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Sunday 21 July 2013

‘सच खड़ा है सामने’ : दिलीप अश्क की कविता


दलित जीवन की पीड़ा और विकास का प्रतिबिम्ब : दिलीप अश्क की कविता

मुकेश मानस

 

बहुत लम्बी प्रतीक्षा के बाद छप कर आ पाया है कवि दिलीप अश्क का कविता संग्रह। कम से कम मुझे तो उनकी कविताओं के संग्रह के रूप में छप कर आने का बहुत बेसब्री और बेचैनी से इंतजार था। आज हिन्दी साहित्य जगत में छपने की भी एक राजनीति हो गई और जो इस राजनीति में नहीं पड़ते, वे नहीं छपते। नहीं छपने वाले पढ़े नहीं जाते। उनकी वेदनाएं-संवेदनाएं, उनके ख्वाब, आकांक्षाएं सब पड़े रह जाते हैं कागजों में। छप जाने के बावजूद भी सैकड़ों उपेक्षित रहते हैं और कहीं दर्ज़ नहीं होते। फिर कभी इतिहास की छानबीन में किसी ईमानदार हाथों में पड़ जाएं तो अलग बात है। कसी अहम् या स्वार्थवश नहीं कर रहा हूं, मगर मैंने अब तक के अपने जीवन का एक लम्बा समय उनके साथ बिताया है, उनकी कविताएं सुनी हैं, रिकार्ड की हैं, दोस्तों को सुनाई हैं। इसलिए उनकी कविताओं के संग्रह की मुझे प्रतीक्षा थी।

 

उन्होंने अपने इस संग्रह का नाम रखा है सच खड़ा है सामने। हर कवि की कविताओं में उसके द्वारा जीये, देखे, अहसास किए गए जीवन का एक सच होता है, जो शब्दों के माध्यम से कविता के रूप में सामने आता है। यह उसके वस्तुगत जीवन की सच्चाईयां, इनमें उसका व्यक्तित्व, समाज और विश्व दृष्टिकोण होता है जो कविता में ढलता है। इसके साथ यह भी कहना चाहिए कि हर कवि का अपना एक वर्गीय सच भी होता है, जो चाहे-अनचाहे उसके सृजन में प्रकट हो जाता है। यानी कवि जिस जमीन से कविता लिख रहा है, जिस जमीन पर लिख रहा है वह जमीन कैसी है? उसका रूप क्या है? वह स्वरूप वैसा क्यों है? उसकी रचना में अन्तर्निहित विवेक दृष्टि और दिशा क्या है? ये सब बातें उसके वर्गीय बोध के स्वरूप और दिशा को उजागर करती हैं। आइये, कवि अश्क की कविता में इस अन्तर्निहित सच को खोजने, महसूस करने और समझने की कोशिश करें।

 

सच खड़ा है सामनेकी अधिकांश कविताओं में एक मैं है। उस मैंका एक जीवन यथार्थ है, सच्चाइयां, उसकी हताशा और संघर्ष है। यह मैंकवि और उसके जीवन की वस्तुगत सच्चाईयां उसका सच है। सवाल उठता है कि ये मैंकौन है। संग्रह की पहली कविता ही मैंशीर्षक की कविता है। यह आश्चर्यजनक है और महत्वपूर्ण है। इस पूरे संग्रह में इस मैंकी एक तस्वीर बनती है, जो हिन्दी कविता के बहुत सारे पहले के मैंसे काफी भिन्न है।

 

मैं हजारों तीरों से घायल

परिन्दे की तरह हूं

 

परिन्दा शांति, स्वतंत्रता और मानवता का प्रतीक है। मगर यह कैसा परिन्दा है जो हजारों तीरों से घायल है। एक नहीं, दो नहीं, हजारों तीरों से घायल है। ये हजारों तीर इस पर किस हृदयहीन, अमानवीय दुष्ट ने बरसाए हैं। यह सवाल बाद का है। पहले यह देखें कि यह परिन्दा है कौन? कहां का है? आइये कविताओं में तलाशें शायद कोई सुराग मिल जाये।

 

आबादी से दूर घिनौने वातावरण में

जहां फेंकते हैं

सभ्य कहे जाने वाले लोग

अपने घरों का कूड़ा

सूखता है जहां मरे पशुओं का मांस

खाते कौवे और कुत्ते

हवा में फैलती हैं बदबू

यहीं जन्मते हैं वे इंसान।

 

