Total Pageviews

Sunday 21 July 2013

मेरी कहानियाँ : मेरे विचार


मुकेश मानस


उन्नीस सौ चौरासी पर चर्चा के समय दिया गया वक्तव्य
 

यह सुनने में अजीब लग सकता है कि लेखन की शुरुआत मैंने निबन्ध लेखन से की। लगभग दस बारह व्यंग्य निबन्ध मैंने उस समय लिखे जब मैं आठवीं कक्षा का छात्र था। मुझे अच्छी तरह याद है एक निबन्ध मैंने लालकिले के पीछे हर इतवार को लगने वाले चोर बाज़ार पर लिखा था जिसमें में आम तौर पर पर हिन्दी की पुस्तकें खरीदने जाया करत था जो वहां बेहद सस्ती मिल जाया करतीं थीं। कभी-कभी कप।दे और दूसरी चीजें भी खरीदता था। दूसरा निबन्ध मैंने दिल्ली की डीटीसी बसों के बारे में लिखा था। तीसरा निबंध मैंने सड़कों पर बनने वाले मंदिरों पर लिखा था। बाकी निबन्धों के बारे में मुझे याद नहीं। ये सारे निबन्ध एक कापी में संकलित थे। इनके बाद कुछ गीत लिखे और कुछ मुक्त छंद की कवितायें। बाद में एक दो छोटे-छोटे उपन्यास भी लिखे। आज वे कहां हैं मुझे पता नहीं। हर साल किराये का मकान बदलना पड़ता था। उसी दौरान मेरी कई कापियां खो गईं। उन्हीं के साथ खो गयी ये चीजें भीं।

पहले लगता था कि निबन्ध लिखना ज्यादा आसान है। फिर कविता लिखना आसान लगने लगा और फिर उपन्यास लिखना भी। लेकिन आज लगता है कि सब कुछ लिखना मुश्किल है। अन्धेरा इतना ज्या बढ़ गया है, निराशा इतनी ज्यादा है, समस्यायें इतनी ज्यादा हैं……लेखक की मुश्किलें भी इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि कुछ भी लिखना बहुत मुश्किल हो गया है।

बचपन से ही कहानियां और उपन्यास पढ़ने का शौक इतना ज्यादा था कि मैंने खुद कब कहानियां लिखना शुरु कर दिया पता ही नहीं चला। एक बार एम ए की कक्षा में उस समय के मेरे प्रिय शिक्षक और उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली  ने एक बार कहा था कि कहानियां बुनी जाती हैं। कहानियां कविताओं की तरह नहीं बनतीं वे बुनी जाती हैं। आज तक मैं इस बात का कायल हूँ…दरअसल कहानी ‘बनाने’ की कला है। आज मैं अपने विद्यार्थियों को भी यही बात सिखाता हूँ कि वे चाहें तो कहानी लिख सकते हैं…बल्कि हर व्यक्ति खुद एक जीती जागती कहानी है। कोहली साहब ने एक बात और कही थी कि कहानीकार में गधे का सा अपार धैर्य होना चाहिए। कहानीकार को लगातार अपनी कहानियों पर काम करते रहना चाहिए। आज मैं इस बात से भी मुअमइन हूँ।

कहानी बुनने की कला में ही कहानीकार छुपा हुआ है। वह कहानी को किस तरह से बुनता है, इसी बुनाई कला में उसकी योग्यता, उसकी दृष्टि, उसके विवेक और उसके भाषा कौशल की परीक्ष होती है।इस मायने में कहूँगा कि मैंने लगातार इस कहानी बुनाई की इस कला को लगातार सीखा है और उसमें लगातार सुधार करने की कोशिश की है।बल्कि मैं कहूँगा कि मैंने और मेरी कहानी कला ने लगातार एक हमसफ़र की तरह विकास किया है। इद मायने में कहानी को और कहानी ने मुझे लिखा है।

