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Sunday 21 July 2013

भक्ति नहीं क्रांति के अग्रदूत थे रैदास



मुकेश मानस

 

कंवल भारती हिन्दी के दलित साहित्यकारों में एक जाना-पहचाना नाम है। उनका कविता संग्रह तब तुम्हारी निष्ठा क्या होगीउन्हें कवि के रूप में  प्रतिष्ठित कर चुका है। उनकी अब तक १३ पुस्तकें आ चुकी हैं। जो कि गंभीर विवेचन दृष्टि तथा दलित चिंतन व आंदोलन को व्यापक दृष्टिकोण व दिशा देने वाली पुस्तकें हैं।  कंवल भारती हिन्दी के दलित साहित्य चिंतकों में व्यापक दृष्टिकोण वाले आलोचक-समालोचक है। एक प्रखर दलित पत्रकार के रूप में वे सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक के रूप में भी जाने जाते हैं।

 

सन्त रैदास : एक विश्लेषणपहले पहल एक लघु पुस्तक के रूप में १९८५ में प्रकाशित हुई थी। यह संस्करण उसी का एक संशोधित और नवीन संस्करण है। इस संस्करण में लेखक ने दलित संतों पर लिखे अपने कुछ अन्य स्वतंत्र लेखों को भी इसमें शामिल किया है। ये लेख इस संस्करण में परिशिष्ट के रूप में रखे गए हैं, मगर वास्तव में वे स्वतंत्र लेख नहीं हैं बल्कि संत रैदास पर लिखे विविध लेखों का ही एक तरह से विस्तार है। पहले इस किताब का इतना नोटिसनहीं लिया गया था, मगर आज दलित आंदोलन के तेजी से विस्तार होने के कारण इस पुस्तक की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई है।

 

पिछले कुछ सालों से दलित साहित्यकारों के बीच भक्तिकालीन दलित संत कवियों को लेकर जो ऊहा-पोह की स्थिति बनी हुई थी अब उसको तोड़ने का काम शुरू हुआ है। डॉ. धर्मवीर की कबीर पर इनमें उन्होंने दलित आंदोलन और चिंतन की दृष्टि से कबीर का पुनर्मूल्यांकन करने की और उससे दलित आंदोलन का प्रेरणा सूत्र जोड़ने की जरूरत को रेखांकित किया है। किन्तु कंवल भारती की पुस्तक कई मायनों में डॉ. धर्मवीर की कबीर पर लिखी गई पुस्तकों से भिन्न है। यहां उन फर्कों की बात करना उचित नहीं होगा और न ही प्रासंगिक।

 

"रैदास हमें स्थिति बदलने के लिए ईश्वर पर छोड़ देते हैं"गोरखपुर में प्रेमचंद और दलित साहित्यपर आयोजित गोष्ठी में डॉ. श्योराज सिंह का यह कथन साफ करता है कि रैदास पर अभी हमारी स्पष्टता नहीं बनी है। मेरा खयाल तो यह है कि रैदास तो क्या किसी भी दलित सन्त पर स्पष्टता नहीं बनी है। इसमें कुसूर डॉ. श्योराज सिंह बेचैंन का भी नहीं है। दरअसल, अपने आपको खुलकर खालिस चमार कहने वाले दलित सन्त कवि रैदास के व्यक्तित्व, उनके काव्य की क्रांति चेतना और परिवर्तनवादी चिंतन को ब्राह्मणवादी आलोचकों ने इतना धुंधला कर दिया है कि रैदास ईश्वरवादी, वेदान्ती और रामानन्द के शिष्य व हिन्दूवादी ब्राह्मणवादी मानसिकता के समर्थक भर बनकर रह गए हैं। कंवल भारती मानते हैं कि तथाकथित ब्राह्मणवादी आलोचकों ने यह काम एक बड़ी साजिश के तहत किया है। उनका क्रांतिधर्मी रूप बड़ी चालाकी से छुपा दिया गया है। वे काफी निरीह और विनम्र ईश्वर भक्त पर बनकर रह गए हैं और अन्य सन्त कवियों में अलग से नजर नहीं आते।

 

