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Sunday 21 July 2013

ठहराव के खिलाफ़ श्याम विमल की कविताएं


 

मुकेश मानस

 

 

मेरी कविताएं वृक्षों की फुनगियों पर

फूल होना चाहती हैं

अनाज बनकर भर जाना चाहती हैं

                                                            कनस्तरों में

डिब्बों में दाल होकर

परन्तु.../परन्तु उन गुस्सैल शब्दों का क्या करूं

जो कविताओं को पहले

हथियारबंद करना चाहते हैं

यथास्थिति के खिलाफ़

                                    पिछले कविता संग्रह इतना जो मिलासे

 

वे शब्द, जो यथास्थिति के खिलाफ सिर उठा सकें उससे लड़ सकें, जो जिन्दगी को फूल-सा महका सकें, जो भूखे आदमी के खाली कनस्तरों और डिब्बों में आटा-दाल-चावल होकर भर सकें, उन्हीं शब्दों को तरह-तरह के रंगों, रूपों, भावों और एक जन पक्षधर प्रतिबद्धता से संयोजित कर अपने पिछले कविता संग्रह इतना जो मिला¸ के प्रकाशन के लगभग पद्रह सालों के लम्बे अन्तराल के बाद अपने ताजे कविता संग्रह समय शब्द के औचित्य को जानता है के साथ पाठक के लेखे उपस्थित हुए हैं श्याम विमल।

 

हम ताजे रंग देखना चाहते हैं

अपने आस-पास

 

67 साल के हो चुके श्याम विमल का यह तीसरा कविता संग्रह है। इससे पहले उनके दो कविता संग्रह दीमक की भाषा (1970)¸ और इतना जो मिला (1983)¸ पुस्तकाकार होकर काव्यजगत में अपनी ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। यह अलग बात है कि काव्य जगत में आज भी उनकी अपेक्षित चर्चा नहीं होती। शायद इसलिए कि वह हर गुट से बाहर खड़े हैं आज हिन्दी जगत में जो भयानक गुटबंदी और खेमेबाजी नजर आती है उसके चलते श्याम विमल जैसे अनेक संवेदनशील और ईमानदार इंसानों का लगातार तमाम हथकंडे अपनाकर गैर-जरूरी फिल्ट्रेशन किया गया है जिससे हिन्दी कविता का कापफी नुकसान हुआ है मगर अपने जीवन के समूचे राजनीतिक-सामाजिक परिवेश में ताजे रंग देखने की उनकी इच्छा और उनके उपस्थित हो जाने की उनकी आशा अपने पूरे ताजेपन और मार्मिक संवेदनापूर्ण रंगों के साथ उनकी काव्य यात्र में व्यापक रूप से उपस्थित है।

 

शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन के सानिध्य में काव्य कर्म शुरू करने वाले, साठोत्तरी आंदोलनों से लेकर आज तक सदैव गुटबाजी और खेमेबंदी का विरोध करने वाले श्याम विमल जैसे लगातार काव्य क्षेत्र में गुटबाजी और व्यवहारिक संकीर्णता के विपक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। उनका मानना है कि साहित्यिक गुट होने चाहिए किन्तु संकीर्ण और अवसरवादी गुटबाजी साहित्य में नहीं होनी चाहिए। इसे नयी प्रतिभाओं का क्षरण होता है आज भी यह ईमानदार स्वर उसी प्रतिबद्धता के साथ वहीं है और उसी मुद्रा में। उनकी कविता, उनके स्वर आज भी खड़े हैं मुटठी तानकर अमानवीयता और व्यवस्था की क्रूरता के खिलाफ। वह आज भी जन आक्रोश के व्यापक रूप में उठ खड़े होने की कामना में रत रहती है।

 

मुझको ऐसी कविता न दो

जिसमें काम करने वाले पर मार पड़े

और वह चूं तक न करे

ईबारत तो सोती रहे नवाबजादों को लेकर

और मरने के लिए काम पर डटा रहे आदमी

                                                मुझको ऐसी कविता न दो।

 

