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Sunday 3 August 2014

हंसराज रहबर के बहाने

हंसराज रहबर के बहाने

मुकेश मानस



लीक से हटकर सोचने और लिखने वालों को भुला देने या उपेक्षित कर देने का रोग हिन्दी के साहित्यकारों, आलोचकों और संपादकों का बहुत पुराना रोग है। खास तौर पर हिन्दी के प्रगतिशीलों, जनवादियों और क्रांतिकारी अलम्बरदारों  के भीतर यह रोग कुछ ज्यादा ही जड़ जमाये हुए है। साहित्य और संस्कृति के बारे में ये लोग जैसे बहुत सी बातें तय मान कर बैठ गये है। अगर इनमें थोड़े-बहुत हेर-फेर की गुंजाईश है भी तो उसे पूरा करने का ठेका भी उन्हीं के पास है। कहने का मतलब ये है कि उनके पास एक लीक है जिससे अलग हटकर सोचने और लिखने की छूट किसी को नहीं है। जिस किसी ने भी यह छूट लेने की कोशिश की उसे वे या तो उन्होंने दक्षिणपंथियों के खाते में डालकर निश्चित हो जाते हैं या फिर उसे इस कदर उपेक्षित कर देते हैं कि उसका अता–पता ही न रह जाये। ऐसे ही अनेक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील लोगों में से एक हैं-हंसराज रहबर। यह वर्ष हंसराज रहबर का जन्मशति वर्ष है। हंसराज रहबर के खुद के बनाये ‘भगत सिंह विचार मंच’ और नवसर्वहारा सांस्कृतिक मंच बधायी के पात्र हैं जिन्होंने पिछले वर्ष पूरे भारत में छोटे-बड़े कार्यकर्म करके हंसराज रहबर को, उनके चिंतन को और उनके काम को याद किया।

हंसराज रहबर एक बहुआयामी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार और विचारक थे। वे अपने समय के कई साहित्यकारों की तरह हिन्दी-उर्दू के बीच का पुल थे। रहबर ने कविता से लेकर कहानी, उपन्यास, जीवनी और आलोचना तक साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा है। खास तौर पर अपनी जीवनियों, आलोचना पुस्तकों और मशहूर हस्तियों को बेनकाब करती तीन कृतियों में उन्होंने हमेशा एक नया दृष्टिकोण, एक नया नज़रिया प्रस्तुत किया। उर्दू और हिन्दी में लिखी गांधी, नेहरू और गालिब को बेनकाब करने वाली किताबों के कारण उन्हें अनेक बार कटु आलोचना झेलनी पड़ी और जेल तक जाना पड़ा। उन्होंने जो लिखा डंके की चोट पर लिखा। और अपनी मान्यता से वे कभी पीछे नही हटे।

खुद एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी होते हुए भी रहबर मानते थे कि भारत में अभी मार्क्सवाद आया ही नहीं है, जो है वह खोखला है, हवाई है क्योंकि वो भारत की विशिष्टताओं (कहने को कह सकते हैं कि भारत की जड़ों) से जुड़ा हुआ नहीं है। अपने समूचे साहित्य और जीवन में वे लगातार भारतीय मार्क्सवाद की तलाश में जुटे रहे जिसका एक सिरा विवेकानन्द से जुड़ता था तो दूसरा भगतसिंह से। विवेकानन्द पर लिखी जीवनी में उन्होंने विवेकानन्द के अध्यात्मिक अद्वैत और वेदान्त का भैतिकवादी-ऐतिहासिक द्वन्द्वात्मक दृष्ट्कोण से विष्लेषण किया और और विवेकानन्द के विचारों की विशिष्टताओं और अन्तरविरोधों को खोज निकाला। उन्होंने रेखांकित किया कि विवेकानन्द उन्नीसवी सदी में बदलाव और प्रगति के विचार को जहां छोड़ गये थे, वहां से भगत सिंह ने उसे भारत की विशिष्टताओं से जोड़कर आगे बढ़ाया और हिन्दुस्तानी समाजवादी–प्रजातांत्रिक संघ की क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में विकसित किया। यह भारतीय जड़ों से जुड़ा मार्क्सवाद था। भारत के कम्युनिष्ट आंदोलन ने भगत सिंह विचार की अवहेलना की और कठमुल्लापन का शिकार होता चला गया। इसी कड़ी में उन्होंने अपनी किताब ‘प्रगतिवाद पुनर्मूल्यांकन’ में प्रगतिवादी साहित्य का संबंध स्वाधीनता संग्राम से जोड़ा और स्वाधीनता संग्राम का नवजागरण से। यह उनकी वह मार्क्सवादी समझ थी जो अपने देश के इतिहास और उसकी जड़ों से पैदा हो रही थी।