उफ ! घिन्न सी आती है। कैसा घिनौना है ये वातावरण और परिवेश, जहां यह मैंजन्म लेता है। यह सब आज के जमाने में सच हो सकता है क्या? शायद आज यह इतना सच न हो, किन्तु अविश्वसनीय तो हरगिज नहीं हो सकता। अभिजनों, सुविधा परस्तों, और सौंदर्यबोध के मारों के लिए यह अविश्वसनीय भी हो तो क्या कहा जाए। लेकिन यह आंख मूंदकर चलने वालों के लिए एक चुनौती है। यह भले हीभिजनों की सीमा से पार का यथार्थ है, जिसमें शायद ही वे अपने पूरे जीवन में कभी प्रवेश करते हों, घुसते भी हों तो नाक-भौं सिकोड़कर। पलभर आपका वहां ठहरना दूभर हो जाये। जो वहां जन्मता है, जीता है उसकी कैसी दयनीय हालत होगी?

 

आईना हूं मैं

अपमान

यातना-पीड़ा

विवशता

करूणा

अभाव स्पष्ट है

इसी से जन्मी है घृणा

अस्त-व्यस्त

गंदी बस्तियां

झुग्गी-झोंपड़ियां

यहां जन्मता है आदमी का बच्चा

सुअर और कुत्ते का स्वभाव लेकर

अजनबी नहीं हूं मैं।

 

वह अजनबी नहीं है। निश्चय ही वह अजनबी नहीं है। बेगानापन और अजनबीयत के इस घोर व्यवस्था और जमाने मे भी वह अजनबी नहीं है। एक पहचान है। उसको ढूंढने के लिए अब गांवों में भी जाने की भी जरूरत नहीं है। वह हर जगह, हर सिम्त आपको मिलेगा। वह पहचाना जा सकता है।

 

बकौल तुम्हारे

मैं एक जाति हो गया हूं

यानी याचना की

एक पहचान हो गया हूं।

 

जाति यहां किसी जाति विशेष का विशेषण नहीं है, बल्कि एक समूचे समुदाय का, समाज, देश का प्रतीक है जो रोजगार की तलाश में शहरों में पलायन करता है, गंदी-बस्तियों में रहता है याचना पूर्ण यापन करता है, कुंठा, गरीबी, भुखमरी, बेकारी, विवशता और अपमान भरा जीवन जीने को अभिशप्त है। आज जब भारत इक्कीसवीं सदी में जा रहा है। खुशहाली और विकास के डंके पीट रहा है, तब ऐसे में वह आबादी से दूर है, उसकी हालत दयनीय और अमानवीय है।

 

निर्धनों की बस्ती में

बढ़ती आबादी

इच्छाओं की घुटन

सीमित आय

बराबरी के लिए होड़ लगाता

पसीना चूसता कूड़ेदानों से कागज बीनता

आदमी का जिस्म।

 

यह कौन है जो बराबरी के लिए होड़ लगाता हुआ पसीना चूसने को विवश है। कूड़ेदान से कागज बीन रहा है। ये हमारे देश का अभिशप्त जन हैं। अभावों, अपमानों, वंचनाओं पीड़ाओं से भरा हुआ जन है। यह इस देश का गरीब, बदहाल फटेहाल आदमी है। गरीबी, फटेहाली और अभाव इसके शरीर में हजारों-हजार तीर बनकर चुभे हुए हैं। यह घायल है। कराह रहा है। इसके माथे पर शोषित और अपमानित होने की विवशता है। इंसानी वजूद के हक से महरूम है। यह आदमी अजनबी नहीं है इसकी पहचान है। यह वंचित है, शोषित है, सर्वहारा है। शोषितों में सबसे ज्यादा शोषित है, अपमानितों में सबसे ज्यादा अपमानित है। यह जन दलित है। दलित के अर्थ में अधिकतम। यह दोहरे अर्थ में शोषित, प्रताड़ित और वंचित है। इसी दलितजन कस सच दिलीप अश्क की कविता का सच है।

 

