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Saturday 14 December 2013

सुरक्षित हाथ भी सुरक्षित नहीं हैं

सुरक्षित हाथ भी सुरक्षित नहीं हैं
(रेप इन दा सेफ़ हेन्ड्स पर कुछ विचार)

मुकेश मानस



-    इस फिल्म को जब मैंने एक गहरी मानसिक तैयारी के साथ देखा। यह मेरे जीवन की पहली ऐसी फिल्म है जिसे देखने से पहले ही मुझे एक गहरे ‘झटके’ से गुज़रना पड़ा। इस फिल्म को देखने से पहले ही मुझे एक तेज धक्का लगा बिल्कुल बिजली के करंट जैसा। और ये झटका दिया मुझे इस फ़िल्म के शीर्षक ने। फ़िल्म देखने से पहले ही मुझे इसके शीर्षक ने हमारे भारतीय परिवारों की बेहद कड़वी सच्चाई से रुबरु करवा दिया। ऐसा नहीं है कि इस सच्चाई से मैं वाकिफ़ नहीं हूँ। मैं किसी हद तक वाकिफ़ हूँ। मगर उस सच्चाई को ‘एक तथ्य की तरह जानना’ एक ऐसी बात थी जिससे रुबरु होने में मुझे धक्का लगा। इस फ़िल्म का शीर्षक ही बहुत ‘शाकिंग’ है। इसमें एक गहरा शाक भी है और एक गहरा व्यंग्य भी। बहुत कम फ़िल्मों के शीर्षकों में ऐसा व्यंग्य होता है। यह फ़िल्म उन्हीं से से एक है।

-    माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदारों से मिलकर बना परिवार किसी भी बच्चे के लिए स्वाभाविक रुप से पहला और सबसे ज्यादा सुरक्षित और उपजाऊ स्थान होता है। परिवार के प्यार, देखभाल और सुरक्षा के दायरे में ही कोई बच्चा फलता-फूलता और विकसित होता है। अगर ऐसे परिवार में कोई बच्चा खास तौर पर एक लड़की असुरक्षित हो तो पहले पहल तो हमारी मानसिक-सांस्कृतिक बुनाबट हमें यह मानने ही नहीं देती कि ऐसा हो सकता है। या हम यह मान लेते हैं कि थोड़े बहुत परिवरों में ही ऐसा होता होगा। लेकिन जब यही बात हमारे सामने एक तथ्यात्मक सच की तरह आती है तो हमें यह जानकर हमें धक्का लगता है।


-    कई साल पहले महिलाओं की जाग्रति और सशक्तिकरण का काम करने वाली एक संस्था ‘जागोरी’ ने एक रिपोर्ट निकाली थी जिसमें उन्होंने बताया था कि ज़्यादातर भारतीय ग्रामीण परिवारों में पतियों द्वारा पत्नियों के साथ शारीरिक समबन्ध बनाने के नाम पर उनका ‘रेप’ किया जाता है क्योंकि यह उनकी मर्ज़ी के बिना या उन पर दवाब बनाने के लिए किया जाता है। उसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि ज़्यादातर परिवारों में पतियों के अलावा पत्नियों के साथ परिवार के अन्य लोगों द्वारा भी इस तरह की हरकत की जाती है। यह एक चौकाने वाला तथ्य था। इसी तरह की एक रिपोर्ट बच्चे-बच्चियों के लिए काम करने वाली एक संस्था (नाम मैं भूल गया) ने भी निकाली थी जिसमें उसने बताया था कि छोटी उम्र की लड़कियों के साथ होने वाले ज़्यादातर बलात्कार परिवार के सद्स्यों या जान-पहचान वाले व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता है। यह तथ्य एक ‘झटके’ की तरह था जिसने लड़कियों को लक्ष्मी, सरस्वती की उपमा देकर ‘देवी’ मानने वाले भारतीय परिवारों की सड़ांध मारती सच्चाई को प्याज के छिलकों की तरह खोलकर रख दिया। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे मानना इतना आसान नहीं है। लेकिन तथ्य तो यही है। और आज तो यह और ज़्यादा सच हो रहा है। हम रोज़-रोज़ अब ऐसी खबरें अखबारों में पढ़ते ही रहते हैं। यह फिल्म इसी सच्चाई को एक तथ्य की तरह पेश करती है।

