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Sunday 21 July 2013

दलित राजनीति और संगठन का इतिहास बताती एक जरूरी किताब

 
मुकेश मानस

 

-          इस किताब का शीर्षक है-दलित राजनीति और संगठन। सत्तर पेजों वाली इस छोटी सी किताब को भगवान दास जी ने सन 2002 में साधारण लोगों ख़ासकर आज की पीढ़ी के दलित नौजवानों के लिये अपने बेटे राहुल दास के आग्रह पर लिखा था। ये किताब देखने में छोटी जरूर है मगर अपने आप में एक मुकम्मिल किताब है। आज की दलित राजनीति की दशा और दिशा को समझने के लिये यह एक बेहद जरूरी किताब है।

 

-          डा अम्बेडकर ने दलितों में जिस सांगठनिक और राजनीतिक चेतना का बीज डाला था वह आज काफ़ी विकसित हो गया है। आज सैकड़ों  दलित संगठन और राजनीतिक पार्टियां हमारे सामने मौजूद हैं। उनमें विचारधारा, रणनीति और लक्ष्य संबंधी बहुत सी भिन्नतायें हैं। दलित समाज के विकास को लेकर सभी के अपने-अपने दावे हैं। आज की दलित राजनीति की वस्तु स्थिति क्या है? यह जानने के लिये जरूरी है कि इन राजनीतिक पार्टियों की वैचारिकी और व्यवहार की मजबूतियों और सीमाओं का एक मूल्यांकन किया जाये ताकि भविष्य की दलित राजनीति की दिशा का पता लगाया जा सके। कुछ हद तक यह किताब इसी उद्देश्य को पूरा करती है।

 

-          इस किताब में तेरह अध्याय हैं। इस किताब को तीन भागों में बांट कर देखा जा सकता है। पहले भाग में बाबा साहेब द्वारा बनाये गये संगठ्नों और राजनीतिक पार्टियों संक्षिप्त परिचय दिया गया है। दूसरे भाग में आज की कई दलित राजनीतिक पार्टियों का मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में उन समस्याओं का जिक्र किया गया है जिनसे आज दलित समाज जूझ रहा है और जिनको दलित विकास के अजेंडे में प्राथमिकता दिये जाने की जरूरत है।

 

-          किताब के पहले भाग में (अध्याय एक से तीन तक)  लेखक ने बाबा साहेब के राजनीतिक आन्दोलन की दिशा का विश्लेषण करने का प्रयास किया है। यह सही है कि बाबा साहेब ने पहले पहल दलित समाज  में राजनितिक चेतना और सघर्ष को संगठित रूप में क्रियान्वित किया जिसके पीछे जोतिबा फुले के सामाजिक आंदोलन से पैदा हुई उष्मा थी। इस बात को ख़ुद बाबा साहेब ने भी स्वीकार किया है। मगर लेखक ने कहीं जोतिबा फ़ुले का ज़िक्र तक नहीं किया हैं। जोतीबा फ़ुले को भुलाना अम्बेड्करवाद की पूरी परंपरा को नकारने जैसा है। लेखक ने जोतीबा फ़ुले को छोड़कर राजाह और श्रीनिवास जैसै दक्षिण के नेताओं का ज़िक्र किया है जो बाबा साहेब के समांतर या उनसे पहले दलितों के सवाल को उठा रहे थे। वे दलित समाज के लिये अलग अधिकार देने और नौकरियों में दलितों को हिस्सा देने की मांग उठा रहे थे। उनका कहना था कि जब तक अछूतों पर किये गये सामाजिक अन्याय को रोका नहीं जा सकता तब तक भारत को स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिये। बाद में भारत की आज़ादी को दलित समाज की अधूरी आज़ादी के रूप में बाबा साहेब ने भी उठाया।

 

-           दलित समाज को आज़ाद भारत में पूरी आज़ादी मिले इसके लिये बाबा साहेब ने बहुत पहले से अपने राजनीतिक प्रयास आरंभ कर दिये थे। 1936 में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई। यह पार्टी भारत के इतिहास में दलित समाज और कामगार वर्ग की पहली और सामूहिक राजनीतिक अभिव्यक्ति थी। इस पार्टी के नाम में लगा लेबर शब्द और इस पार्टी का अजेंडा बताता है कि यह केवल दलितों की पार्टी नहीं थी। इसके अजेंडे पर दलित समाज ही नही, श्रमिक वर्ग भी था। उस समय तक कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हो चुकी थी मगर उसके अजेंडे पर दलित समाज और उसकी समस्यायें नहीं थीं।

 

