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Sunday 21 July 2013

सफाई कर्मचारी समुदाय की विकास यात्र : एक खोज


 
मुकेश मानस

 

 

भारत की सभ्यता और संस्कृ्ति की बड़ी-बड़ी और गौरवपूर्ण व्याख्याएं करने वाले अक्सर इस तथ्य को दरकिनार कर जाते हैं कि एक बेहद प्राचीन और समृद्ध सभ्यता-संस्कृति होते हुए भी वे एक बेहद कलंकित और अमानवीय सांस्कृतिक विरासत के संवाहक भी हैं। इस सभ्यता और संस्कृति का यह बेहद अमानवीय रूप है हज़ारों सालों से चली आ रही वर्ण और जाति-व्यवस्था और इससे उत्पन्न अस्पृश्यता, भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण की अकथनीय, अतुलनीय संस्कृति। विश्व में सबसे महान लोकतंत्र कहलाने वाला भारत इस अमानवीय और कलंकित संस्कृति के रोग से इस कदर ग्रसित है कि उन्मूलन की तमाम संवैधानिक और कानूनी कोशिशों, सामाजिक बौद्धिकों और संगठनों की कवायदों, शिक्षा और जागरूकता की अनगिनत व्यवस्थाओं के बावजूद इसके अकथनीय दंशों को दलित समाज विभिन्न रूपों में झेल रहा है।

 

इस कलंकित और भेदभाव वाली अमानवीय संस्कृति का सबसे घृणित रूप है-सिर पर मैला ढोने की प्रथा। सुलभ इंटरनेश्नल और सुलभ स्वच्छता आंदोलन के संस्थापक डॉ. विंदेश्वर पाठक ने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है-"इससे बड़ी लज्जा का दृश्य दूसरा क्या हो सकता है कि सफाई के नाम और काम पर आज भी एक मानव दूसरे मानव की भिष्ठा अपने कंधे और सिर पर ढो रहा है। और वह भी गुजारे के लिए, पेट के लिए? स्वाधीन भारत के इस लोकतंत्र संपन्न समाज में भी यह जारी है और देखा जाता हैं। सभ्यता के शिखर पर जाते हुए मानव समाज के समक्ष यह घोर अमानवीय और निर्मम स्थिति है।"

 

सिर पर मैला ढोने की प्रथा मानव-सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में एक रही है और हाल तक यह जारी है। सोचने वाले सदा सोचते रहे हैं कि आखिर ये कैसे हुआ कि कुछ लोगों ने अपने ही जैसे मनुष्यों की गंदगी को ढोना अपना पेशा बना लिया (फलैप)। युवा साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता संजीव खुदशाह की किताब "सफाई कर्मचारी समुदाय" का प्रस्थान बिंदु यही विचार और चिंता है। लेखक के अनुसार यह किताब सफाई कर्मचारियों पर कई वर्षों तक किए उसके विशद शोध का नतीजा है। और यह अच्छी बात है कि संजीव खुदशाह ने सफाई कर्मचारियों पर केवल किताबी शोध नहीं किया है। उन्होंने अपने जीवन के अनेक वर्ष सफाई कर्मचारियों के जीवन और जीवन स्थितियों को जानने-समझने में लगाए हैं, उनके जीवन का कोना-कोना झांका है। इसीलिए यह किताब इतनी दिलचस्प और पठनीय बन पाई है।

 

संजीव खुदशाह की किताब इस विषय पर लिखी गई शायद दूसरी ऐसी पुस्तक है जो सफाई कर्मचारियों के इतिहास और वर्तमान पर व्यापक प्रकाश डालती है। यह जानना भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के एक बेहद अमानवीय रूप से रूबरू होना है कि आखिर यह कैसे हुआ कि पूरा का पूरा सफाई कर्मचारी समुदाय एक ऐसी जाति में तब्दील हो गया जिसे भारतीय समाज में सर्वाधिक घृणा, तिरस्कार, अपमान और शोषण का वायस बना दिया गया और आज वह अमानवीयता की हदें पार करते अपमान के इन दंशों को झेल भी रहा है, और उनसे जूझ भी रहा है।