कवि का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश उसकी कविता के जरिए उसके विचारों की भाव भूमि पर शब्दों की शक्ल में उतरता है। कवि के परिवेशजन्य यथार्थ और काव्यात्मक अभिव्यक्ति में जो अंतद्र्वन्द्व होता है, वही उसकी मनोभूमि को व्याख्यायित और परिभाषित करता है। परिवेशजन्य परिस्थितियां, उनके अनुभव, अनुभवों की प्रासंगिकता कवि के रचनात्मक जगत को प्रभावित करते हैं। रचना और विवेक साथ-साथ या आगे-पीछे चलकर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। श्याम विमल इस अंतद्र्वन्द्व से लगातार उबरने की कोशिश में मुक्ति के अनेक मार्गों की रचना करते हैं, संघर्ष के विविध रूपों की पहचान करते हैं यहीं से चलकर उनकी कविता एक व्यापक फलक पर फैलकर सर्वग्राहय हो जाती है। इस पूरे दौर में कवि भयानक वेदना और छटपटाहट से गुजरता है और उसकी अर्थवान अभिव्यक्ति इस कविता संग्रह की अनेक कविताओं में उपस्थित है।

 

यह कवि अपनी सभी कविताओं में अपने समय और समाज में व्याप्त और लगातार जटिल होती जा रही विसंगतिपूर्ण परिस्थितियों के तनाव से परेशान नजर आता है। वह लगातार महसूस करता है कि आम आदमी लगातार अमानवीय परिस्थितियों की ओर धकेला जा रहा है। उसे लगातार इस तरह तोड़ा जा रहा है कि वह लगातार उपेक्षित और शोषित हो रहा है। दीन-हीन-अभिशप्त के पक्ष का सवाल कवि बार-बार दुहरा कर जैसे समाज में व्याप्त जन विरोधी माहौल को उकेरता है:

 

विरही मन का

दीन हीन अभिशप्त जन का

कौन लेता पक्ष

यह दीन-हीन अभिशप्त का जीवन है जो श्याम विमल की काव्य भूमि के केद्र में है। इस जीवन को बिन पैठे देखना, रचना कवि और कविता दोनों को तटस्थ भूमिका में खड़ा कर सकती है। मगर श्याम विमल यहां सचेत दिखते हैं। दीन हीन जन के बल पर सत्ता तक पहुंचने वाला शासक वर्ग अब अपना समाजवादी बिल्ला उतार चुका है और अपने खूनी पंजे पैना रहा है। सामंती अवशेषों को जिंदा रखकर, उसे कमजोर करके लगातार भूख और बेरोजगारी के खिलाफ सड़कों पर उतरकर संघर्ष करती जनता का खून करके वह लगातार तरक्की कर रहा है। इधर आम आदमी घुटनभरी, बदहाल जिन्दगी जीने को अभिशप्त है। सागर, फूल, चिड़िया उसको चिढ़ा रहे हैं। अवसरवाद मध्यवर्ग की प्रगतिशील ताकतों की आंखों में समा चुका है, नारों का रंग उतर चुका है। चारों ओर भयानक लूट-खसोट और हिंसा जारी है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपने पिछले पंजे और मुखौटे उतार चुके हैं। धार्मिक दंगों में, मंहगाई में, फासीवादी तनाव में, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी में, धब्बेदार आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में सब कुछ टूट रहा है आदमी, चेतना, समाज। सत्ता के पक्षधर और सत्ता वर्ग हर चीज को बाजारू बना देने पर आमादा होते हुए शोषण के भयानक से भयानक रूप लेकर जनता के बीच उतर रहा है। वह आम आदमी का शोषण करने के लिए नित नए मुखौटे बदल रहा है। उसकी हकीकत लगातार भयानक होती जा रही है। यह उसी के विस्तार का नतीजा है कि आदमी का दुश्मन होता जा रहा है।

 

तू जंगल का एक हिस्सा हो जाती है

जब जाति से जानवर हुआ प्राणि

शिकारी की हैसियत लेकर

अपनों का शिकार करने लगती है।

 

यह नारा नहीं है, यह कविता है। शोषणकारी व्यवस्था के विविध रूपों की पहचान का एक धारदार हथियार। यह जीवन में पैठकर देखने वालों कीदृष्टि में समाया हुआ यथार्थ है। जीवन की पीड़ा से गुजरता, उसको खोलना, कारणों को उजागर करना, वहां से जन जन को रास्ता तलाशने की प्रेरणा की ओर ले जाती हैं यह कविताएं। शहरी जीवन में विज्ञान और तकनीक की अनावश्यक और उपभोक्तावादी बढ़त ने व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी को बढ़ाया है। पूंजीवाद अपने साथ व्यक्तिवादी, अलगाववादी सांस्कृतिक मानसिकता लेकर आता है जिसका सबसे ज्यादा शिकार मेहनतकश जनता होती है। शहर खूनी दस्ताने चढ़ाकर गांवों को, जन-जन की ताकत को, उसकी संघर्षशील सामूहिक चेतना को लील रहा है। आदमी श्रमिक, बेरोजगार और वेश्या होकर पिस रहा है। तरस रहा है

