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Monday 3 February 2014

जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण




 जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण : स्वतंत्र मिश्र


मुकेश मानस




आजकल जब ज्यादातर पत्रकार और पत्रकारिता की दुनिया निरुद्देश्यता और असंवेदनशीलता की शिकार होती दीख रही है ऐसे में किसी पत्रकार की पर्यावरण और उससे जुड़े मसलों पर एक गंभीर किताब का आना इस बात की ताकीद करती है कि पत्रकारिता की चकाचौंध भरी दुनिया में अभी भी कुछ ऐसे लोग मौजूद हैं जिनकी पत्रकारिता के केन्द्र में सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदना और चिन्ता बाकी है। स्वतंत्र मिश्र एक ऐसे ही पत्रकार हैं। हाल ही में आई उनकी पहली किताब ‘जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण’ सामाजिक  सरोकारों के प्रति उनकी संवेदना और समझ का आईना है।
पर्यावरण और उससे जुड़े मसलों पर अभी तक मैंने जितनी किताबें देखी है उनमें से ज्यादतर इकहरी किताबें हैं। इकहरी इस मायने में कि वे आमतौर पर पर्यावरण के किसी एक ही मसले पर या किसी मसले के एक ही पहलू केन्द्रित हैं। ये सभी किताबें दर्शाती हैं कि पर्यावरण को समझने की हमारी समझ भी ऐसी ही है। हम पर्यावरण को, उसके विनाश को या पर्यावरण की समस्यायों को एक ही तरह से देखते हैं जबकि यह मसला एक बहुआयामी और बहुस्तरीय है। स्वतंत्र मिश्र की यह किताब इस मायने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब है कि यह पर्यावरण, उसके विनाश और उससे पैदा हो रही समस्यायों के बहुआयामी और बहुस्तरीय रूपों से हमें रुबरु कराती है।
हम सभी जानते हैं कि अपने आपको सुरक्षित रखने और पृथ्वी पर खुद को स्थापित करने के लिए मनुष्य ने प्रकृति के साथ एक लम्बा संघर्ष किया जिसके फल्स्वरूप उसने प्रकृति पर विजय पायी। उसने जंगल काटे, खेती शुरु की, घर बनाये, नगर बसाये और अपनी सुविधा के लिए प्रकृति को नियंत्रित किया। प्रकृति पर अपनी विजय के इस अहसास ने मनुष्य को इतना उन्मादी बना दिया कि उसने प्रकृति का ही विनाश करना शुरु कर दिया। और लगातार वह इस बात को भुलाये रहा कि अगर वह प्रकृति का इसी तरह विनाश करता गया तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति के विनाश के साथ उसका अपना विकास भी अवश्यंभावी हो जायेगा। शायद इसी खतरे को भांप कर वह सूदूर अंतरिक्ष में अपना ठिकाना बनाने के प्रयास में लगा है। लेकिन इससे क्या समस्या का समाधान हो जायेगा। समस्या पृथ्वी की समूची मानवी सभ्यता के विकास के विचार में निहित है जो कि प्रकृति के संसाधनों के दोहन पर आधारित है और यह दोहन उसकी मुनाफखोर व्यवस्थाओं और सुविधाभोगी संस्कृति के कारण अनावश्यक दोहन में बदल गया। पर्यावरण का सवाल अब मनुष्य के जीवन और प्रकृति से कहीं ज्यादा व्यवस्था और सत्ता का सवाल बन गया है।
हालांकि स्वतंत्र मिश्र ने अपनी इस किताब को भारत की पर्यावरण समस्या के विभिन्न मसलों और बिन्दुओं पर ही केन्द्रित किया है लेकिन हम जानते है कि पर्यावरण की समस्या अब किसी एक देश की समस्या नहीं है। यह पूरे विश्व की समस्या है। यह किसी देश केन्द्रित होने की बजाय विश्व केन्द्रित है। बिगड़ते पर्यावरण का दुष्प्रभाव किसी एक देश पर होने की बजाय पूरी दुनिया पर है। इस मायने में यह एक वैश्विक मसला है। और इसका समाधान भी वैश्विक स्तर पर ही होना है।
स्वतंत्र मिश्र की इस किताब में छोटे-बड़े कुल जमा तिरतालीस लेख हैं जो पर्यावरण से जुड़े अलग-अलग मसलों पर केन्द्रित है। हम इन मसलों को अपनी सुविधा के लिए जल, जंगल, जमीन, मनुष्य और सत्ता की पांच मुख्य श्रेणियों में बांट सकते हैं। लेकिन ये सभी श्रेणियां अलग-अलग करके नहीं देखी जा सकतीं क्योंकि ये सभी आपस में अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं।