भारत के दबे-कुचले, शोषितों और वंचितों को साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति काले अंग्रेजों से मुक्ति नहीं मिली। आजाद भारत में वह समय नहीं आया जिसके ख्वाब दलितों और वंचितों ने देखे थे। पूंजीवादी व्यवस्था ने सामंतवादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था को नेस्तोनाबूद नहीं किया, बल्कि उसे थोड़ा कमजोर करके अपने साथ मिला लिया। देश के आम जन को भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी से मुक्ति नहीं मिली। उसे जातिवादी सभ्यता की शोषणकारी, अपमानित करने वाली अमानवीय चक्की से छुटकारा नहीं मिला। शोषण और अपमान के तमाम आधार बचे रहे। इनसे उसे मुक्ति नहीं मिली। गरीबी बची रही, जाति के नाम पर अपमान और जिल्लत बदस्तूर रही। समाजवादी मूल्यों का डंका पीटने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था का डंका पीटने के बावजूद। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने उन्हें कुछ अधिकार दिए, लेकिन सम्मान नहीं दिया, बराबरी नहीं दी मानमानवीय गौरव प्रदान नहीं किया। इस मायने में दिलीप अश्क दुस्साहसी हैं कि वे अपने अनुसूचित होने का विरोध करते हैं। संवैधानिक छलावों को नकारते हैं;

 

तुम्हारे व्याकरण की

निरर्थक शब्दों की सूची का अनुसूचित जीव नहीं रहूंगा।

 

निःसंदेह दिलीप अश्कदलित समाज के कवि हैं। उनकी पीड़ा, उनका अपमान, उनका शोषण, उनका अपना सच है। उनके सम्मान और गौरव का संकट उनका अपना संकट है। मैं संकीर्ण दकियानूसी जातिवादी नहीं हूं, मगर कहना पड़ रहा है कि यह दलित जाति या कानून की भाषा में जिसे अनुसूचित कहा जाता है, उसका बेमुखौटा, बेबाक सच है। इसके दमन, अपमान और शोषण का एक लम्बा और यातनापूर्ण इतिहास है। यह कवि दिलीप अश्क की बेबाकी और ईमानदारी है कि वे इसे अपने जीवन की अभावग्रस्तताओं, वंचनाओं और पीड़ाओं से जोड़कर देखते हैं।

 

मैं समय के साथ-साथ

थपेड़े खाते-खाते

यहां तक आया हूं

 

कितने घाव हैं उसके जीवन में, कितनी मुसीबतें हैं, कैसे-कैसे अपमान हैं, इनकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। जीवन में उसकी आस्था और विश्वास को लगातार ठोकर मारी गई है:

 

हमारी श्रद्धा को

निवर्सन कर

घुमाया

गांव-गांव

शहर-शहर

गली-बाजारों में तुमने

 

वह कहां-कहां अपमानित और शोषित नहीं है। वह हर प्रकार से सताया गया है। उसकी इज्जत पर हर कहीं दाग लगाया गया है।

 

देखा है मैंने

देवालयों और कोठों पर

छोटी जात और गरीब की बेटी को ही देखा है।

 

इससे बड़ी उसकी विवशता और इस देश की व्यवस्था की असफलता और क्या होगी कि उसे स्वतंत्राता का अधिकार तो मिला, मगर उसे मंदिर में जाने का सम्मान आज भी नहीं मिला है।

 

मैंने अपनी झुग्गी में

सजाकर रखी हैं तेरी तस्वीरें

और मैं तेरे महलनुमा

मंदिर में पैर नहीं रख सकता।

 

वह आज भी अस्पृश्य है। आज भी उसके माथे पर जाति का पट्टा चिपका हुआ है। उसे हर जगह उसकी जाति पूछी जाती है। अस्पृश्य होने की इस पीड़ा की दिलीप अश्क इस तरह व्यक्त करते हैं।

 

भगवान तुझे देखा नहीं जा सकता

तुझे छुआ नहीं जा सकता

तू भी अस्पृश्य है

मेरी ही तरह

फिर मुझसे घृणा तुझसे प्यार क्यों?

 

यह सवाल बहुत खतरनाक है। इसे हर कोई नहीं उठा सकता है। वही इसे उठाने का खतरा मोल ले सकता है, जिसके पास माद्दा हो। जिसे शोषण और अपमान से घृणा हो और समानता-मानवता से प्यार। इस मायने में दिलीप अश्क निरीहता के कवि नहीं हैं। वे मानवता के कवि हैं। मानवीय समानता के प्रेमी हैं। वे आस्था, विश्वास और संघर्ष के कवि हैं। निश्चय ही उनका यह स्वर मानवीयता में उनके विश्वास के कारण बनाता है। उनकी कविताओं में शोषण और अपमान के विरोध का सच्चा प्रतिरोध और संघर्ष है, जिसकी शक्ति उन्हें दलित आंदोलन से मिल रही है। वे दलितजन के आत्मसम्मान को जगा देने वाले कवि हैं। उनकी कविताओं में सदियों से संतप्त, सोये हुए आदमी को जगाकर उठाने वाली ममता भरी पुकार है।