 

संजीव खुदशाह ने इस किताब को पांच खंडों में विभाजित किया है। पहले चार खंडों में विभाजित किया है। पहले चार खंड़ों में उन्होंने सफाई कर्मचारी समुदाय के इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर विशद प्रकाश डाला है। और कई मायनों में इन पहलुओं को कर्मचारी समुदाय की वर्तमान परिस्थिति सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश के साथ जोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने सफाई कर्मचारी समुदाय के वर्तमान पर खड़े होकर उसके अतीत की उन कड़ियों को खोजने का प्रयास किया है जो समय की गति में या तो धीरे-धीरे पीछे छूट गई या जिन्हें वर्चस्ववादी, वर्णवादी मानसिकता से चालित तथाकथित समझदार लोगों ने धुंधला दिया।

 

अपनी किताब के पहले खंड में संजीव खुदशाह ने शूद्र, अछूत, अछूतपन का प्रारंभ-परिस्थिति शीर्षक के तहत शूद्र कौन है? अछूतपन किसी जाति-विशेष के लिए ही क्यों है?, अछूतपन की शुरुआत कब से हुई? और क्या अछूत भी ब्राह्मणों से घृणा करते थे? जैसे महत्वपूर्ण सवालों को उठाया है और उनके ऐतिहासिक संदर्भ तलाशने का प्रयास किया है। सफाई कर्मचारी समुदाय के लोग कौन है? इस बारे में उनका कहना है कि हिंदू जाति-व्यवस्था के अनुसार ये लोग शूद्रमें आते हैं लेकिन इसके नीचे एक वर्ग है, वह है अतिशूद्र। ये लोग दरअसल इस अतिशूद्र वर्ग में आते हैं। आज यही वर्ग अनुसूचित जाति के रूप में जाना जाता है। धर्म के ठेकेदार इन्हें हिंदू बताते हैं किंतु ये और इनके देवी-देवता किसी हिंदू पुराणों और वेदों में नहीं मिलते। साथ ही सवर्णो ने इस बात का पूरा सवाल रखा कि ये सभी शूद्र एक ना हो जाएं इसलिए उन्होंने ऐसी नीति अपनाई एवं ऐसे ग्रंथों की रचना कर जन-जन तक पहुँचाने का अभियान चलाया जिससे इनमें भेद कायम रहे।

 

किताब के दूसरे खंड में सफाई कामगार प्रारंभ की परिकल्पना, प्रकार, भंगी का अभिप्राय एवं वर्गीकरण पर विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। सफाई कामगार प्रारंभ की पहली परिकल्पना में वह बताते हैं कि मुगल शासकों ने भारत में अपने राज्य स्थापित करने की प्रक्रिया में अपनी बेगमों की सेवा, मूल रूप से पाखाने की व्यवस्था को चलाने के लिए इस प्रथा को जन्म दिया। वे अपने बंदीग्रहों में बंदी क्षत्रिय सैनिकों से इस काम को करवाने लगे। कई पीढ़ियां मौत के भय से या सुविधा के लालच में इस काम को करती रहीं। धीरे-धीरे एक पूरा समुदाय तैयार हो गया। बाद में ये लोग भूल गए कि ये कौन हैं और इनके पूर्वज कौन थे? लेकिन इस परिकल्पना की ऐतिहासिकता को कुछ विद्वान मिथ्या मानते हैं। यह साजिश है हिंदू ब्राãवाद को निर्दोष और मुसलमानों को दोषी बनाने की। यदि ऐसा होता तो भगवान बुद्ध द्वारा भंगी सुणीत को धम्म-दीक्षा देने का विवरण क्यों मिलता। यह घटना २००५ वर्ष पहले की है और मुगलों को आए अभी ७०० वर्ष ही हुए हैं। दूसरी परिकल्पना में संजीव बताते हैं कि आर्यों  के आगमन के पूर्व यहां जो मूलनिवासी थे वही इनके पूर्वज थे। आर्यों ने इन्हें प्रत्येक क्षेत्र में बेरहमी से कुचला और इन्हें बद से बदतर कर दिया। पेट की ज्वाला बुझाने के लिए जो भी काम मिला उसे करते गए और भूल गए कि उनका गौरवपूर्ण इतिहास क्या है? बाद में इन्हें सफाई पेशा अपनाना पड़ा। तीसरी परिकल्पना में संजीव खुदशाह सफाई कर्मचारी समुदाय की ग्रामों में उनकी हैसियत से उनकी कड़ियां जोड़ते हैं ग्रामों से बाहर रहने वाले, अस्पृश्यता, अपमान और शोषण की मार झेलते ये लोग किस प्रकार घृणित पेशों को अपनाने के लिए मजबूर हुए। सिर पर मैला ढोना भी इन्हीं पेशों में एक पेशा रहा है।