           

खुली हवा में सांस लेने को। मूल्यों के पतन की बढ़ती घुटन लगातार बढ़ रही है। विषमता की चौड़ी होती खाई उसके भीतर अंधेरे की किरच बनकर धंस रही है उसके दिलो-दिमाग को चीरती, काटती-छांटती। आज जब अधिकतर कवि महानगरीय बोध से उत्पन्न निराशा में गोते लगाते हैं और इससे उबरने के लिए वे आत्मालाप करने को विवश होते हैं। ऐसे में श्याम विमल की खासियत यह है कि वे महानगरीय बोध के एकालापी अंधेरे बंद कमरे में चक्कर नहीं लगाते हैं और न ही फूलों और चिड़िया को अपनी आशा का केद्र बनाते हैं। उनकी नजर आम आदमी की विवशता और उसके लिए जिम्मेदार सत्ता वर्ग को पहचान लेती है

                       

                        आज भी वे वहीं हैं

                        ...... पुटठों की ताकत

                        सकत हाथों की

            ढली है

                        केवल बस्ती/इनकी/जिंदगी तो अधजली है

                        हासिल जो हैं बच्चे/पैबद से टंग गए हैं गुदड़ी में

                        लाल ये क्या बनेंगे

           ऊपर जब टुच्चे हैं

 

बच्चे और औरत इस संस्कृति के सबसे पहले शिकार होते हैं। बच्चे गरीबी की मार सहकर काम करते हुए बचपन को घिसने को अभिशप्त होते हैं। बाल संवेदना से हीन स्कूल उन्हें लगातार बाहर ठेलते हैं। उनके नाम पर चलाई जाने वाली सारी योजनाएं उनके परिवार की भूख के आगे नाकामयाब साबित होती हैं:

                       

                        बच्चा नहीं जानता

                        रोटी के आगे क्या लिखना है

                        वह तो बोलना जानता है

                        मां.....भूख

 

सामंतवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था लगातार औरत की आकांक्षाओं और आजादी को लगातार कुचलती रही। सामंती अवशेषों को जीवित रख पूंजीवादी शासक वर्ग ने उस पर होने वाली जुल्मों सितम की कहानी को बदस्तूर जारी रहने दिया। पूंजीवादी व्यवस्था ने भी औरत को वायवीय स्वतंत्रता देकर उसे उपभोगीय वस्तु ही बनाकर रखा। वह आज भी लगातार भिन्न रूपों में शोषित है। औरत के जीवन की विडम्बनापूर्ण परिस्थितियों के श्याम विमल बड़े ही मार्मिक चित्र उकेरते हैं :

                        फिर वह / मां बनी / नानी बनी / दादी बनी

                        यूं ढली गई / और एक दिन / फ्रेम में चली गई

 

शहरी सभ्यता को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला आम आदमी लगातार दुखों और अभावों में जीवन जी रहा है। उसका जीवन अंधेरे बंद कमरे जैसा है :

                       

            कोई खिड़की नहीं / भीतर की रुकी हुई हवा

                        बाहर की हवा से नहीं मिल पाती

                        रौशनदान तक नहीं है / बाहर की रौशनी

                        तुम तक नहीं पहुंच पाती

शहरी सभ्यता का यह निम्न या आम आदमी ही शहरीली अमानवीयता के चाकू की धार को कुंठित कर सकता है मगर वह अपनी भूख और अपने अभावों से जूझ रहा है। शहरी सभ्यता की अलगावादी मार उस की ताकत को कुंठित कर रही है। अलगाववादी मानसिकता इतनी बढ़ गई है कि दिन दहाड़े आम आदमी की हत्या होती है और लोग देखते रह जाते हैं :

                       

            हम देखते रहे / चाकू किसी के पेट में भोंका.....

