई भी खतरा उठाने को तैयार है। उसकी इसी निर्भीकता का पर्याय है-ब्राह्मणवादी मानसिकता और संस्कृति के गढ़ बनारस में जाने की उसकी इच्छा को अभिव्यक्ति देती मैं बनारस जाऊंगाकविता। बकौल मोहनदास नैमिशराय मैं बनारस जाऊंगाकविता में लगता है जैसे दलितों की पीड़ा उभर आई है। जहां आर्यों ने शंबूक और एकलव्य को छला वहीं बाबू जगजीवन राम भी हिंदुओं की जातिवादी राजनीति से बच नहीं पाए।

 

साम्प्रदायिकता की तेजी से बढ़ती विचारधारा और साम्प्रदायिक हिंसा भारतीय संस्था के लिए ही खतरा नहीं है बल्कि दलित समाज इस समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित है। साम्प्रदायिकता भारतीय समाज की ही नहीं समूचे दलित समाज के विकास का भी रोड़ा है। इस मायने में साम्प्रदायिकता का सवाल दलित चिंतन और सृजन का प्रमुख सवाल बन गया है। दलितों ने जातीय दंश से मुक्ति की राह में दूसरे धर्मों में जाने को बड़े पैमाने पर क्रियान्वित किया है। उसे जब जिस धर्म में अपनी मुक्ति का रास्ता दिखा, वह उसमें गया।बौद्ध धर्म, इसाई धर्म और इस्लाम इनमें मुख्य हैं। मगर विडम्बना ये है कि वहां भी वह दलित ही बना रहा। बौद्ध धर्म पर हिंदूवादी शक्तियों की हिंसा इतिहास में उजागर हो चुकी है। ईसाई और इस्लाम के मानने वालों पर पिछले कुछ दशकों में साम्प्रदायिक हिंसा खुलकर सामने आई है। खास तौर पर झज्जर में मारे गए पांच दलितों के मामले से यह बात और खुलकर सामने आई है जिसमें पांच दलितों को मुसलमान कहकर मार दिया गया। यह डा. कर्दम की व्यापक सोच का ही नतीजा है कि वह साम्प्रदायिकता की समस्या को जाति की समस्या से जोड़कर देखते हैं।

 

गोधरा से झज्जर तक

देश सांप्रदायिकता की आग में

जल रहा है

जातिवाद की भटटी में

भुन रहा है।

 

साम्प्रदायिकता की समस्या के साथ ही कवि आधी दुनिया के शोषण और उसकी पीड़ा को व्यापक संदभों में समझता और अभिव्यक्त करता है। वह दलितों में भी दलित भारतीय स्त्री की पीड़ा को स्वर देता है जो भारतीय समाज में आज भी विभिन्न रूपों में शोषित और प्रताड़ित होती है। आधी दुनिया की आवाजइसी अभिव्यक्ति की एक सशक्त रचना है।

 

डा. जय प्रकाश कर्दम के इस नए कविता संग्रह तिनका-तिनका आगकी कविताएं सदियों से चले आ रहे अन्याय के प्रति दलितों के मन में सुलगती आग और परिवर्तन की गूंज की सशक्त अभिव्यक्तियां हैं। ये कविताएं दलित समाज की पीड़ाओं और उससे जुड़ी समाज की व्यापक समस्याओं की मुखर अनुभूतियां हैं। ये कविताएं, बकौल रमणिका गुप्ता, स्पष्ट और सरल भाषा में बतियाती हैं, संवाद करती हैं और जरूरत पड़ने पर तर्क करने के लिए उठ खड़ी होती हैं। ये छदम वक्तव्यों और कुतर्कों को काटती हैं और मांग करती हैं अपनी अभिव्यक्ति के लिए उसी भाषा की जो जन से जुड़ी है।

 

मेरे दोस्त

मेरे लिए उस भाषा में

मंगल कामना मत करो

जो भाषा

कभी मेरी नहीं रही

जिसके लिए रहा मैं सदैव

अंत्यज, अस्पृश्य

 

कुल मिलाकर ये कविताएं दलित आंदोलन को एक दिशा देती हैं और भविष्य में उठने वाले बवंडर का अहसास कराती हैं। ये कविताएं उसके गहन जीवनानुभवों और व्यापक दृष्टिकोण की पर्याय हैं। ये अलग बात है कि कवि में कुछेक बातों को लेकर जो द्वन्द्व अभी बना हुआ है उसकी भी पहचान कराती हैं। मसलन कवि एक तरपफ अपनी मुक्ति के लिए अप्प दीपो भवका संदेश देता है, परिवर्तन के लिए संघर्ष का आह~वान करता है और ईश्वर तक के रूप को नकारते हुए अम्बेडकर को भगवान बनाने वालों की आलोचना करता है वहीं गौतम का आहवान भी एक बार फिर आओकविता में मानवेतर शक्ति के आहवान के रूप में करता है।

 

अंत में हम कवि जय प्रकाश कर्दम को उनके दूसरे कविता संग्रह के लिए बधाई देते हैं क्योंकि इस संग्रह में दलित चेतना और सृजन के ज्यादा परिपक्व रूप को अभिव्यक्ति मिली है। इस संग्रह की अधिकांश कविताओं की दिशा मनोरंजन करने की नहीं है बल्कि संवेदना जगाने और मानसिकता बदलने की है।

2004, कापीराइट सुरक्षित

 

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