 

उठ इस प्यास को

अब कोई नाम दे

और सिर्फ नाम से काम न चलेगा

उठ इस प्यास को

कोई सरंजाम दे।

 

अश्क जी की कविताएं दलित चेतना को झकझोर कर संघर्ष की राह पर प्रतिबद्ध होने के संघर्ष का आह्नान करती कविताएं हैं।

 

मथें दुख का सागर

निकालें उसमें से

विष चाहे अमृत

बन जाना चाहिए।

हम में से ही

किसी को शिव

 

दिलीप जी राजनीति विरोधी नहीं हैं, लेकिन वे शासक-शोषक वर्ग और इस व्यवस्था की चालबाज, स्वार्थी और अमानवीय राजनीति को अच्छी तरह से समझाते हैं। नोटों और वोटों की राजनीति गरीबों और दलितों का भला नहीं कर सकती।

 

नोटों की राजनीति में

वोटों की कढ़ाई में

भाषणों के शहद में

हड्डियों के ढेर पे

कुर्सी की मक्खी भिन-भिनाई।।

 

वह आज की पदलोलुप, स्वार्थी और भ्रष्टाचारी राजनीति के नारों और छलावों की असलियत खोजते हैं और सवाल पूछते हैं कि इस राजनीति के छलावों को कब तक सहा जाये।

 

हर पांचवे वर्ष में

झोंपड़ी की अस्मत लुटाकर

दूषित राजनीति के

बलात्कारों को सहते

मौसम के प्रवासी बगुलों के आश्वासनों पर

और कब तक विश्वास

करना होगा।

 

इस अमानवीय राजनीति के खिलाफ वे दलितों की एकता और संघर्षकारी चेतना को सामने लाते हैं। वे उस व्यापक सामाजिक बदलाव को फिर से कविता के एजेंडे पर लाते हैं, जिसके जरिए इन्सानियत का एक नया संविधान रचा जाएगा, समानता, सम्मान का स्वरूप खड़ा होगा।

 

कि प्रलय होगी

तब यहीं उगेगा सूरज

पर बात तय है

कि अगली बार

नहीं होगा मनुया कोई प्रथम पुरुष

नयी व्यवस्था का नायक।

 

निःसंदेह कवि दिलीप अश्क दलित समाज के कवि हैं। उनकी कविताओं में इस समाज और उसकी पीड़ा, वंचना और अभाव गहराई से अभिव्यक्त होते हैं। दलित समाज की असहनीय पीड़ाओं का अनुभव इन कविताओं में तमाम काव्य कौशल के उपादानों में व्यक्त होता है। इस संग्रह में उनके कई गीत हैं। वे कोई दकियानूसी जातिवादी कवि नहीं हैं। गरीब और दलित जैसे युग्मों का एक साथ अनेकों बार प्रयोग उनकी संवेदना की व्यापकता को दर्शाता है। वे मानवीय जीवन के सम्मान और गौरव को गुहार के कवि हैं। उनकी कविताओं की मुद्रा आक्रामक और स्टेटमेंटी नहीं हैं। उनकी कविताओं में भाषा सहज और आम है। भाषा की अभिजात्यता और उसका विधान उनका संकट नहीं है। उनकी अनुभूतियों में भाषा पृष्ठभूमि में अपना असर छोड़ती है। उनकी दृष्टि व्यापक और पैनी है और स्वर मानवीयता की मांग को कविता के एजेंडे पर लाने वाला है। वे नास्तिक नहीं है मगर उनकी आस्तिकता मानवता को प्रथम श्रेणी में रखने वाली आस्तिकता है। इंसान उनके लिए हर विश्वास से बड़ा है। कहना चाहिए कि मानव को मानवीय आस्थाओं और संघर्ष कारी चेतना से परिपूर्ण मानवतावादी, समतावादी कवि हैं।

 

तू विश्वास है

आस्था है

धर्म है, कर्म है।

जीवन का मर्म है

तू ही तो हरेक जिन्दा धड़कन का धाम है

तेरे हाथों में सुबह और शाम है।

तू दुनिया का पहला नाम है।

 

हम दलित, अक्टूबर, 2000 में प्र्काशित

 

 

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