                        पेट से खून की धार बह निकली / हम चुपचाप

                        हमारे पांव घटनास्थल से हमें लेकर / चल पड़े

                        और जमाने को कोसते हुए

                        हम तितर-बितर हो गए

 

मानवीय हत्याओं के प्रति ऐसी निरीहता पूंजीवादी संस्कृति की देन है। पेट की भूख और अभावों में जीता आदमी यथास्थिति में जीने को अभिशप्त रहता है। मगर श्याम विमल यहां नहीं रुकते। वे मानवीयता जड़ता और यथास्थिति की सामाजिक परिस्थितियों की चट~टानों को तोड़ते हैं। वे इस ठहराव से मानवीय मुक्ति के रास्ते निकालते हैं। एक रास्ता वापसी का रास्ता तय करता है और पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा फैलाये जाने वाले धार्मिक पुनर्उत्थान, अध्यात्मिकतावादी रूझान की तरफ कदम बढ़ाता है यहां कवि ठेठ भौतिकवादी वस्तुवादी समझ के साथ उपस्थित होते हैं। यह पूंजीवादी शोषण के खिलाफ हथियारबंद होते शब्दों की चेतना को कुंद करने के षडयंत्र को खोलने और उससे बचने का रास्ता है। अध्यात्मिक चेतना में लौटने पर भी वह अपने परिवेश से कटता नहीं है। परिवेश जिसमें हर ओर भूख व्याप्त है, इच्छाओं का दमन व्याप्त है। सांस्कृतिक जीवन की वापसी की छटपटाहट मौजूद है। बच्चों का भूख से तड़पना, औरतों का फ्रेम में जाना, उनका वेश्याओं में बदल जाना व्याप्त है। कवि के पास मां की वेदना और उसकी मौत से पैदा हुई करूणा है उसकी आंखे यथार्थ की क्रूरता को देख लेती हैं :

                       

             ये जो आंखें तुम्हें मिलें

                        ईश्वर करे इन्हें वो सब ना देखना पड़े

                        जो इन्होंने देखा था

                        इन्होंने देखा था : देश विभाजन / इन्सानों की कटी लाशों को

                        सड़क दुर्घटनाओं में तड़पता हुआ एक असहाय जिस्म

                        स्टोव की आग में बगूला बनी नारी देह को

                        भूख से बिलखते बच्चे का कंकाल

                        बेरोजगारी से बेजार

                        आत्मदाह करते युवक को भी देखा था।

 

धार्मिक पुनर्उत्थान और झूठी अध्यात्मिकता के जालों को काटकर यहीं से कवि दूसरा सप+फर तय करता है। सदियों से जुल्म के खिलाफ उंगलियां भींचकर तनती मुट~ठी का सफर, शोषण के खिलाफ बनते-बिगड़ते कीलों वाले चेहरे का सफर। यह शोषण, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बच्चों, युवकों औरतों और श्रमिकों का चेहरा है जो लगातार बन रहा है। कभी तेलंगाना और कभी नक्सलबाड़ी में बनता बिगड़ता रहा है यह चेहरा। इस चेहरे के पूर्ण होने की अभिलाषा कवि की आखिरी अभिलाषा है जिसके लिए वह धर्म आस्तिकता, अध्यात्यम, सौंदर्य सबको त्याग देने को तत्पर है। यह चेहरा दीन-हीन अभिशप्त जन का चेहरा है, जिसको लगातार छला जा रहा है और जिसके प्रति प्यार उनकी कविताओं में मचल रहा है। कहा जा रहा है कि आजकल का समय सृजन विरोधी है। यथार्थ इतना जटिल हो गया है कि शब्द उनकी अभिव्यक्त कर पाने में असमर्थ साबित हो रहे हैं।

 

समाज के सभी सृजनधर्मी गलियारों में निराशा, अवसाद और यथास्थितिवाद जड़ जमा रहा है। यहां इतना ही कहना काफी है कि निराशा, अवसाद और यथास्थितिवाद का वास्तविक विरोध रचना और रचनाकार की दीन-हीन अभिशप्त जन जीवन में समायी व्यापक दृष्टि ही हो सकती है। समर्थ और अनुभवी रचनाकार जनता की ताकत को पहचानते हैं और उसकी सृजनधर्मी कौशल की निरंतरता को। आज के भयावह दौर की स्थिति को व्यक्त करने में शब्द भले ही कमजोर पड़ जाएं परन्तु वे अपनी सृजनात्मकता और औचित्य में कमजोर नहीं पड़ते। ऐसी ही व्यापक और आशाओं भरी दृष्टि श्याम विमल की कविताओं में दिखाई पड़ती है। जनता की सृजनधर्मी चेतना की निरंतरता में विश्वास करने के कारण ही यह कवि विवेक और दृष्टि समाज में व्याप्त शोषण विरोधी परिस्थितियों के खिलाफ बनते व्यापक जन के संघर्ष रूप को देख पाते है। अपनी जन दृष्टि के कारण ही वे लगातार संघर्ष करती जनता के चेहरे को बनता देख पाते हैं। उन्हें आशा है कि इस बार अगर इस चेहरे की पूरी तस्वीर बनी तो वह पिछली सब तस्वीरों से जानदार होगी :

