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Sunday 21 July 2013

परमाणु बम परीक्षण से नहीं, विकास से मिलेगा सम्मान


मुकेश मानस

 

भारत में अर्द्ध-बेरोजगारों, अप्रत्यक्ष बेरोजगारों और पूर्ण बेरोजगारों की कुल संख्या 18 करोड़ से भी ज्यादा हो चली है। भारतीय युवा वर्ग की आधी से ज्यादा आबादी बेरोजगार है। आजाद भारत में पूंजीवादी रास्ते पर चलने वाले शासक वर्ग की भ्रष्ट कारगुजारियों की राह पर बेरोजगारी की यह अमर बेल बढ़ती चली आई है। आजकल यह काम सार्वजनिक उद्योगों को बीमार बताकर, या गैर-मुनाफे का सौदा घोषित करके या निजीकरण करके किया जा रहा है। नौकरियां इतनी कम की जा रही हैं कि उनमें आरक्षण का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। बेरोजगारी दीमक की तरह युवा वर्ग की छाती पर बैठी है और उसके यौवन, शक्ति, उत्साह और रचनात्मकता को खा रही है। युवा वर्ग में अवसाद, निराशा अवसरवाद और पतनशीलता घर कर रही है। जिस देश की युवा शक्ति घुट-घुट कर जीने-मरने को अभिशप्त हो, जो हताशा और निराशा की अंधी गली में भटकने को मजबूर हो उस देश का क्या सम्मान?

 

सरकारी स्कूलों में प्रतिवर्ष दाखिला लेने वाले 100 बच्चों में से केवल पांच ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते है और इन पांच में से चार अमीर परिवारों के होते हैं। हर साल आधे बच्चे स्कूल से बाहर रह जाते हैं और आधे बच्चों को, यह अमानवीय और पूंजीवादी नीतियों पर खड़ी शिक्षा व्यवस्था स्कूल से बाहर ठेल देती है। गरीबों के बच्चे, मंहगे और निजी पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों से हर क्षेत्रा में पिछड़ते हैं। नतीजतन, शिक्षा जिसे देश के भावी कर्णधारों के बीच की आर्थिक व अन्य तमाम तरह की खाइयों को पाटना था वह ऐसी रेल बन जाती है जिसमें केवल अमीरों के बच्चे ही बैठ सकते हैं और वही अपनी-अपनी मंजिलों पर पहुंचते। पिछले पचास सालों से इस देश के बच्चों को शिक्षा के नाम पर केवल मिट~टी का झुनझुना देकर टरकाया गया है। पूरे बजट में शिक्षा पर खर्च 6% से शुरू करके उसे 1.5% पर ले आया गया है। देशभर में लाखों बच्चे बाल मजदूरी के विभिन्न पेशों में अपना बचपन और अपने सपने घिस रहे हैं। यह शर्म की बात है कि देश के पचास जिलों में विश्व बैंक अपने स्कूल चला रहा है जिनमें बच्चे क्या पढ़ेंगे, कैसे पढ़ेंगे, यह हम नहीं, वह तय करेगा। इस बच्चे देश के आधे से ज्यादा बच्चे अशिक्षित हैं और आधे लोग अनपढ़। बम परीक्षण करने वालों के लिए यह प्राथमिकता क्यों नहीं रही कि वे बम परीक्षण कार्यक्रम की बजाए सर्वजन शिक्षण कार्यक्रम पर अमल करते।

 

