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Saturday 25 October 2014

अम्बेडकरवादी वैचारिकी की नींव : प्रो. तेज सिंह

   





 अम्बेडकरवादी वैचारिकी की नींव : प्रो. तेज सिंह

मुकेश मानस 




-        पहले मैं एक व्यक्तिगत बात करना चाहूंगा। दो व्यक्तियों के बीच एक रिश्ते में अक्सर तमाम मतभेदों के बावजूद बहुत बार न बताया जा सकने वाला, लगभग अव्यख्यायित किस्म का लगाव भी होता हैं जिसके कारण ये दो व्यक्ति दूर-दूर दिखते हुए भी कभी अलग नहीं होते। कुछ ऐसा ही रिश्ता मेरे और प्रोफेसर तेज सिंह के बीच था।

-       अपनी तमाम खामियों और सीमाओं के बावजूद ( जो कि उनकी ही नहीं पूरे दलित समाज की खामियां और सीमाएं हैं) उनका व्यक्तित्व और काम मुझे सदा आकर्षित करता रहा बिल्कुल उस पिता के अर्थ में जिसका व्यक्तित्व उसके पुत्र की नज़र में बहुत उज्जवल हो, लेकिन व्यवहार कभी-कभी परेशान करने वाला हो।

-        कभी–कभी किसी बात को लेकर हमारे बीच एक चुप का रेगिस्तान पसर जाता जो किसी सघन निर्जन प्रान्तर वन सा गहन होता जाता और भीतर-भीतर बहुत शोर मचाते एक अथाह नीरव समन्दर में बदल जाता। लेकिन वक्त के किसी मकाम पर हम जब भी जैसे भी मिलते उनकी सादगी सरलता और उनकी हँसी सारी चुप्पी, सारी निर्जनता और सारी नीरवता को एकदम तरल और मुलायम बना देती। वैचारिक मतभेदों और अन्तर्संघर्षों के बेहद सघन झझावातों के बीच उनकी घनीभूत बादलों की तरह गड़गड़ा कर फूट पड़ने वाली हँसी हमेशा मेरे अन्तस में एक ऊर्जा की धूप तरह खिलती रही है और आगे भी खिलती रहेगी

-    अब मैं उनकी वैचारिक यात्रा पर कुछ बातें कहूँगा जो मेरे तईं शायद अभी भी अधूरी (ही रह गयी हैं) और कच्ची ही हैं। उनका समग्र मूल्यांकन मेरे बूते से बाहर है। वजह ये है कि उनकी यात्रा अभी यात्रा ही है और यात्रा का मूल्यांकन एक यात्रा करने जैसा ही है। और मेरे जैसा नौसिखिआ यात्री पता नहीं मंजिल पर पहुँचे, न पहुँचे।

-       संस्कृति और साहित्य की आलोचना की वैचारिकी के स्पेस में प्रोफेसर तेज सिंह एकमात्र ऐसी कड़ी थे जो भारतीय संदर्भ में प्रगतिशील आलोचना के मार्क्सवादी नज़रिए और दलित आलोचना के अम्बेडकरवादी नज़रिए को एक विशिष्ट अर्थ में एक पुल की तरह जोड़ते थे। आलोचना का उनका लगभग सारा काम इसी दो नज़रियों के मिलन बिन्दु को लगातार विस्तृत और गहरा करने वाला काम है। इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण काम वे कर चुके और कुछ पर वे अभी काम कर रहे थे। उनके अकस्मात देहांत की वजह से अपूर्ण रह गया काम हमारी सांझी विरासत का हिस्सा है। शायद हम में से कुछ लोग उनसे मुतमईन और मुत्तासिर होकर इसी दिशा में आगे बढ़ने का बीड़ा उठा रहे हों या उठा चुके हों, आशा की इतनी किरण अपने भीतर संजोने में आखिर हर्ज़ ही क्या है। फिर भी  सोचता हूँ कि काश वे इसे पूरा कर पाते तो मार्क्सवादी और अम्बेडकरवादी नज़रिए में जो महीन फ़र्क और धुंधलापन रह गया है वहां उनके नाम को साकार करता एक तेज प्रकाश आलोकित हो उठता जिसके दायरे में भारतीय संदर्भ में वंचित और शोषित तबकों की मुक्ति की राह और ज्यादा साफ़ और स्पष्ट हो जाती।