                       

            एक चेहरा बन रहा है

                        चेहरा जो बन रहा है इसके / खुरदुरे माथे पर

                        भविष्य का दांव फिसलेगा नहीं

                        यह माथा किसी गलत प्रार्थना के लिए / झुकेगा नहीं

                        इसकी लकीरें सही विचारों को अंकित करेंगी

                        यह जो चेहरा बनेगा / जानदार होगा यह

                        आइने में नहीं / आमने-सामने देखेगा

 

कवि का यथास्थिति के खिलाफ, ठहराव के खिलाफ एक मात्र हथियार है, प्रेरणास्रोत है यह बनता चेहरा जो जनता की लगातार संगठित होती संघर्षशील चेतना का प्रतीक है। इसी से कविमन में आशा जनम लेती है। आशा है समाज एक ना एक दिन बदलेगा, वह अपने विद्रूपता पूर्ण मुखौटे को उतार फैंकेगा। जिस दिन ऐसा होगा, कवि भले ही न रहे मगर उसकी कविता होगी, उसके शब्द होंगे उसका रचना संसार होगा। इस संग्रह की आखिरी कवि इसी आशा की भाव भूमि है

 

 

 

फूल जरूर खिलेंगे/

मैं नहीं सूंघ पाऊंगा तो क्या

आप तो होंगे

रोटी जरूर पकेगी/ मैं नहीं खा पाऊंगा तो क्या

आप तो होंगे

देखना खुशियां जरूर लौटेंगी/ मैं नहीं होऊंगा तो क्या

आप तो होंगे

 

यहां आकर समय शब्द के औचित्य को जान लेगा। शब्द जो यथास्थिति के खिलाफ खड़े थे, खड़े हैं और खड़े रहेंगे। ठीक ऐसे ही जनता का बनता चेहरा पूंजीवादी भेडिये के पंजे तोड़ता था, तोड़ता है, तोड़ता रहेगा जब तक खुशियां लौट न आएं। विरोध है, निषेध है, निर्माण है इस चेहरे में। कवि भी अपने को इसी चेहरे का एक हिस्सा मानता है। यह मात्र शब्दाडंबर नहीं, शब्दाडंबर से मुक्ति और मुक्ति के लिए संघर्ष की कामना है। जो इस संग्रह में शुरू से लेकर आखिर तक उपस्थित है।

 

इस काव्य संग्रह की कविताओं की उम्र सन साठ से अठानवे के लंबे दौर में समायी है। इस बीच शोषण का रूप और भी क्रूर हुआ है मगर उसके खिलाफ तनी हुई मुट~ठी भी मजबूत हुई है। इन कविताओं में कवि के संवेदनात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान का लगातार विकसित होता रचनात्मक जगत उसकी भावभूमि और भाषा भी है। कविताओं की भाव भूमि के अनेकों भिन्न स्वरूप हैं। औरतें और बच्चों पर लिखी उनकी कविताएं खासी प्रभावशाली है। यहां अनेक गीतनुमा और पदबंधी शैली में रचित कविताएं है। श्याम विमल में नए-नए शब्द गढ़ने, उनकी गहराई तक जाकर मार्मिकता तलाशने की जबरदस्त प्रतिभा है। हिंदी कविता की आधुनिक धारा को उनका यह अवदान महत्वपूर्ण है। उनमें पूंजीवादी के मायाजाली सौंदर्य बोध को तोड़ने और प्रतीकों, बिम्बों, भाव भूमियों की नवीन भूमि तलाशने की छटपटाहट है। कई जगहों पर बिम्बों और प्रतीकों के सफल और सुंदर प्रयोग हैं। कुछ कविताओं में रोमानीयन है किन्तु यह गहरा और जटिल है। कुछ कविताओं में कुछ आध्यात्मिक फुट भी है जो स्वाभाविक है किन्तु इनमें उलझाव और वायवीयता नहीं है। श्याम विमल की कविताओं में उत्तेजक और तीव्र विद्रोह की मुद्राएं नहीं हैं और न ही वहां ठहराव है। वहां जितनी निराशा है उससे कहीं ज्यादा सुंदर भविष्य की आशा है।

1999 मे श्याम विमल की कविता पर लिखा गया यह लेख मूलत: उनके कविता संग्रह समय शब्द के औचित्य को जानता हैपर आधारित है।

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