-          बाबा साहेब की शुरू से ही यह समझ थी कि तत्कालीन भारतीय समाज में दलित समाज ही वास्तविक कामगार तबका है और उसकी प्रमुख समस्या जाति आधारित सामाजिक और आर्थिक शोषण की समस्या है। वह मानते थे कि जब तक जाति का खात्मा नहीं हो जाता तब तक समाजवादी क्रांति के उभरने की कोई संभावना नहीं है। इसलिये वह जातिविहीन समाज की स्थापना को अपने राजनीतिक आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य और समाजवाद की स्थापना की दिशा में पहला कदम मानते थे। भारत में कामगार वर्ग के उभार के बारे में उनकी यह सोच थी कि भारत में अभी ठीक से औद्योगिक विकास शुरू नहीं हुआ है। कामगार वर्ग धीरे-धीरे अस्तित्व में आयेगा और अपनी जगह लेगा। इसलिये  भारतीय समाज में शोषण विरोधी राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्त्व दलितों को ही करना है। उनका मानना था कि दलित समाज और श्रमिक वर्ग ही भारतीय समाज के दो ऐसे प्रगतिशील वर्ग हैं जो समाज परिवर्तन के काम को क्रियान्वित करेंगे। इसलिये दोंनो को साथ लेकर चलना जरूरी है। मगर इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का क्षेत्र बम्बई तक ही सीमित था। कुछ समय बाद बाबा साहेब ने एक अखिल भारतीय स्तर की पार्टी बनाने के लिहाज़ से अखिल भारतीय शैड्यूल्ड कास्ट फ़ैडरेशन की स्थापना की। अखिल भारतीय शैड्यूल्ड कास्ट फ़ैडरेशन में सभी अनुसूचित जातियों के नेता शामिल हुए। कई राज्यों में फ़ेडरेशन बहुत मजबूत थी।

 

-          बाबा साहेब ने अपने जीवनकाल में बहुत से संगठ्न और राजनीतिक पार्टियां बनाईं। रिपब्लिकन पार्टी आफ़ इंडिया की स्थापना में दलितों के समुचित विकास के संबंध में उनके समस्त चिंतन और दूरदर्शिता का निचोड़ देखा जा सकता हैं। इस पार्टी को उन्होंने 1956 में गठित किया। इस पार्टी का अजेंडा राजकीय समाजवाद का अजेंडा है। बाबा साहेब का राजकीय समाजवाद समस्त कृषि भूमि, उद्योगों, बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने, सभी नागरिकों कों शिक्षा और रोज़गार की गारंटी देने, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचित तबकों के समुचित और एकसमान विकास का कार्यक्रम है। बाबा साहेब के लिये राजकीय समाजवाद का मतलब था-समस्त नागरिकों के लिये समता, समानता और बंधुत्व को कायम करना। इस पार्टी का लक्ष्य  संविधान की विधि के ज़रिये राजकीय समाजवाद की स्थापना करना था। उनके मुताबिक राजकीय समाजवाद ही उस समय के भारत की जरूरत थी। राजकीय समाजवाद ही भारत के लिये सबसे बड़ी क्रांति और विकास की सबसे उचित व्यवस्था थी जिसे प्राप्त करने के लिये किसी और क्रांति की जरूरत नहीं थी। इस पार्टी का भी मुख्य लक्ष्य दलित समाज और श्रमिक वर्ग थे मगर नेतृत्व दलितों के ही हाथ में था। बाबा साहेब की मृत्यु के बाद यह पार्टी कई हिस्सों में बँट गई। शुरु में इनमें से कुछ ने बाबा साहेब के प्रोग्राम को अपने अजेंडे पर रखा मगर बाद में ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में सीमित हो कर रह गयीं।रिपब्लिकन पार्टी के अनुयायियों और बाबा साहेब के मिशन से जुड़े लोगों ने कई बार एक संयुक्त रिपब्लिकन पार्टी बनाने का प्रयास किया मगर यह सभव नहीं हो पाया। इस पार्टी के कई धड़े आज भी भारत के राजनीतिक पटल पर छुट-पुट तरीके से शिरकत कर रहे हैं।   

 