-    भारतीय वस्तुनिष्ठ सच्चाई की ज़मीन के ठोस आधार की राह पर चलते-चलते प्रोफेसर तेज सिंह ने सर्वांग़ीण भारतीय मुक्ति की व्यापक अम्बेडकरवादी वैचारिकी को डिस्कवर करने तक एक बेहद लम्बा सफ़र तय किया। और साथ ही कहना होगा कि यह सफ़र अभी भी ज़ारी था। आलोचना की शुद्ध मार्क्सवादी वैचारिकी (कह सकता हूँ कि एक किस्म की यांत्रिक वैचारिकी) से अपने आलोचना कर्म की शुरुआत करते हुए प्रोफ़ेसर तेज सिंह इस सफ़र में कई राहों, दोराहों और चौराहों से होकर गुज़रे। लगातार आने वाली अड़चनों के बावजूद दोहराव और पुनरावलोकन भी हुए लेकिन वे न कहीं रुके और न कभी वापस पलटे। ‘नागार्जुन का कथा साहित्य’, ‘राष्ट्रीय आंदोलन और हिन्दी उपन्यास’, ‘उत्तरशती की हिन्दी कहानियां’ आदि आलोचना पुस्तकों में जहां उन्होंने प्रगतिशील साहित्य की मार्क्सवादी नज़रिये से जांच-पड़ताल करते हुए उन अन्तरलों की खोज की जो भारतीय वस्तुनिष्ठ सच्चाईयों की धुंधली समझ और अनुभव के कारण संबोधित होने से छूट गए थे, खास तौर पर भारतीय जाति व्यवस्था के प्रश्न, जो प्रगतिशील धड़े में अभी भी आधे-अधूरेर ढ़ंग से ही संबोधित हैं या ऐसे ही किए जाते हैं, कारण बहुत से हैं।