यह शायद इस तरह की पहली किताब है जो पर्यावरण की दृष्टि से भारत के छियासठ साल के विकास और समस्याओं की बहुस्तरीय और बहुआयामी सच्चाई से पहली बार हमें रुबरु कराती है। आजाद भारत में बनी पहली सरकार ने विकास का जो रास्ता अख्तियार किया, जो माडल उसने अपनाया जिसे बाद की सरकारें  भी थोड़े-बहुत उलटफेर के साथ अपनाती गईं,  उसके चलते पर्यावरण का अन्धाधुंध विनाश हुआ। बड़े-बांध, बड़ी-बड़ी योजनाएं और  परियोजनायें बनाईं गयीं। कृषि के पारम्परिक तरीकों का विकास करने की बजाय उसके आधुनिकीकरण की एक अंधी दौड़ शुरु हुई। शहर केन्द्रित विकास और सुविधाभोगी-उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन शुरु हुआ। धीरे-धीरे तमाम तरह की नीतियां बनाकर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को पूंजी और मुनाफे की वस्तु में रुपांतरित कर दिया गया। और हालत यह हो गयी है कि पर्यावरण ही नहीं स्वयं भारत का हर नागरिक भी कमोबेश इस अंधी दौड़ की चपेट में आ गया।
स्वतंत्र मिश्र की यह किताब पर्यावरण और विकास के अन्तरविरोधों की अलग-अलग स्तरों, अलग-अलग रुपों और अलग-अलग नज़रियों से गहरी जांच-पड़ताल करती है। एक तरफ़ पहाड़ों को काट-काटकर कुछ लोगों के लिए ऐशगाहें बनायी जा रही हैं तो दूसरी तरफ़ हजारों आदिवासियों और किसानों को विस्थापित किया जा रहा है। एक तरफ़ शहरों में जल का संकट है तो दूसरी तरफ़ आलीशान होटलों के स्वीमिंग पूलों में अरबों लीटर पानी बहाया जा रहा है। एक तरफ़ खाद्य पदार्थों का संकट है तो दूसरी तरफ़ ज्यादा पैदावार करके भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। एक तरफ़ स्पेशल एकोनोमिक ज़ोन बना कर लोगों को विस्थापित किया जा रहा है तो दूसरी तरफ़ उनके पुनर्वास की कोई माकूल राष्ट्रीय नीति तक नहीं है। एक तरफ़ बेरोज़गारी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ़ गरीब आदिवादियों और मछुआरों से जंगल से अपनी जीविका चलाने और समुद्र से मछली पकड़ने से महरूम किया जा रहा है। एक तरफ़ बिजली के लिए बड़े बांध बनाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ करोड़ों लोगों के जीवन में गरीबी और भुखमरी का अन्धेरा भरा जा रहा है। एक तरफ़ नागरिक अधिकारों का ढोल पीटा जा रहा है तो दूसरी तरफ़ ग्रामीण और आदिवासी आबादी को उनके जीवन के हक से महरूम किया जा रहा है।  
कुल जमा बात यह कि पूरा भारत विकास के इस माडल से पैदा हो रही बाढ़, सूखा, जल और खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता का असंतुलन, बड़े पैमाने पर विस्थापन, बेरोज़गारी, भुखमरी, गरीबी और बीमारियों का सामना कर रहा है। बाढ़ का आना और सूखे का होना अब वार्षिक घटना है। बाढ़ अब नदियों से सटे इलाकों में ही नहीं आ रही है वह अब शहरों में बरसात के पानी की निकासी के लिए जगहों की अनुपलब्धता से भी आ रही है। बांधों और परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर हो रहे विस्थापन ने आवास और जीविका का संकट पैदा कर दिया है। ज्यादा से ज्यादा पैदावार के नाम पर कृषि में कीटनाशकों के इस्तेमाल से नयी-नयी बीमारियां पैदा हो रही हैं। मुनाफे के लिए किए जा रहे प्राकृतिक दोहन ने पर्यावरण में एक घनघोर असंतुलन पैदा कर दिया है। शहरों, कस्बों और गांवों में जल की समस्या विकराल होती जा रही है। कुल मिलाकर स्वतंत्र मिश्र के ही शब्दों में कहें तो कहना होगा कि “आज पर्यावरण की अनगिनत चुनौतियां हमारे समक्ष हैं। जल, मिट्टी, हवा, जंगल, बांध, पहाड़ और शहर सभी के साथ कोई न कोई समस्या उभरकर आई है। आधुनिक विकास ने कोई ऐसी जगह नहीं छोड़ी है, जहां संकट न हो।” स्वतंत्र मिश्र की यह किताब अलग-अलग मुद्दों को उठाकर इस संकट के एक संपूर्ण रूप से हमें अवगत कराती है।