आज दुनिया भर में अधिकतम गेहूं उगाने वाले देश में आटा 10 रुपए किलो बिक रहा है और प्याज 20 रुपए किलो। सैकड़ों लोगों को खाने के वास्ते कुछ भी नसीब नहीं होता और काला हांडी जैसी वीभत्स घटनाएं घटती हैं। दुनिया के पेट के लिए जो किसान रोटी पैदा करते हैं वे दाने-दाने को तरसते हुए मर जाते हैं। पिछले साल देश भर में खासतौर पर आन्ध्र प्रदेश में बीज, खाद, पानी की मदद न मिलने के कारण सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या की। पर्यावरण की सुरक्षा और सुंदरता के नाम पर भारत के अनेक शहरों में कल-कारखाने बंद किए गए और करोड़ों की तादात में मजदूर बेरोजगार हुए। मिल मालिकों ने मुफ्त मिली जमीनें आसमान छूती कीमतों पर बेचकर अपने घर भरे। पिछले साल केवल अकेले दिल्ली शहर में ही 10-15 झुग्गी बस्तियों को उजाड़ा गया और करोड़ों ऐसे लोगों को बेघर और बेबस कर दिया जिनके हाथों से सारा शहर चलता था। इस देश में लगातार विकास के नाम पर, शहरीकरण के नाम पर और रोजगार अवसरों के केन्द्रीकरण की नीति के कारण आम लोगों को लगाता। विस्थापित होते रहने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। आवास का हक जनता का बुनियादी हक है। ये सरकारें वह तो मुहैया करवा नहीं पाई उल्टे तंग और बदूबदार बस्तियों में मिली सर छिपाने की जगह से भी आम लोगों को वंचित किया गया। रोटी, कपड़ा और मकान, बम परीक्षण पर पैसा फूंकने वालों की प्राथमिकता में क्यों नहीं रहे। जिस देश में लाखों लोग भूखे मरें, नंगे रहें और खुले आसमान में दिन काटें वह देश दुनिया के सामने कैसे आत्मगौरव और निज सम्मान की बात कर सकता है।

 

इस देश के आम बाशिन्दों को पिछले पचास सालों से लगातार भूख और गरीबी से मुक्ति के सपने दिखाए जाते रहे हैं। बेरोजगारी और अशिक्षा को दूर भगा देने के पुरजोर नारों से उन्हें भ्रमित किया जाता रहा है। लेकिन पचास सालों में जिन्दगी के बद-से बदतर होते गए हालातों ने आम आदमी को सिखा दिया है कि भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा घटने की बजाए बढ़ रही है। इस देश के आम इंसान को उन्नति और सुख-चैन के रास्ते से दर किनार किया जाता रहा है। देश पर लगातार बढ़ता जाता विश्व कर्ज, भ्रष्ट और कमजोर नीतियों के चलते देश के औद्योगिक विकास का ऐसा ढांचा अख्तियार करना जिसमें कम श्रम की आवश्यकता पड़े, और भ्रष्ट और रिश्वतखोर अफसरशाही के बेतहाशा खर्चों का बढ़ना, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जरूरी जन सुविधाओं से पैसा काटना इस देश की गिरती माली हालत के उदाहरण हैं। जनता के तरफदार अर्थशास्त्री एक बार नहीं, सैकड़ों बार आर्थिक विकास और उन्नति से संबंधित सरकारों के झूठे आंकड़ों का पर्दाफाश कर चुके हैं और देश की लगातार आर्थिक संकटों से घिरती जा रही अर्थव्यवस्था का खुलासा कर रहे हैं। टोपी पहनने वाले टिडडों के कानों पर जूं नहीं रेंगती है बल्कि ये जनता को भरमाने के लिए न सिर्फ तरह-तरह के सब्ज़बाग दिखा रहे हैं बल्कि इन सब्ज़बागों को और ज्यादा आकर्षक और लुभावना दिखाने के लिए किसिम-किसिम के कलात्मक और रचनात्मक दिखने वाले तरीके ईजाद कर रहे हैं। इन तरीकों की फेहरिस्त बाबरी मस्जिद विध्वंस से शुरू होकर परमाणु बम परीक्षण तक पहुंच गई है ताकि जनता का ध्यान असली समस्याओं की जड़ पर जाने से हटे और ये कुर्सी पर बैठकर शान से उसका खून चूसते रहें।

 