-    इस फ़िल्म की कहानी एक ऐसी ही लड़की की कहानी है जो अपने ही परिवार में असुरक्षित है और परिवार के ही एक सद्स्य, अपने भाई द्वारा दैहिक शोषण का शिकार होती है। यही है इस फ़िल्म के शीर्षक में छुपा सच और उसी सच पर व्यंग्य है इस फ़िल्म का शीर्षक। इसलिए इस फ़िल्म का शीर्षक बड़ा गहरा है। यह परिवार पर व्यंग्य है, यह समाज पर व्यंग्य है जिसमें कोई लड़की, कोई महिला सुरक्षित नहीं है।

-    लेकिन बात इतनी सी नहीं है। अगर इतनी ही बात होती तो यह फ़िल्म महत्वपूर्ण न होती। यह एक बेहद सामन्य फ़िल्म होती। लेकिन यह फ़िल्म सामान्य फ़िल्म नहीं है। यह एक असाधारण फ़िल्म है। यह फ़िल्म महज़ इसलिए असाधारण नहीं है कि यह एक ऐसी सच्चाई को हमारे सामने लाती है जिसे हम नहीं जानते है। या हम इस सच्चाई को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। यह फ़िल्म इसलिए असाधारण है कि यह ‘उस मानसिकता के निर्माण और उसके विकास की स्थितियों’ को उजागर करती है जिनसे संचालित होकर हम न सिर्फ़ इस सच को स्वीकार करने से इंकार कर देते है बल्कि उसे झुठलाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते हैं। और ये हथकंडे क्या हैं? ये शायद हम सब जानते हैं। हम परिवार, खानदान, रिश्ता, उम्र, जाति, धर्म की इज़्ज़त और प्रतिष्ठा के नाम पर इस ‘सच’ से इन्कार करते हैं और उसे झुठलाते हैं। इसी मानसिकता के कारण हम मानते हैं कि पिता अपनी बेटी का बलात्कार कर ही नहीं सकता, भाई अपनी बहन का दैहिक शोषण कर ही नहीं सकता। लेकिन ऐसा प्रयास सिर्फ़ परिवार वाले या शोषण करने वाला परिवार का सदस्य ही नहीं करते बल्कि बहुत बार शोषित होने वाला भी इसी मानसिकता से ग्रस्त होकर परिवार की इज़्ज़त को बचाने के नाम पर अपने शोषण के सच को अभिव्यक्त नहीं करता या उसे उससे अभिव्यक्त करने से बचता रहता है।

-    फ़िल्म को देख लेने  के बाद मैं सोच रहा था कि फ़िल्म के आखिर में सलोनी जब सुमित को कहती है कि वह सिर्फ़ इसलिए बचा हुआ है क्योंकि उसने अपने मां-बाप को बताया नहीं है कि वह उसके साथ क्या करता है। तो मुझे लगता है कि सलोनी एक भ्रम की शिकार है। शायद इस भ्रम की शिकार हमारे समाज की हर लड़की होती होगी। अगर सलोनी इस सच को अपने मां-बाप को बताती तो क्या दिन-रात सुमित का गुणगान करने वाले उसके मां-बाप उसकी बात को सच मान लेते? उदाहरण इस फ़िल्म के भीतर ही मौजूद है। सलोनी की चाची अपने बेटे की हरकत को जान लेने के बाद भी  चुप ही रहती है। फिर भी अपवाद हो सकते हैं। मगर मुझे नहीं लगता कि एक आम भारतीय परिवार के माता-पिता इस सच को आसानी से स्वीकार कर लेंगे। बल्कि इसके बरक्स यह भी हो सकता है कि वे लड़की को ही शक के घेरे में ले आयें। मुझे लगता है कि सच्चाई यही है कि ज़्यादातर मामलों में लड़की पर ही शक की सूई उठने लगी। वजह हमारे परिवारों की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक बुनावट में ही है जिसमें स्त्री का स्थान आज भी दोयम दर्ज़े का है, जिसमें वह बराबरी, आज़ादी और सम्मान की हकदार ही नहीं मानी जाती है। उस पर शक करना आज भी बेहद आसान बात है। सलोनी खुद भी एक भ्रम की शिकार है कि उसने ज़ुबान ना खोलकर दो परिवारों को टूटने से और उनकी इज़्ज़त को बिखरने से बचा लिया है। लेकिन किस परिवार को बचाया सलोनी ने जिसमें उसकी खुद की इज़्ज़त दांव पर लगी हुई है। कौन सा परिवार बचाया सलोनी ने जिसमें वह खुद असुरक्षित है।