स्वतंत्र मिश्र की इस किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पर्यावरण और उसके विनाश के पूरे मामले को पर्यावरण के सत्ता से अन्तरविरोध के रूप में हमारे सामने लाती है। पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान विश्व की विकसित पूजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्थाओं ने ही पहुंचाया है। स्वतंत्र लिखते हैं कि “…पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का चरित्र ही ऐसा है कि अपने फायदे के लिए वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। उसके संतुलन को नष्ट करता है……मुनाफ़े की लालसा के कारण हर पूंजीपति और पूंजीवादी देश धरती की प्राकृतिक संपदा की लूट में लगा रहता है।” हमारे देश के पूंजीवादी विकास के क्रम में भी ऐसा ही हुआ है। पर्यावरण के विनाश की चिन्ता किए बगैर पर्यावरण को पूंजीपतियों की लूट के लिए छोड़ दिया गया है। तमाम कानून और योजनायें बनाकर पूंजीपतियों द्वारा पर्यावरण के दोहन और लूट को बढ़ावा दिया जा रहा है। पर्यावरण के मामले में भी भारतीय सत्ता का पूरा चरित्र विशुद्ध पूंजीवादी है।  
यह भी कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि प्राकृतिक साधनों का अविवेकपूर्ण और अन्धाधुंध दोहन करने वाली व्यवस्था ही अब पर्यावरण की पैरोकार भी नज़र आती है। अमेरिका आज दुनिया में पर्यावरण का सबसे बड़ा समर्थक बन गया है। वह पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दूसरी और तीसरी दुनिया के देशों को धमका रहा है। गरीब मुल्कों पर तमाम तरह के प्रतिबन्ध लगाये जा रहे हैं। पलटकर गरीब मुल्क की सत्ताएं गरीब किसानों, आदिवासियों पर तमाम तरह के कानून बनाकर प्रतिबन्ध लगा रहीं हैं और उनको जीवन और जीविका से महरूम कर रहीं हैं। पर्यावरण का विनाश करने वाले पूंजीपतियों के आगे सरकारें झुकी-झुकी जा रहीं हैं। पर्यावरण के पूंजीपतियों द्वारा किए जा रहे विनाश और लूट में हर सरकार शामिल हो रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तमाम तरह की योजनाएं बनाकर अकूत धन खर्च किया जा रहा है लेकिन नतीजा कुछ नहीं। अपवादों को अगर छोड़ दिया जाये तो पर्यावरण बचाने के नाम पर सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं कुछ नहीं कर रही हैं।
ऐसा नहीं है कि पर्यावरण को लेकर आम जनता और जागरूक आबादी में जागरूकता नहीं बढ़ी है। जागरूकता बढ़ी है लेकिन पर्यावरण को लेकर होने वाले आंदोलनों में कमी आई है। पन्द्रह-बीस साल पहले तक इन पर्यावरण जन आंदोलनों का दवाब सरकारों पर रहता था। यह दवाब भी इधर काफी कम हुआ है। इसकी एक वजह ये भी है इन आंदोलनों पर सरकारों के प्रहार भी बढ़े है।  
पिछले छियासठ सालों के भीतर देश में हुए तथाकथित विकास का आईना है ये किताब। इसमें संग्रहित सभी लेख अलग-अलग तरीके से जांच-पड़ताल करते हुए विकास के नाम पर पर्यावरण के विनाश का एक पूर्ण चित्र हमारे सामने लाती है। एक पत्रकार द्वारा लिखी गयी यह किताब केवल इस मायने में महत्वपूर्ण नहीं है कि इस विकास के आंकड़ों के बरक्स विनाश की सच्चाई बोलते आंकड़ों की प्रस्तुति कर सरकारी नीतियों, योजनाओं और परियोजनाओं के खोखलेपन को हमारे सामने लाती है बल्कि आंकड़ों से कहीं आगे बढ़कर यह मानवीय और प्राकृतिक विनाश को तर्कपूर्ण तरीके से उसके सारे संधर्भों में हमारे सामने रख देती है। और हमें आगाह करती है कि पर्यावरण के विनाश का यह घिनौना खेल अगर समय रहते न रोका गया तो इसका परिनाम भार्त के लिए अत्यंत विनाशकारी होगा।
11/1/2014


समकालीन तीसरी दुनिया के जनवरी-फरवरी, २०१४ अंक में प्रकाशित 


किताब का नाम : जल, जंगल और जमीन : उलट-पुलट पर्यावरण
लेखक : स्वतंत्र मिश्र
प्रकाशक : स्वराज प्रकाशन, दिल्ली
कीमत : 295 रुपये


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