रैदास हिन्दी की भक्तिकालीन निर्गुणवादी काव्य परम्परा के दलित कवि हैं। सन्तमत के प्रादुर्भाव और उसके लक्ष्य के बारे में तथाकथित ब्राह्मणवादी आलोचकों ने काफी भ्रम फैलाए हैं। कंवल भारती ने इस किताब में निर्गुणवादी काव्यधारा के संत कवियों के बारे में एक नई स्थापना की है। वह मानते हैं कि सन्तों में सभी साधुओं को शामिल नहीं किया जा सकता है। सन्तों के अन्तर्गत केवल वही आते हैं, जो परम्परागत ज्ञान के विरुद्ध विवेकप्रधान, शील, सम्पन्न, सत्मोपासव्य और असत्य के विरूद्ध या मानवता के हितार्थ विद्रोही एवं सामाजिक परिवर्तन के समर्थक हैं। दरअसल, ऐसे सन्त दलित ही हैं जिनको इसाई, वैष्णव और इस्लाम से प्रेरणा नहीं मिल रही थी बल्कि उनके समूचे दर्शन और चिंतन का प्रेरणास्रोत बौद्ध धर्म है। उनके काव्य का सारा चिंतन और आधार बौद्ध दर्शन पर टिका हुआ है। वास्तव में यह आधार ही वह आधार है, जो ब्राह्मणवादी आलोचना के जंजालों को काटता है और इन दलित कवियों को नए आलोक में देखने की दृष्टि प्रदान करता है।

 

बौद्ध धर्म ने दो महान क्रांतियां की। एक तो उसने ईश्वर और आत्मा जैसी किसी भी नित्य और शाश्वत सत्ता के अस्तित्व का खंडन किया और दूसरे उसने जनाश्रित वर्णभेद के बौद्ध खिलाफ़ विहारों के, संघों के व्यावहारिक रूप के जरिए समता की स्थापना की। इससे ब्राह्मणवाद के अस्तित्व को वास्तविक खतरा उत्पन्न हुआ और वह क्षीण होने लगा। सामंतवादी समाज भी बौद्ध दर्शन को बरदाश्त नहीं कर पा रहा था और किसी न किसी तरह इसके व्यावहारिक और क्रांतिकारी प्रतिरूपों को नष्ट करना चाहता था। कारण एकदम साफ था। बौद्ध धर्म का प्रभाव निम्न बहुजन शोषित वर्ग पर पड़ रहा था, जो बुद्ध धर्म के क्रांतिकारी दर्शन से प्रेरणा ग्रहण करने लगा था। जल्दी ही सामन्तवादी-ब्राह्मणवादी शक्तियों ने बौद्ध विहारों, मठों और पुस्तकालयों आदि को ध्वस्त कर दिया। इस पूरे दौर में लाखों बौद्धों को कत्ल किया गया। कुछ बौद्ध भिक्षु जान-बचाकर विदेश भाग गए। अधिकार सुदूर ग्रामों में जाकर साधारण जीवन बिताने लगे। उन्होंने वहां की दलित जातियों में बौद्ध दर्शन का प्रचार-प्रसार जारी रखा। कालांतर में इन्हीं प्रछन्न बौद्ध भिक्षुओं की प्रेरणास्वरूप अनेक प्रभावशाली दलित सन्तों का उदय हुआ। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि जातिगत संकीर्णता और कठोरता के चलते अनेकों घरबारी सन्तों की एक लम्बी फौज भक्तिकाल में दिखाई पड़ती है। यह लम्बी फौज दरअसल बौद्ध दर्शन से प्रेरित दलित सन्त कवियों की है। जातिगत संकीर्णता को तोड़ने वाला रूप दलित सन्त कवियों का केवल एक रूप है। अगर इन दलित सन्त कवियों के पास यह सपना भी था कि समाज कैसा होना चाहिए? और कहना न होगा कि इस सपने का पूरा का पूरा आधार बौद्ध दर्शन का है जिससे हमारे तथाकथित ब्राह्मणवादी आलोचक बड़ी चालाकी से बच निकलते हैं। वे दलित सन्त कवियों की क्रांतिधर्मिता की पृष्ठभूमि में बौद्ध दर्शन के क्रांतिकारी आधार को ही अनदेखा कर जाते हैं। दलित सन्तकवियों की काव्य-धर्मिता और उनकी सोच की बुनियाद में बौद्ध दर्शन को खोज निकालना ही कंवल भारती की इस किताब का एक महत्वपूर्ण योगदान है।

 