-          किताब के दूसरे भाग में (अध्याय चार से सात तक) लेखक ने बाद के दलित संगठनों और पार्टियों का परिचय और मूल्यांकन पेश किया है। मगर वह इस संधर्भ में 1970 में सामने आई दलित संघर्ष की सबसे तीखी अभिव्यक्ति दलित पैंथर को भूल गये। दलित पैंथर के लड़ाकू और चुनौतीपूर्ण संघर्ष ने दलित समाज में एक ऐसा आलोड़न पैदा जिसने देश में स्थापित व्यवस्था की बुनियाद को हिला कर रख दिया। दलित पैंथर ने दलित आंदोलन को संघर्ष का एक नया मुहावरा दिया। देश में अम्बेड्करवाद और मार्क्सवाद जैसी दोंनो क्रांतिकारी विचारधाराओं को पहली बार आत्मसात करने का श्रेय पैंथरों को जाता है। जातिवाद से जुड़ी समस्यायों के निदान के लिये उन्होंने अम्बेडकरवाद का सहारा लिया और अन्य समस्यायों के निदान के संधर्भ में मार्क्सवाद को अपनाया। इस आंदोलन ने पहली बार समाज परिवर्तकारी शक्तियों के आगे इस वैचारिक एकीकरण की अनिवार्य जरूरत को रेखांकित किया। मगर यह वैचारिक एकीकरण ऐसे लोगों को स्वीकार्य नहीं हुआ जो अम्बेड्कर और मार्क्स के नाम पर चल रहीं  अपनी दुकानें खोने को तैयार नहीं थे। दूसरे कुछ अपनी अन्तर्निहित वैचारिक और व्यवहारिक उलझनों के चलते दलित पैंथर भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ कर धीरे-धीरे द्र्श्य-पटल से गायब हो गया।   

 

-          आज जितनी भी दलित राजनीतिक पार्टियां हमारे सामने मौजूद हैं। उनमें बहुजन समाज पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है। इसके संस्थापक कांशीराम ने दलित समाज को एक नई पहचान देते हुए उसे बहुजन समाज कहा। इस नए शब्द में तमाम अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों, पिछ्ड़ा वर्ग, अन्य पिछ्ड़ा वर्ग और धार्मिक अल्पसंख्यकों को एक एकीकृत समाज यानी बहुजन समाज के रूप में रखने का प्रयास किया गया। मगर व्यवहार में यह पार्टी केवल अनुसूचित जातियों का ही प्रतिनिधित्व करती रही है। कांशीराम को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी और दलित पैंथर के बाद म्रृतप्राय दलित राजनीति में प्रेरक शक्ति का संचार किया। उन्होंने राजनीतिक चेतना को सीमित अर्थों में सही मगर दलित समाज के जन-जन तक पहुँचाया और उसे राजनीतिक संघर्ष में शामिल करने की कोशिश की। मगर अपनी वैचारिक सीमाओं के चलते वह इस जन भागीदारी को दलित जनता की ताकत नहीं बना सके। उन्होंने दलित सशक्तिकरण की बात की मगर इस सशक्तिकरण को क्रियान्वित करने की कोई रणनीति सिवाय सत्ता प्राप्त करने के उनके पास नहीं थी। उन्होंने दलितों की असली बीमारी के प्रश्न को कभी नहीं उठाया। सत्ता पाने की रणनीति को पूरा करने के चक्कर में वह तमाम अम्बेडकरवादी सैद्धांतिकी को ताक पर धरते चले आये। इस काम में मायावती उनसे भी आगे निकल गईं हैं।

 

-          यह बहुजन समाज पार्टी मुख्य रूप से सत्ता प्राप्ति में ही दलित और शोषित समाज की मुक्ति देखती है। बाबा साहेब ने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोंनो को दलित समाज के दुश्मन के तौर पर रेखांकित किया था। मगर यह पार्टी दलित समाज के स्वाभाविक मित्र कम्युनिस्टों से दूरी बनाकर रखती आई है और सत्ता पाने की होड़ में यह किसी भी ऐसे दल से हाथ मिलाने को तैयार है जो उसे सत्ता में हिस्सेदारी का वायदा करता हो चाहे वह दल दलित विरोधी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाला दल ही क्यों ना हो। चूंकि इस पार्टी का लक्ष्य केवल सत्ता पाना है इसलिये इसने अपनी नई रणनीति सामाजिक अभियांत्रिकी के तहत बहुजन समाज की अपनी पुरानी अवधारणा में विस्तार करते हुए उसमें उच्च जातियों के लोगों को भी शामिल करके उन्हें अपना उम्मीदवार बनाना शुरू कर दिया है। अब यह सिर्फ़ कहने के लिये दलित समाज की पार्टी है। लेखक का मानना है कि भारतीय सत्ता में अपनी पूरी दख़ल के बावजूद बहुजन समाज पार्टी दलितों के वास्तविक मुद्दों को उठा पाने में नाकामयाब साबित हो रही है। यह लगातार उस कार्यक्रम से पीछे हटती आई है जो बाबा साहेब ने समस्त दलित समाज और इस देश के समुचित विकास के लिये प्रस्तुत किया था।

 