मैं यहां यह भी कहना चाहूँगा कि इस संकलन की तमाम कहानियां मेरे जीवनानुभव और मेरे दृष्टि विकास की कहानियां हैं। इन कहानियों के विषय लगातार बदलते रहे हैं पर इन सभी कहानियों से मैं जुड़ा हुआ हूँ, मेरा अनुभव जुड़ा हुआ है। इस पर अनेक छायाओं का असर है। बहुत सारे प्रभावों की छायाएं इन कहानियों पर देखी जा सकती हैं पर फिर भी सब कहानियों में मेरा अनुभव ही अभिव्यक्त होता आया है। लगभग एक खेल, एक शौक की पूर्ति भर करने के प्रभाव में कहानी लेखन की शुरुआत करके मैं आज यहां तक पहुँचा हूँ। पर आज इस खेल को,इस हौक को पूरा करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है मेरे लिए………धीरे धीरे एक पूरा मरुस्थल आ गया है, एक पूरा का पूरा शहर, एक पूरी की पूरी व्यवस्था, एक पूरी की पूरी पाषाणी सभ्यता आ गयी है मेरे और कहानी के बीच्। रोमानी, काल्पनिक और छोटे-छोटे यथार्थों की भूमि से चलकर जटिल और भयावह सच्चाईयों के एक उत्तुंग शिखर के सामने आकर खड़ा हो गया हूँ मैं।व्यक्तिगत अनुभव अब इतने जतिल हो गए हैं कि उनको सरल ढ़ंग से अभिव्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है। आज की मेरी ज़द्दोज़हद भी यही है। इसी मायने में कहानी लिखना बहुत मुशिक्ल हो गया है…………और एक दलित लेखक के रुप में तो और भी मुश्किल।

अपनी कहानियों के कथ्य को मैंने कभी किसी दायरे में सीमित नहीं होने दिया है बल्कि उनको आज़ाद बनाये रखना मेरे लिए काफी बड़ी चुनौती की तरह रहा है। मैंने खुद को कथ्य के सिर पर कभी हावी होने नहीं दिया है और न कथ्य को अपने सिर पर। आज शायद इसीलिए इन कहानियों के कथ्य में इतनी विविधतता है।पर मैं कहना चाहूँगा कि मेरी इन कहानियों के सच में मेरी जीवनानुभूतियां सहज रुप में मिलती चली गयी हैं। मैंने बस अपने तमाम अनुभवोंको, वस्तुअगत सच्चाईयों को कहानियों मेम कलात्मक ढ़ंग से बुनने की, सही ढ़ंग से बुनने की कोशिश की है।इस मायने में इन कहानियों में आने वाला यह जीवनानुभव किसी सीमित मायने में दलित जीवनानुभव नहीं है। हां ये बात जरुर है कि इन कहानियों में मैंने खुद को, अपनी अस्मिता को, अपने समाज को, उसकी वस्तुगत सच्चाईयों को लगातार खोजने और अभिव्यक्त करने की कोशिश की है।इस मायने में ये कहानियां दलित रचनाकार के लगातार विकसित होने वाले रचनात्मक कौशल और विवेक की परिणतियां हैं। अगर कोई इन्हें इस मायने में दलित कहानियां मानता है तो मैं उसका स्वागत करता हूँ।     

मैं यहां कहना चाहूँगा कि अब समय आ गया है कि दलित लेखक सिर्फ़ अपने समाज की मुक्ति के ही बारे में ना सोचे बल्कि पूरे समाज के शोषितों और वंचितों की मुक्ति के बारे में सोचे। अब समय आ गया है कि वह अपने रचना क्षेत्र की परिधि को विस्तार दे। मुक्ति कभी अकेले में नहीं मिलती, मुक्ति  सबके साथ मिलती है। अकेली मुक्ति के कोई मायने नहीं।इस मायने में दलित अभिव्यक्ति को व्यापक फलक प्रदान करने की जरुरत मुझे लगातार महसूस होती है।

एक बात की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। बात यही है कि मुझे लगत है कि दलित लेखक को अपनी कहानियों को केवल दलित समस्या पर ही केन्द्रित नहीं रखना चाहिए। एक दलित लेखक की रचनाशीलता के व्यापक फलक को प्रोत्साहित करना चाहिए। वर्ना वो दिन दूर नहीं जब एक ही तरह की दलित कहानियां सामने आएंगी और हमारी रचनाशीलता का दायरा सीमित हो जायेगा।

और मैं अंत में कहूँगा कि ये दलित कहानीकार कोई रुकी हुई घड़ी नहीं है। उसी तरह से मैं भी कोई ठहरा हुआ कहानीकार नहीं हूँ। मेरी यात्रा की ये घड़ी लगातार चलती रहेगी, ऐसा मुझे विश्वास है। मैंने अभी शुरुआत भर की है। मैं लगातार अपनी कहानी कला, अपनी आवाज़ को ढ़ूंढ रहा हूँ………देखिए ये यात्रा कहां समाप्त होती है।

आपने मुझे सुना, मेरी कहानियों पर चर्चा की मुझे और मेरी कहानियों को इतना स्पेस दिया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

मार्च, 2004

No comments:

Post a Comment