भारत के परमाणु परीक्षण के बाद कई देशों ने उसको दी जा रही आर्थिक सहायता पर प्रतिबन्ध लगाने की धमकी दी है। लेकिन सत्तारूढ़ों का कहना है कि भारत की आर्थिक व्यवस्था पर इन प्रतिबन्धों का कोई असर नहीं पड़ने वाला है। विश्व पूंजीवाद आज अपने आर्थिक संकटों से घिरा हुआ है जिनसे राहत पाने के लिए वह तीसरी दुनिया के देशों की ओर बढ़ा है। इसलिए अगर अमरीका प्रतिबंध लगाएगा तो दूसरे सैकड़ों देश मदद को आ जाएंगे। अत: भारत पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला है। जन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन प्रतिबंधों का असर पड़ेगा और जरूर पड़ेगा मगर वह टाटा-बिरला डालमिया या अटल-आडवाणी मुरली एंड कम्पनी पर नहीं पड़ने वाला है। इनका असर आम जनता पर पड़ेगा। भुखमरी और गरीबी बढ़ेगी। मंहगाई लोगों की कमर तोड़ देगी। बेरोजगारी सुरसा बनकर करोड़ नौजवानों को अपने पेट में लील लेगी। किसान आत्महत्याएं करेंगे और मजदूर कम से कम मूल्य पर श्रमशक्ति बेचने को मजबूर होंगे। बचे-खुचे सामाजिक विकास के रास्ते में रूकावट आएगी, जो थोड़ा-बहुत धन शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर लगता था वह अब बम पूजा की भेंट चढ़ जाएगा। परमाणु कार्यक्रम को आगे चलाए रखना मजबूरी होगी जिसमें खर्च होने वाली राशि लगातार बढ़ती जाएगी। देश के भीतर लाखों करोड़ों लोग भूख और गरीबी से मरेंगे और देश सीना तानकर लाखों जीते-जागते, हंसते-गाते लोगों को मारने की ताकत लिए-लिए घूमेगा। 21वीं सदी में भारत की हालत शायद उस आदमी जैसी होगी जो भूखा-नंगा और प्यासा होगा और जिसके एक हाथ में परमाणु बम होगा और दूसरे हाथ में भीख मांगने के लिए कटोरा।

 

इस देश में दो देश हैं। एक भारत है जो भूखा, नंगा और संपत्तिहीन है। इस देश के पास खोने के लिए है ही क्या जो दुश्मन लूट लेंगे, जिसकी रक्षा के लिए सैना रखी जाए या परमाणु बम बनाया जाए। पूरी दुनिया में कोई देश नहीं होगा जिसमें ऐसा दूसरा देश न हो। इन देशों के पास न अपना कुछ लुटाने के लिए कुछ है न दूसरों का लूटने के लिए कुछ। फिर फौजें किसकी और किससे रक्षा करती हैं और बम परीक्षण किसका भय दूर करेंगे। निश्चित ही, 15 पफीसदी की आबादी वाले उस हिस्से का, जो संपत्ति का मालिक है, तमाम संसाधनों पर कब्जा किए बैठा है और जिसे अपनी संपत्ति लुट जाने का भय हमेशा रहता है उसी को फौजें और परमाणु परीक्षण चाहिए। जो अपनी संपत्ति को लगातार बढ़ाने और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए दूसरे गरीब और पिछड़े मुल्कों में भी डाका डालने व उन्हें हड़पने की ताक में रहता है, जो अपने देश में अपने विरोध में उठती हर आवाज, हर नस्ल, जाति और धर्म को तानाशाहीपूर्ण और बहशियाना ढंग से नेस्तोनाबूद करने की हद तक गिर सकता है। ऐसे बहशी दरिन्दे का नाम पूंजीवाद है, साम्राज्यवाद है, साम्प्रदायिकतावाद है, फासिस्टवाद है। हमारे देश का शासक वर्ग, हर शासन करने वाली का चरित्र यही है और इससे अलग बिल्कुल नहीं है। यह शासक वर्ग और इसकी शोषणकारी व्यवस्था आम जनता के शोषण पर टिकी है। पचास साल तक इसने जनता के साथ बहुत छल-कपट किए हैं। अब इसके समाजवादी नमूने के जनवादी चरित्र का असली रंग जनता देख चुकी है। अब यह बाबरी मस्जिद के विध्वंस और परमाणु बम परीक्षण को कितना ही राष्ट्रवादी मुलम्मे में रखे पर जनता इस चाल में नहीं आने वाली। भाजपा आजकल बम परीक्षण के बाद जिस राष्ट्रवाद का उन्माद फैला रही है उसे जनता ने समझ लिया है मगर उसने यह भी समझ लिया है कि यह ऐसा राष्ट्रवाद है जिसके हाथ-पांव, आंख, नाक और कान नहीं है। यह एक अंधा, बहरा और लूला राष्ट्रवाद है जिसके पास केवल मुंह है जो रक्त और मनुष्य के मांस के लोथड़े के अलावा और कुछ नहीं मांगता है। इसका यह बम पूजा का हवन कुंड न सिर्फ अपने देशवासियों बल्कि दुनिया के तमाम अमन पसंद मनुष्यों की मौत मांगता है। बम पूजा की यह हवन कहीं खत्म नहीं होती है इसमें खत्म होती हैं दुनिया भर के लोगों की खुशियां, इच्छाएं, सपने और फूल और इन्द्रधनुष।