-       और यहीं से इन सवालों से टकराने और जूझने की प्रोफ़ेसर तेज सिंह एक समांनांतर प्रक्रिया का आरम्भ करते हैं जो ‘अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज’ से शुरु होकर ‘अम्बेडकरवादी कहानी : रचना और दृष्टि’, ‘दलित समाज और संस्कृति’ और ‘अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन’ आदि पुस्तकों से गुज़रते हुए ‘अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा’ तक पहुचकर थोड़ा विराम लेती है। ‘अम्बेडकरवादी विचारधारा और समाज’ में जहां वे भारतीय समाज की विभिन्न इकाईयों के संदर्भ में हिंदू समाज और जाति आधारित सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था का अम्बेडकरवादी नज़रिए से एक गहन विष्लेशण की ओर पहला कदम रखते हैं और इस संदर्भ में अम्बेडकरवादी वैचारिकी की एक शुरुआती आधारभूमि प्रस्तुत करते हैं। वहीं ‘अम्बेडकरवादी कहानी’ से दलित कहानी की अम्बेडकरवादी नज़रिये से जांच-पड़ताल करते हुए अम्बेडकरवादी साहित्य की अवधारणा की ओर बढ़ते हैं। ‘अम्बेडकरवादी स्त्री चिंतन’ से भारतीय और दलित समाज की महत्वपूर्ण इकाई दलित स्त्री के आत्मवृत्तों के अनुभवों के आधार पर गैर दलितों और दलितों में जड़ जमाए जाति और जेंडर पर आधारित ब्राह्मणी पितृसत्तात्मक मानसिकता और व्यवहार का विष्लेशण करते हुए अम्बेडकरवादी स्त्रीवाद की अवधारणा को सामने लाते हैं। ‘दलित समाज और संस्कृति’ में वे भारतीय संस्कृति के वर्गीय और जातीय आधारों की टकराहटों और अन्तरविरोधों की जांच-पड़ताल करते हुए भारतीय संस्कृति को ब्राह्मणी संस्कृति कहते हैं और उसके समानांतर बहुलतावादी और लोकतांत्रिक बहुजन संस्कृति की खोज करते हैं जिसे वे श्रमण संस्कृति कहते हैं और जिसे हिन्दूवादी-फासीवादी संस्कृति के प्रतिउत्तर के रूप में पेश करते हैं, जो दलितों के बीच भी अब सिर उठाने लगी है। इस तरह समाज, संस्कृति और साहित्य की अम्बेडकरवादी नज़रिए से जांच-पड़ताल करते हुए साहित्य की अम्बेडकरवादी अवधारणा तक पहुंचते हैं। इस अवधारणा में वे दलित साहित्य के सीमित और संकीर्ण जातीय आधार को व्यापक दलित  समाज मुक्ति के अम्बेडकरवादी आधार से अलगाते हैं। यहां पहुंचकर वे अम्बेडकर तक को नकारने वाले चिंतकों और आलोचकों के सामने एक गहरी और मुकम्मिल अम्बेडकरवादी वैचारिकी को एक अंतरराष्ट्रीय अम्बेडकरवादी वैचारिकी के रूप में स्थापित करते हैं।

-        अपेक्षा प्रोफेसर तेज सिंह और उनकी मित्र मंडली, जिनमें कई लोग यहां मौजूद हैं, का अनन्य शाहकार है। इस पत्रिका ने आलोचना के क्षेत्र में एक के बाद एक प्रतिमान स्थापित किए। साहित्य और दलित साहित्य और अंत में अम्बेडकरवादी साहित्य तक, जो कि प्रोफेसर तेज सिंह का एक बेहद प्रिय अवधारणात्मक शब्द है और कहूं तो इसी में उनकी जान अटकी रहती थी, एक संघर्षपूर्ण सफ़र तय किया। इस पत्रिका के ज़रिये बिहारी लाल हरित, भगवान दास जैसे दलित सहित्यकारों, समाज सेवियों और योद्धा पहली-पहली बार पूरी तरह से प्रकाश में आये। उन्होंने गैर-दलित रचनाकारों की रचनाओं जैसे प्रेमचंद की कृति रंगभूमि पर भी अंक निकाले। प्रोफेसर तेज सिंह की पूरी शिद्द्त के साथ यही कोशिश रहती थी कि अपेक्षा का चरित्र हर कीमत पर लोकतांत्रिक हो। इसीलिए इस पत्रिका में लगातार उन लोगों के विचार भी छपते रहे जिनसे वे खुद असहमत रहते थे और उनका सम्पादन मंडल भी।

-         अंत में जहां से बात शुरु कि थी वहीं से अपनी बात खत्म करूंग़ा। राहें महत्वपूर्ण नहीं होतीं और न मंज़िल। महत्वपूर्ण होती हैं राहों को मंजिलों से जोड़ने वाली कड़ियां। प्रोफेसर तेज सिंह भारतीय मनीषा की एक ऐसी कड़ी थे जो मुक्ति की राह को मुक्ति की मंज़िल से जोड़ती है। लीक से हटकर सोचने और करने वालों को भुला देने का भारतीयों और खास तौर पर हिन्दी पट्टी वालों में बड़ा पुराना रोग है। लेकिन लीक से हटकर सोचने वाले लोग ही संघर्ष और बदलाव की नींव होते हैं। नींव ओझल भले ही रहती है मगर कभी मिटती नहीं।

मुकेश मानस
18/07/2014


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