-          बसपा के बाद रामविलास पासवान के नेतृत्व में बिहार में उभरी लोक जनशक्ति पार्टी दलितों और अल्पसंख्यकों के नाम सत्ता की दौड़ में शामिल होने वाली नई पार्टी है। इस पार्टी की आधारभूमि बिहार ही है मगर यह एक अखिल भारतीय पार्टी बनने के लिये प्रयासरत है। लोजपा के साथ-साथ और भी कई दलित पार्टियां जैसे बाल कृष्ण सेवक की युनाइटेड सिटीजन, संगीता राव की पार्टी और उदित राज की जस्टिस पार्टी आदि के अलावा दक्षिण की कई पार्टियां भी मैदान में हैं। लेखक ने इसी भाग में संक्षेप में ही सही मगर आज की वामपंथी पार्टियों का भी विश्लेषण किया है और यह राय रखी है कि कहीं ना कहीं ये पार्टियां भी दलित अजेंडे को पूरी तरह अपनाने से आज भी कतरा रही हैं।

 

-          किताब के तीसरे भाग में (अध्याय आठ से ग्यारह तक)  लेखक ने उन समस्याओं को उठाया है जिनसे दलित समाज आज भी जूझ रहा है। ये समस्यायें हैं-जातिवाद, सफ़ाई कर्मचारियों की समस्या, सेना में दलितों की घटती भागीदारी और अल्पसंख्यकों की समस्या। मैं इस सूची में बेरोज़गारी, अशिक्षा, दलित महिलाओं की आर्थिक बराबरी और सम्मान की समस्या को भी जोड़ना चाहता हूं। कहने की ज़रूरत नहीं कि आज की तमाम दलित पार्टियों के केन्द्र में ये समस्यायें नहीं हैं। अगर हैं भी तो ये पार्टियां इनको बहुत ही ग़ैर मामूली ढंग से  उठा रहीं हैं। जातिवाद का खात्मा अब किसी भी दलित पार्टी की प्राथमिकता में नहीं है। सफ़ाई कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी आबादी को सफ़ाई के पेशे से मुक्त कराने का कोई प्रोग्राम इनके पास नहीं है। भारतीय सेना में दलितों की भागीदारी लगातार कम हो रही है। इस दिशा में ये पार्टियां कोई पहलकदमी नहीं कर पा रही हैं। अल्पसंख्यकों की समस्या ख़ासकर दलित अल्पसंख्यकों की समस्या की तरफ़ ये पार्टियां पूरी तरह से ध्यान नहीं दे रही हैं। दलितों में बेरोज़गारी और अशिक्षा को कम करने और दलित महिलाओं की आर्थिक बराबरी और सम्मान सुनिश्चित करने के लिये ये कोई रचनात्मक कदम नहीं उठा पा रही हैं। अंत में लेखक आह्वान करता है कि एक संयुक्त रिपब्लिकन पार्टी आफ़ ईंडिया का निर्माण ही दलितों के समुचित विकास के लक्ष्य को पूरा कर सकती है। इस पार्टी के सब गुटों को संगठित करना मुश्किल जरूर है पर असंभव नही।

 

-          साधारण दलित जनता और दलित नौजवानों के लिये सरल ढ़ंग से लिखी गई इस छोटी सी किताब में विस्तार की ज्यादा गुंजाईश नही थी फ़िर भी बहुत सी जरूरी बातें छूट गई हैं। मसलन इस पूरी किताब में लेखक ने अम्बेडकरवाद को उसके समग्र रूप में कहीं व्याख्यायित नहीं किया है जबकि इस किताब की आधारभूमि वही है। अम्बेडकरवाद की सैद्धांतिकी की व्याख्या के अभाव में रिपब्लिकन पार्टी के बाद की सभी दलित पार्टियों का मूल्यांकन अधूरा सा और चलताऊ लगता है। दूसरे इसमें यह जरूर बताया जाना चाहिये था कि आज दलित समाज कहाँ खड़ा है? उसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वस्तु-स्थिति क्या है? और वर्तमान हालात में उसका अजेंडा क्या है? चूंकि यह किताब आज की पीढ़ी के दलित नौजवान को मुखातिब है इसलिये इस किताब में इस बारे में यह बात जरूर की जानी चाहिये थी कि आज की पीढ़ी के दलित नौजवान की समस्यायें क्या है और उसके लिये इनसे मुक्ति का क्या रास्ता है? और पूरे दलित समाज की मुक्ति में उसकी भूमिका क्या है?  

 

किताब का नाम : दलित राजनीति और संगठन,  

लेखक : भगवान दास  

प्रकाशक : दलित वर्ल्ड लाईब्रेरी

कीमत : पचास रुपये

     

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