इन्हीं सन्तों ने पन्द्रहवीं सदी में साहित्य में निर्गुणवाद की क्रांतिकारी काव्यधारा प्रवाहित की। इसी क्रांतिकारी निर्गुणवादी के काव्यधारा के अनन्य कवि संत रैदास हैं। संत रैदास ने कर्मकांड, मूर्ति-पूजा, वेद पूजा, जातिगत भेद-भाव आदि पर करारी चोट की है। संत रैदास न तो स्वयं ईश्वरवादी थे और न उनकी भक्ति किसी ईश्वर के लिए थी। उन्होंने ईश्वर को कर्मकाण्डों, सामंती मूल्य-मान्यताओं, ब्राãणवादी वेदों की सीमाओं को पार बताया है। जो सबका हित साधक है, करूणामय और मुक्तिदाता है। उसे राम या हरि किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। उनका ईश्वर व्यक्तिवादी धारणा या अवतारवादी की धारणा से मुक्त है। उसके लिए पंडित-पुरोहितों या मुल्लाओं और मंदिर, मस्जिदों  की आवश्यकता नहीं है। दलित समुदाय धर्म और ईश्वर के नाम पर इन्हीं शोषकों के प्रपंचों का शिकार रहा है। इन प्रपंचों से मुक्ति के लिए दलित सन्तों ने ईश्वर की व्यक्तिवाची धारणा के विरूद्ध निर्गुणवाद का प्रचार किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा ऊपर नहीं है। वह तो हम सबमें मौजूद हैं। अपने अन्दर के परमात्मा को ही खोजने की जरूरत है। इसके लिए प्रार्थनाओं की नहीं, पूजा-अर्चना की नहीं बल्कि ध्यान की जरूरत है। इसके अतिरिक्त रैदास के काव्य में बौद्ध धर्म के पंचशीलका भी प्रतिफल देखने को मिलता है। इस प्रकार सन्त काव्य का वास्तविक आधार बौद्ध धर्म है। बौद्ध धर्म के पतन के बाद जो बुद्ध वचन परम्परा से जन-जीवन में संचित थे सन्तकाव्यों में उन्हीं की अभिव्यंजना हुई है। इस विश्लेषण से कहना न होगा कि निर्गुणवादी धारा के दलित सन्त कवियों का पूरा तेवर ही बदल जाता है।

 

ब्राह्मणवादी आलोचकों ने रैदास, कबीर आदि के बारे में यह भ्रम फैला रखा है कि वे रामानन्द के शिष्य थे। कंवल भारती ने अपने विद्धतापूर्ण तर्कों और गहन अध्ययन के आधार पर ऐसे भ्रमों को झूठ साबित किया है। रामानन्द शुद्ध वैष्णव थे और सगुणवादी भक्ति के सूत्रधार थे। सगुणवादी भक्ति में वेदों की मान्यता है, ईश्वर का अलौलिक और अवतारी रूप है और कहीं न कहीं जातिभेद को बनाए रखने की साजिश है। रैदास का व्यक्तित्व और कृतित्व एकदम इससे उलट है।

 

रैदास : एक विश्लेषणमें  रैदास का जो चरित्र उभरकर आता है वह एक क्रांतिकारी दलित सन्तकवि का व्यक्तित्व है और यह ऐसा व्यक्तित्व है जो आज के दलित आंदोलन का वास्तविक प्रेरणा स्रोत है और जिस पर कोई भी दलित गर्व कर सकता है। सन्त रैदास हमें हमारी समस्याओं से निपटने के लिए भगवान के हाथों पर नहीं छोड़ते बल्कि अपना दीपक स्वयं बनने की प्रेरणा देते हैं।

 

इस पुस्तक में कंवल भारती ने सन्तमत और सन्तकवियों पर अपने कुछ स्वतंत्र आलेखों को भी परिशिष्ट के रूप में रखा है। वर्णाश्रम व्यवस्था के लिए चुनौती के दलित सन्त’, ‘दलित सन्तों का कवि धर्म’, ‘दलित सन्तों का निर्गुणवाद’, ‘कबीर, रैदास, रामानन्द’, ‘भक्तकाव्य में सन्त रैदास’, ‘दलित सन्तों ने रखी थी नये सौंदर्य शास्त्र की आधार-शिला’, और दलित सन्तों की प्रासंगिकताआदि ऐसे ही लेख हैं। ये स्वतंत्र लेख इस पुस्तक को विस्तार तो देते ही हैं साथ ही सन्त मत की गहनता से छानबीन भी करते हैं। किन्तु बेहतर होगा कि ये स्वतंत्र लेख एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में आते या जो जरूरी होते जैसे कबीर, रैदास, रामानन्दजैसा लेख इस पुस्तक के विवेचन का ही हिस्सा लगता है। यह कबीर, रैदास और रामानन्द की तुलनात्मक  अध्ययन है। भक्तमाल में सन्त रैदासको सन्त रैदास जी की वाणी या सन्त रैदास जीवन वृतमें समाहित किया जा सकता था। सन्तमत, पृष्ठभूमि और स्वरूपमें परिशिष्ट का पहला स्वतंत्र लेख समाहित हो सकता था। इसी प्रकार सन्त रैदास की वाणी वाले लेख में दलित सन्तों का निर्गुणवाद और कविधर्म दोनों आ सकते थे इनके स्वतंत्र होने से यह दोहराव जैसा लगता है। इसके अलावा एक कमजोर पहलू इस पुस्तक का यह है कि इसमें प्रभावों के साक्ष्यों और पुस्तकों के संदर्भों  का अभाव है।

अभिमूकनायक, अप्रैल २००१ में प्रकाशित

 

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