-    मुझे लगता है कि ये फ़िल्म और ज़्यादा गहरी और और ज़्यादा मार्मिक हो सकती थी अगर इसमें सलोनी के सच कह देने के बाद की परिस्थितियों को दिखाया गया होता। तब हमारे सामने भारतीय परिवारों की मानसिक और सांस्कृतिक बुनावट का संक्रमणशील और द्वन्द्वात्मक चेहरा आ पाता। लेकिन फ़िल्म के डायरेक्टर यह काम हमारे लिए छोड़ देते हैं ताकि हम खुद अपने ग़रेबान में झांक सकें। लेकिन डायरेक्टर का काम बड़ा गहरा और बड़ा होता। उसका काम सिर्फ़ सच्चाई को दिखाना ही नहीं होता बल्कि समाज को एक रास्ता दिखाना भी होता है। मैं खुद भी एक हद तक इसी बात का कायल हूँ। इसलिए इस फ़िल्म के डायरेक्टर सलोनी के विद्रोह को दिखाकर एक सकारात्मक रुख की तरफ़ इशारा करके इस फ़िल्म का समापन कर देते हैं।

-    बहुत साल पहले लड़कियों और महिलाओं के लिए काम करने वाली एक संस्था ने एक ऐसी कार्यशाला की थी जिसमें उन्होंने कम उम्र की लड़कियों को यह सिखाया था कि वे अवांछित छुअन को कैसे महसूस कर सकती हैं और कैसे अवांछित छुअन से अपना बचाव कर सकती हैं। मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि इस फ़िल्म के डायरेक्टर ने इस फ़िल्म में यह दर्शाने की भरपूर कोशिश की है। अपने भाई के अवांछित छुअन को सलोनी महसूस करती है और उसका प्रतिकार भी करती। इस फ़िल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जिनमें हम सलोनी के प्रतिकार को देखते हैं और फ़िल्म के अंत में यही प्रतिकार सलोनी के विद्रोह के रूप में फूट पड़ता है।

-    फ़िल्म दृश्य बिम्बों की विधा है। इसलिए यह विधा ज़्यादा मारक और जीवंत होती है। मैं फ़िल्म विधा की तकनीक का जानकार नहीं हूँ मगर इस फ़िल्म के डायरेक्टर श्री योगी की तारीफ़ करूंगा कि उन्होंने इस छोटी सी फ़िल्म में भी फ़िल्म विधा की तकनीक का गहरा और कलात्मक प्रयोग किया है। और यह काम कोई मंझा हुआ डायरेक्टर ही कर सकता है। और कहने की जरुरत नहीं कि श्री योगी एक सिद्धस्त डायरेक्टर । मैं श्री योगी को इतनी सार्थक और महत्वपूर्ण बधायी देता हूँ। दोस्तो फ़िल्म एक अकेले व्यक्ति का काम नहीं हैं यह एक सामूहिक सृजन है। इसमें डायरेक्टर और अभिनेताओं के अलावा पर्दे के पीछे रहने वाली एक बड़ी टीम होती है। योगीजी की इस टीम ने बहुत्त ही ज़बर्द्स्त काम किया है। यह उस टीम का ही नतीजा है इस फिल्म में हर चीज में बेहद समन्वय है। मैं योगीजी की पूरी टीम का सिज़दा करता हूँ और कहता हूँ कि इस बेहद बढ़िया फ़िल्म के निर्माण के लिए उनकी टीम के सभी सद्स्य बधायी के पूरे हकदार हैं।                     

                                                                                         25/10/2013          


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