इधर पिछले कुछ दिनों में हंसराज रहबर को पढ़ते हुए मैंने प्रगतिशीलता और संघर्ष के नये मायने सीखे। प्रगतिशीलता और संघर्ष की पहली सीढ़ी व्यक्ति खुद है। और प्रगतिशील होने के लिए व्यक्ति का सबसे पहला संघर्ष खुद से ही होता है। हंसराज रहबर इस बात की जबरद्स्त मिसाल हैं। वे सनातनी परिवार में पैदा हुए फिर आर्यसमाज के प्रभाव में आये। आजादी के सैनानी के रूप में कांग्रेसी हुए और अपने देश, समाज और दुनिया पर अध्ययन-मनन से सोशलिस्ट और अंतत: कम्युनिष्ट हुए। इस तरह प्रगतिशील होने का उन्होंने एक लम्बा सफ़र तय किया।
मैंने सीखा कि प्रगतिशीलता कोई पहले से तय मानदंडों के आधार पर विकसित होने वाली चीज नहीं है। वह समाज की परम्परा और संस्कृति की जड़ों से पैदा होती है और देश और समाज की वस्तुस्थितियों में होने वाले बदलावों की रौशनी में निरंतर विकसित होने वाली चीज है। केवल मार्क्सवाद पढ़ लेना और उसकी बातें करना ही प्रगतिशीलता नही है वह अपने देश और समाज की वस्तुगत सच्चाईयों को समझने और उन्हीं के अनुसार उनको बदलने का विचार उत्पन्न करना है। वह परम्परा के सकारात्मक विचार को लेकर बदलाव की भौतिक शक्ति पैदा करने में निहित है। इसलिए महज प्रगतिशीलता नहीं बल्कि सापेक्ष प्रगतिशीलता की दरकार है।

इसी तरह से संघर्ष के मामले में भी माना जाता है कि व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष ही संघर्ष है और इसके अलावे कोई दूसरी तरह का संघर्ष तो संघर्ष है ही नही। संघर्ष कोई इकहरी चीज नहीं है बल्कि वह बहुआयामी और बहुस्तरीय है। हर जगह पर और हर मुद्दे पर एक ही तरह से संघर्ष नहीं होता बल्कि हर जगह और हर मुद्दे पर अलग-अलग तरीके से संघर्ष किया जाता है। व्यक्ति शोषण से लेकर देश के राष्ट्र के शोषण के खिलाफ उठने वाली आवाज संघर्ष है। व्यक्ति परिवर्तन से लेकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई संघर्ष है। आज देश की जनता कई स्तरों और कैई आयामों से संघर्ष कर रही है। विस्थापन और गरीबी से लेकर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, मंहगाई, अन्धविश्वास और पर्यावरण विनाश, छुआछूत आदि मुद्दों तक फैले इन सभी संघर्षों में गहरा सम्बन्ध है और अपनी अंतिम परिणति में ये सभी संघर्ष व्यव्स्था परिवर्तन के संघर्ष हैं।

हंसराह रहबर बदलाव और संघर्ष की भारतीय चिंतन परम्परा के अद्वितीय योद्धा हैं और बहुत देर तक उनके विचारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। जैसे–जैसे समाज में संघर्ष बढ़ेगा और व्यव्स्था परिवर्तन के नए-नए विचारों का जन्म होगा, उनकी नींव के रुप में हम हंसराज रहबर से नए तरीके से रुबरु होंगे।

सम्पादकीय, मगहर, फरवरी 2014

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