 

 

तीसरे खंड में ही लेखक ने भंगी शब्द की व्याख्या, भंगी समुदाय का ऐतिहासिक उद्गम और उनका वर्तमान आदि बिंदुओं पर गहराई से जांच पड़ताल की है और इन बिंदुओं पर गहराई से जांच पड़ताल की है और इन बिंदुओं को भी उसने तीनों परिकल्पनाओं से जोड़ दिया है।"मैं भंगी हूं" के सुप्रसिद्ध दलित लेखक और चिंतक श्री भगवान का उल्लेख करते हुए इस किताब में कहा गया है कि आयों के भारत आगमन के बाद यहां के मूलनिवासियों में ऐसे लोग जिन्होंने आक्रमणकत्ताओं के समक्ष घुटने नहीं टेके, अपवित्र करार दिए गए। इन्हें दबाकर, कुचलकर आर्य यहां के मालिक बन गए किंतु मूल निवासी को भंगी कहा गया। बकौल ओमप्रकाश वाल्मीकि कहा गया है कि वाल्मीकि की परवरिश क्रथनी भंगन द्वारा किए जाने के कारण भंगियों ने वाल्मीकि को अपना गुरु मान लिया। इस बारे में संजीव ने लिखा है कि "भंगी इन्हें इसलिए कहा गया है क्योंकि ये आर्यो के वैदिक रस्मों-रिवाज मे रुकावट डालते थे, इन्हें भंग करते थे। इसलिए इन्हें भंगी कहा गया। संभवत: १४वीं शताब्दी में भंगी का पर्याय घृणित पेशा (सफाई काम) बना है। किन्तु इन्हें (घृणित पेशावालों को) भंगी क्यों कहा गया, यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।" अपनी किताब के तीसरे खंड में लेखक ने सफाई कामगारों के पौराणिक आधारों का विश्लेषण किया है जो दूसरे खंड का विस्तार ही है। चौथे खंड में लेखक ने ऐतिहासिक क्रम में सफाई कामगार समुदायके सामाजिक परिवेश में आई तब्दीलियों को रेखांकित करने की कोशिश की है।



इस किताब का अंतिम खंड बहुत महत्वपूर्ण है। इस खंड में लेखक ने सफाई कर्मचारी समुदायकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास यात्र को दर्शाया है। सफाई कर्मचारियों के बृहद समाज में संगठन चेतना का कई स्तरों पर विकास हुआ है। कुछ समूहों ने अपने पुराने डोम ऋषियों के नाम के आधार पर अपने संगठन बनाकर अपनी पहचान धार्मिक स्तर पर ज्यादा रही है। इसकी मुख्य वज़ह हिंदू धर्म की संकीर्णता, उसमें भेद-भाव और अस्पृश्यता की भावना रही है। इसी क्रम में दलितों द्वारा हिंदू धर्म को छोड़ दूसरे धर्मो को अपनाने के प्रयास को भी देखा जाना चाहिए। अपने सम्मान और अस्मिता को बचाए रखने की उनकी यह ज़द्दोज़हद दोनों स्तरों पर चलती आई है। धीरे-धीरे इन्हीं धार्मिक संगठनों की कोख से राजनीतिक संगठनों का भी जन्म हुआ जो उनके राजनीतिक सशक्तिकरण का आधार बने।

 