 

ये अंधराष्ट्रवादी 15 मई से लगातार चीख रहे हैं कि भारत ने परमाणु परीक्षण करके पूरी दुनिया में अपना सम्मान बढ़ाया है। बम परीक्षण के बाद भारत अब गौरव बढ़ा है। वह अब शान से दुनिया को बता सकता है कि वह भी कुछ है। इससे ये साबित होता है कि पहले भारत का गौरव और आत्म सम्मान नहीं था वह केवल बम परीक्षण करने पर भी आया है। आत्म सम्मान तो शायद थोड़ा बहुत था मगर इन लूटखोर जोंकों का आत्मसम्मान नहीं था। इनका सम्मान बढ़ा है जो दूसरे लूटखोरों के आगे सीना तानकर कहेंगे कि तुम्हारे पास अगर बम है तो मेरे-पास भी है। इतिहास गवाह है कि दूसरों को ताकत के बल पर डराने धमकाने और लूटने वाले लूटखोर आपस में लड़-भिड़ कर मर-खप जाते हैं। इतिहास उनको केवल बहशी दरिन्दे के रूप में याद करता है और उनका जिक्र आने पर उन के मुंह पर थूकता है। हिरोशिमा-नागासाकी आज भी ऐसे लूटखोरों के मुंह पर थूक के निशान हैं।



जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी भूख और मौत के बीच खड़ी हो, जिस देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग गरीबी और अभावों से जूझ रही हो, जिस देश के मजदूरों को मजदूरी से और किसानों को जमीनों से बेदखल करके, आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा हो, वह पांच तो क्या हजारों बम परीक्षण कर ले तब भी उसका आत्म सम्मान नहीं बनने वाला है। आत्म सम्मान केवल हाथ में परमाणु हथियार आ जाने और सैकड़ों लोगों को मौत के मुंह में उतार देने में सक्षम हो जाने पर नहीं आता है, कभी नहीं आता है। वह लूट-खसोट के असले से नहीं बल्कि अपने देश के प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा और मकान व अन्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम होने से आता है। वह पड़ोसी देशों व उनके लोगों को दुश्मन बनाने से नहीं आता वह उनसे परस्पर सहयोग व भाईचारे की भावना को मजबूत करने से आता है। वह दुनिया में शांति अमन कायम करने के लिए जान की बाजी लगा देने से आता है।

 

परमाणु युद्ध में कोई विजेता नहीं होता। भारत के महाशक्ति बनने का दावा एकदम फर्जी है। इतिहास ने खोखली और जनता के सिरों पर खड़ी ऐसी सैकड़ों महाशक्तियों को धड़ाम से गिरते देखा है। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, इंग्लैंड सभी ऐसी ही खोखली महाशक्तियां है जिनकी होड़ में भारत और पाकिस्तान जैसे अन्य और देश भी शामिल होने को लालायित हैं। भारत की असली ताकत उसके लोग हैं। अत: उसको उनके आत्मगौरव और आत्मसम्मान का ख्याल करना चाहिए। आज भारत की जरूरत यह नहीं है कि वह परमाणु शक्ति वाले पांच देशों के समूह में शामिल हो बल्कि इस बात की है कि वह सामाजिक रूप से दस सबसे कम विकसित देशों की कतार से बाहर आए।

हर आदमी को जब मिल पाएगा।

                                    रोटी, कपड़ा और मकान।

तब ही होगा इस भारत का

                                    आत्मगौरव, आत्मसम्मान। जून

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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