"सफाई कर्मचारी समुदाय" के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए मेहतर बैंककी स्थापना होना समूचे दलित समाज के इतिहास में एक अभूतपूर्ण घटना है। दलितोत्थान के केन्द्र नागपुर में स्थापित मेहतर बैंकपूरे राष्ट्र में इकलौता बैंक है जो मेहतरों के विकास का परचम ऊँचा किए हुए है। इसके लगभग ३००० सदस्य हैं और इसमें सदस्यों का जमा हिस्सा २,२५,,७८६.०० रु. हैं। इस बैंक के सदस्य सफाई कामगार ही हो सकते हैं, चाहे व किसी भी जाति के हों। सफाई कर्मचारी समुदाय को महाजनों, सूदखोरों के चंगुल से बचाने और उनके आर्थिक उत्थान में इस बैंक ने अभूतपूर्व भूमिका अदा की है। वह दिन दूर नहीं जब इस बैंक की शाखाएं महाराष्ट्र में ही, पूरे राष्ट्र में सफाई कर्मचारी समुदाय के आर्थिक उत्थान का परचम पहराएंगी।

 

संजीव खुदशाह ने अपनी इस किताब में एक बेहद विवादास्पद और शोधनीय विषय को भी उठाया। एक बार नहीं बल्कि कई बार उठाया है। उन्होंने किताब में कई जगहों पर सफाई कर्मचारियों के ऐतिहासिक उद्गम की जांच-पड़ताल करने के संदर्भ में उनका संबंध क्षत्रियों से जोड़ने की कोशिश की। यह सवाल वाकई विचारणीय और शोधनीय है कि सफाई कर्मचारी समुदायया दलित समुदाय के विभिन्न वर्गो का क्षत्रिय वर्ग से कोई संबंध है या नहीं। संजीव खुदशाह ने अपनी तरफ से इसके पक्ष में अपने तथ्य देने की भरसक कोशिश की है मगर वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते हैं क्योंकि यह सवाल अपने आप में एक बृहद शोध का विषय है।

 

इसके अलावा उन्होंने  कुछ ऐसे दिलचस्प तथ्य दिए हैं जो शायद पहली बार पढ़े जाएंगे। मसलन वह बताते हैं कि केवल ब्राह्मण ही अछूतों से घृणा नहीं करते रहे हैं बल्कि कुछ अछूत समुदाय भी ब्राह्मणों को अछूत मानते आए हैं। देश के अनेक भागों में यह आज भी उतना ही सच है। यह तथ्य भी अपने आप में नए हैं कि मेघालय में सिख भी वाल्मीकि हैं और पाकिस्तान में भी। ईजिप्ट में क्रिश्चियन मल ढोने का काम करते हैं, मुसलमान नहीं।

 

बहरहाल, वाल्मीकियों के उद्गम स्थान जहां भी हो लेकिन उनके साथ समाज ने घोर अन्याय किया है, अपमान किया है और यहां तक कि उन्हें अछूतों में अछूत की संज्ञा दे डाली। इन लोगों ने मानव समाज का सबसे कल्याणकारी काम किया है। अगर ये मैला साफ नहीं करते तो भयंकर बीमारियां फैलतीं। देखा जाए तो सही मायने में हलाल की कमाई इन्हीं लोगों ने की है। इनके उत्थान की जिम्मेदारी समाज की बनती है मगर भारतीय समाज ने इनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय इन्हें ही शोषित और अपमानित किया है। मगर यह सफाई कर्मचारी समुदाय की ही कूबत है कि उसने बड़ी हिम्मत से, संघर्ष करके अपना उत्थान खुद किया है।

 

सफाई कर्मचारी समुदाय की समूची विकास यात्र के विभिन्न आयामों को विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों के साथ सही परिप्रेक्ष्य में चित्रित करती संजीव खुदशाह की यह किताब बेहद प्रशंसनीय और पठनीय है।

                                                अपेक्षा जुलाई-सितम्बर, 2006 में प्रकाशित

 

 

किताब: सफाई कर्मचारी समुदाय, लेखक: संजीव खुदशाह, प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन-दिल्ली। 

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